बिजनेस स्टैंडर्ड - कॉर्पोरेट कर दर में कमी की जरूरत
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कॉर्पोरेट कर दर में कमी की जरूरत

अजय शाह /  July 04, 2019

करों में मामूली बदलाव करके हम उन विसंगतियों को दूर कर सकते हैं जिनके कारण पूंजी की उपलब्धता और उसका प्रवाह बाधित होता है। विस्तार से जानकारी प्रदान कर रहे हैं अजय शाह 

 
अगर कॉर्पोरेट मुनाफे पर उच्च कराधान की तुलना की जाए तो उभरते बाजारों या जी-20 देशों की तुलना में भारत की स्थिति थोड़ी अस्वाभाविक नजर आती है। सन 2001, 2005 और 2007 में भारत की कॉर्पोरेट कर दर जी-20 देशों की कर दर के माध्य से करीब 9 से 10 फीसदी अधिक थी। उसके बाद यह अंतर बढ़कर 21 फीसदी तक पहुंच गया क्योंकि दुनिया भर में कॉर्पोरेट कराधान में गिरावट आई। कॉर्पोरेट कराधान से भारत को लाभ होता क्योंकि इससे स्थानीय और विदेशी निवेशकों के बीच भारत की लोकप्रियता बढ़ती है। वह कॉर्पोरेट स्वरूप के दोहरे कराधान को कम करता है और अप्रत्यक्ष माध्यमों से संपत्ति और कर राजस्व में इजाफा करता है। यह प्रक्रिया 2015 में आरंभ हुई थी और 5 जुलाई के भाषण में इसका उल्लेख होना चाहिए।
 
ओईसीडी एक ऐसी माप व्यवस्था संचालित करता है जो निगमों की कुल आय पर समग्र कर दर्शाती है। भारत दो मामलों में अलग नजर आता है। वर्ष 2018 में भारत 48.3 फीसदी की उच्च दर के साथ अलग नजर आता है। अगर इसकी तुलना उभरते बाजारों के 25 फीसदी के औसत या जी-20 देशों के 27.7 फीसदी के औसत से की जाए तो भारत में दर काफी ज्यादा है। बीते तमाम वर्षों में दरों में बदलाव के मामले में भी भारत अन्य देशों या क्षेत्रों के साथ सुसंगत नहीं है। वर्ष 2000 में भारत में यह दर 48.1 फीसदी थी जबकि आज भी हमारे यहां लगभग इतनी ही दर है। जबकि समय बीतने के साथ-साथ उभरते बाजारों की दर 5 प्रतिशत तक गिरी और मध्यम अवधि में जी-20 देशों में यह दर 8.3 फीसदी तक कम हुई। इन वजहों से भारत उच्च कराधान वाला देश बन गया है।
 
यह ध्यान देने वाली बात है कि सन 2001, 2005 और 2006 में भारत और जी-20 देशों की दरों का अंतर बहुत कम था। यह वह दौर था जब बहुत बड़े पैमाने पर कारोबारी विस्तार की प्रक्रिया आरंभ हुई। हालांकि हम इसे विस्तार की इकलौती वजह नहीं मान सकते। सच तो यह है कि वर्ष 2002 से 2008 के बीच नीति निर्माण के कई तत्त्व देश के पक्ष में रहे। यह अवश्य कहा जा सकता है कि कर दरों का प्रतिस्पर्धी होना भी इसकी एक वजह थी। यह अहम मसला क्यों है? निगमों की कर दर कम रखने के पीछे प्रमुख तौर पर तीन दलील हैं। पहली बात तो यह कि हमें व्यक्तिगत कराधान पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। सभी लोगों की कुल आय का आकलन कर व्यक्तिगत आय कर लगाया जाए। एक बार ऐसा होने के बाद संस्थागत ढांचे पर अलग से कर लगाने की आवश्यकता नहीं है, फिर चाहे वह साझेदारी वाली फर्म हो या स्वामित्व वाली या फिर सीमित दायित्व वाली कंपनी। कॉर्पोरेट को दंडित करके हम विभिन्न कारोबारों को अन्य तरीकों से संगठित होने का अवसर दे रहे हैं। यह अर्थव्यवस्था के लिए ठीक नहीं है। विभिन्न कॉर्पोरेट द्वारा भारी लाभांश भुगतान की मांग करने वाले नियम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि कॉर्पोरेट मुनाफे को व्यक्तिगत आय में दर्शाया जाए और इस पर व्यक्तिगत आय कर लगाया जाए।
 
दूसरी अहम बात पूंजी के प्रवाह से संबंधित है। पूंजी पर कर या वित्तीय लेनदेन पर कर की व्यवस्था इसलिए कमजोर रही है क्योंकि ये बाजार स्थिर नहीं हैं। आधुनिक विश्व में भारतीय और वैश्विक पूंजी धारकों के पास निवेश के लिए वैश्विक विकल्प मौजूद हैं। कराधान में छोटे बदलाव भी पूंजी की स्थिति में बदलाव के साथ असंगत प्रतिक्रिया को जन्म दे सकते हैं। यह बदलाव पूंजी के देश से बाहर जाने, निवेश के तरीके में बदलाव के रूप में सामने आ सकते हैं। यह भारत के लिए नुकसानदेह है क्योंकि हमें समृद्धि हासिल करने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश की आवश्यकता है।
 
यही कारण है कि भारत की कर नीति में अर्थव्यवस्था के तीन तत्त्वों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। पहला संपत्ति कर, दूसरा खपत आधारित जीएसटी और तीसरा निवास आधारित व्यक्तिगत आय कर। कर लगाने के तमाम अन्य प्रयासों को बुरा कर माना जाता है क्योंकि उनकी वजह से व्यवहार में व्यापक बदलाव आता है जो देश के लिए अच्छा नहीं है। तीसरी अंतर्दृष्टि यह है कि देश और सरकार का लाभ तब बढ़ता है जब देसी या वैश्विक निगम अपना कारोबार यहां स्थापित करते हैं। जब कंपनियां भारत में अपना कारोबार संचालित करती हैं तो लोगों की समृद्धि बढ़ती है। इसके अलावा सरकार को और अधिक कर राजस्व प्राप्त होता है। जो निगम परिसंपत्ति बेचते हैं या किराये पर देते हैं, उन्हें बेहतर परिसंपत्ति कर राजस्व हासिल होता है। जो निगम श्रम की सेवा लेते हैं, वे भी व्यक्तिगत आय कर उत्पादित करते हैं। इसका प्रभाव कारोबार के क्रम में एकदम नीचे तक होता है। तीसरी बात, जो भारतीय निगमों से आय अर्जित करते हैं, वे खपत भी करेंगे। इससे जीएसटी राजस्व अर्जित होगा क्योंकि जीएसटी खपत आधारित कर है।
 
इन तीन विचारों ने दुनिया भर में उच्च कॉर्पोरेशन कर से परे ऐतिहासिक गतिशीलता तैयार की। सन 1980 के बाद से दुनिया भर में इस कर दर में गिरावट आई। अमीर देशों में जहां ज्यादा कर-जीडीपी अनुपात की आवश्यकता होती है, वहां केवल जीएसटी, आयकर और संपत्ति कर के माध्यम से संसाधन जुटाए जाते हैं।  हमें उभरते बाजारों की माध्य दर तक सीमित नहीं रहना चाहिए। बल्कि हमें वैश्विक मानकों पर प्रतिस्पर्धी होना होगा। अगर हम 20 फीसदी कॉर्पोरेट टैक्स लेते हैं तो हम तीन चौथाई उभरते बाजारों से बेहतर स्थिति में होंगे। खासतौर पर हम चीन की तुलना में अधिक आकर्षक होंगे क्योंकि वहां कर दर 25 फीसदी है। 
 
वर्ष 2015 में इसके क्रियान्वयन के लिए भविष्य की कई तिथियां घोषित की थीं। देसी और विदेशी निवेशक इस पर सुस्त रहे और बाद में उनकी आशंका सही साबित हुई। आगामी बजट भाषण में इसके क्रियान्वयन की घोषणा करना सही होगा। इससे 2019-2020 में थोड़ी दिक्कत हो सकती है लेकिन आगे चलकर हालात बेहतर होंगे।  इसे सीमा शुल्क कटौती के तर्ज पर लागू किया जा सकता है। सन 1991 से 2003 तक इसमें लगातार कटौती हुई जिसका कर अधिकारियों ने विरोध भी किया क्योंकि कर राजस्व में कमी आ रही थी। परंतु संरक्षणवाद समाप्त होने से आर्थिक गतिविधियां बढ़ीं और इसकी भरपाई हो गई। 
Keyword: corporate, rate, income tax,,
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