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बुनियादी मतभेद से नहीं रह सके एक

वीरेंद्र सिंह रावत /  July 03, 2019

लोकसभा चुनावों के दौरान बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती ने 20 अप्रैल को फिरोजाबाद जिले में महागठबंधन की एक जनसभा में संकेत दिया था कि चिर प्रतिद्वंद्वी समाजवादी पार्टी (सपा) के साथ उनका महागठबंधन लंबे समय तक चलने वाला नहीं है। अपने भाषण के बीच सपा कार्यकर्ताओं की लगातार नारेबाजी ने नाराज मायावती ने उन्हें जमकर डांट पिलाई थी। इस दौरान मंच पर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव भी बैठे थे। मायावती  ने सपा कार्यकर्ताओं से नारेबाजी बंद करने और बसपा कार्यकर्ताओं की तरह अनुशासन में रहने की नसीहत दी। 

 
सपा-बसपा महागठबंधन को सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए बड़ी चुनौती माना जा रहा था लेकिन उत्तर प्रदेश में इसका एक तरह से सूपड़ा साफ हो गया। सपा केवल पांच और बसपा 10 सीटें ही जीत पाई। दोनों दलों ने राज्य में अपने वोट शेयर के गणित को देखते हुए महागठबंधन किया था। उत्तर प्रदेश में 22 फीसदी दलित और 45 फीसदी पिछड़ी आबादी है। लेकिन भाजपा की केमिस्ट्री ने उनके गणित को ध्वस्त कर दिया। भाजपा ने अपनी सहयोगी पार्टी अपना दल के साथ राज्य की 80 सीटों में से 64 पर जीत दर्ज की।
 
इसी महीने मायावती ने संकेत दिया कि महागठबंधन के दोनों साझेदारों के बीच सुखद दौर खत्म हो चुका है क्योंकि सपा अपने वोटों को बसपा के खाते में हस्तांतरित करने में नाकाम रही। उन्होंने कहा कि अखिलेश की पत्नी डिंपल कन्नौज और चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव बदायूं से लोकसभा चुनाव हार गए जो इस बात का प्रतीक है कि सपा के परंपरागत यादव वोट उसके हाथ से निकल चुके हैं। बसपा प्रमुख ने आखिर 24 जून को ट्विटर पर सपा के साथ गठबंधन टूटने की पुष्टिï करते हुए दावा किया कि सपा के साथ हाथ मिलाकर भाजपा को हराना मुश्किल है और बसपा आगे सभी चुनाव अकेले ही लड़ेगी। आम चुनावों में हार महागठबंधन की टूट का तात्कालिक कारण बनी लेकिन इसके पीछे असली वजह यह थी कि बसपा को महसूस हो गया था कि दोनों दलों के प्रमुख मतदाता वर्ग में जमीनी स्तर पर भारी मतभेद थे और केवल गठबंधन की घोषणा से ही उन्हें साथ नहीं लाया जा सकता है। 
 
विभिन्न सामाजिक-आर्थिक कारणों से उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में दलित और पिछड़े समुदायों में आपस में नहीं बनती है। इसका परिणाम यह हुआ कि पुलिस और अदालतों में दोनों समुदायों के बीच कई मामले चल रहे हैं। बसपा को  आशंका थी कि इन सामाजिक विरोधाभास से उसे राजनीतिक नुकसान हो सकता है और उसे अपने वोट बैंक से भी हाथ धोना पड़ सकता है। साथ ही उसे यह आशंका भी थी कि उसका जाटव वोट बैंक उससे छिटककर दूसरे दलों खासकर भाजपा की झोली में जा सकता है। 
 
हाल में प्रचार के दौरान दोनों दलों के कार्यकर्ताओं के बीच विभिन्न स्थानों पर झड़पें हुईं। बसपा के एक वरिष्ठï नेता ने कहा, 'महागठबंधन के बारे में राज्य में खासकर गैर यादव पिछड़ी जातियों और दलितों में नकारात्मक संदेश गया। उन्हें लगा कि अगर यह गठबंधन सफल रहा तो इससे राज्य की राजनीति में यादवों का दबदबा और बढ़ेगा। इससे बड़ी संख्या में गैर-यादव पिछड़े और गैर-जाटव दलित वोट भाजपा की झोली में गए।' साथ ही यादव परिवार के सदस्यों की उनके परंपरागत गढ़ में हार से बसपा को यह महसूस हुआ कि सपा की यादवों पर पकड़ ढीली पड़ चुकी है। सपा के दिग्गत नेता मुलायम सिंह यादव का स्वास्थ्य ठीक नहीं चल रहा है और उनके छोटे भाई शिवपाल सिंह पहले ही अखिलेश से अलग हो चुके हैं। बसपा नेता ने कहा, 'हमने उत्तर प्रदेश में केवल 38 सीटों पर चुनाव लड़ा और दस सीटों में जीत दर्ज की। अगर हमने सभी 80 सीटों पर चुनाव लड़ा होता तो हम अपने दम पर ज्यादा सीटें जीतते। सपा न केवल अपने वोट बसपा को दिलाने में नाकाम रही बल्कि वह अपने अहम उम्मीदवारों की जीत भी सुनिश्चित नहीं कर पाई।'
 
जी बी पंत सोशल साइंस इंस्टीट्यूट के निदेशक बदरी नारायण ने कहा, 'सपा और बसपा के बीच सामाजिक विरोधाभास इतना गहरा है कि महज चुनाव पूर्व गठबंधन घोषित करने से इसे दूर नहीं किया जा सकता है। जमीनी स्तर पर इसे दूर करने में लंबा समय लगेगा और ऐसा लगता है कि मायावती इतना लंबा इंतजार करने को तैयार नहीं हैं।' हालांकि उन्होंने जल्दबाजी में महागठबंधन तोडऩे के लिए मायावती की आलोचना की और कहा कि बसपा प्रमुख ने इसे परिपक्व बनने और परिणाम दिखाने का समय नहीं दिया। 
 
मायावती अब अपनी नई योजना पर तेजी से आगे बढ़ रही है और उन्होंने अपने भाई आनंद कुमार को उपाध्यक्ष और भतीजे आकाश आनंद को राष्टï्रीय संयोजक बनाया है। इस तरह उन्होंने पार्टी में उत्तराधिकार की एक अनौपचारिक योजना बनाई है। बसपा वही पार्टी है जिसने हमेशा भाई-भतीजावाद और पार्टी पर किसी एक परिवार के दबदबे का हमेशा विरोध किया है। बसपा ने आने वाले महीनों में सभी 12 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव लडऩे की घोषणा की है। हालांकि अभी तक पार्टी की इस तरह के चुनावों में ज्यादा दिलचस्पी नहीं रहती थी लेकिन अब इनके जरिये बसपा 2022 के विधानसभा चुनावों के लिए अपनी तैयारियों को परखना चाहती है। 
 
नारायण ने कहा, 'मायावती के पार्टी के अहम पदों पर अपने परिवार के सदस्यों को नियुक्त करने के फैसले से बसपा कार्यकर्ताओं में नकारात्मक संदेश गया है और इससे आने वाले समय में बहुजन आंदोलन कमजोर होगा।' इस बीच पार्टी ने दलित, मुस्लिम और ब्राह्मïण के अपने जांचे परखे समीकरण को मजबूत करने का फैसला किया है। इसी समीकरण के दम पर पार्टी ने 2007 के विधानसभा चुनावों में बहुमत हासिल किया था।
Keyword: uttar pradesh, SP, BSP, mayawati, akhilesh yadav,,
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