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केंद्रीय बजट पर टिकीं बैंकिंग जगत की उम्मीदें

तमाल बंद्योपाध्याय /  July 03, 2019

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का निजीकरण एक साहसिक विचार है और नोटबंदी जैसा कदम उठा चुकी सरकार के लिए यह काफी आसान हो सकता है। बता रहे हैं तमाल बंद्योपाध्याय

 
आम बजट आने के ठीक पहले सभी उद्योग इकाइयां अपने एजेंडे के साथ नॉर्थ ब्लॉक पहुंचती हैं। बैंकिंग उद्योग के लिए यह सालाना परिपाटी म्युचुअल फंडों और सरकारी बचत योजनाओं की तुलना में असमान कारोबारी हालात का मुद्दा उठाता रहता है। बैंकों को यह उलझन सताती है कि अगर ब्याज दरों में कटौती की तो ग्राहक म्युचुअल फंडों और अधिक प्रतिफल देने वाली सरकारी बचत योजनाओं का रुख करने लगेंगे। बजट के ठीक पहले सरकार ने छोटी बचत योजनाओं की ब्याज दरें कम कर दी हैं और बाजार नियामक की नई भूमिका के चलते कंपनियां अपने फंड म्युचुअल फंड से हटाकर बैंकों से संबद्ध करने के लिए बाध्य हो सकती हैं।
 
ऐसे में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को बैंकिंग क्षेत्र के लिए क्या करना चाहिए? यहां पर कुछ सुझाव पेश हैं जो अनपेक्षित भी नहीं हैं क्योंकि खुद वित्त मंत्री ने ट्विटर पर सलाह मांगी हैं। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने वर्ष 2016 से उद्योग समूहों और अर्थशास्त्रियों से मुलाकात की परंपरा जारी रखने के साथ ही बजट के बारे में आम जनता से भी राय लेने का सिलसिला शुरू किया है। भले ही मैं आधिकारिक समयसीमा में सलाह देने से चूक गया हूं लेकिन फिर भी मैं इस भीड़ का हिस्सा बन रहा हूं।
 
कुछ समय तक सार्वजनिक बैंकों की जोखिम विमुखता कॉकटेल जगत में चर्चा का मुद्दा रही है। बैंकों की कर्ज देने की अनिच्छा उनकी चिंता रही है। दरअसल इस समस्या की जड़ में डर से जुड़ा मनोविकार है। जांच एजेंसियां वरिष्ठ बैंकरों का पीछा कर रही हैं और एक निजी बैंक के मुख्य कार्याधिकारी (सीईओ) का मामला छोड़ दें तो वे सरकारी नियंत्रण वाले बैंकों के अधिकारियों के मामले में खासी आक्रामक तेवर अपनाए हुए हैं। इनमें से कई अधिकारियों को गिरफ्तार किया जा चुका है और कई से पूछताछ हुई है लेकिन अब तक एक भी ऐसा वाकया नहीं आया है जब कर्ज देने या किसी चूककर्ता की बकाया राशि निपटाने जैसे फैसलों को लेकर किसी सार्वजनिक बैंकर के खिलाफ अभियोग चला हो। लेकिन बैंकरों का यह डर कर्ज आवंटन के साथ फंसे कर्ज की वसूली को भी धीमा कर रहा है। इस समय इन बैंकरों में भरोसा बहाल करना होगा जिनके पास कुल बैंकिंग उद्योग का करीब 70 फीसदी हिस्सा है। निश्चित रूप से दोषी को सजा मिलनी चाहिए लेकिन महज आरोपों के आधार पर उन्हें परेशान नहीं किया जाना चाहिए और न ही उनकी छवि धूमिल की जानी चाहिए।
 
वरिष्ठ बैंकरों पर कड़ी निगरानी रखी जानी चाहिए लेकिन उन्हें समुचित ढंग से पुरस्कृत भी किया जाना चाहिए। हमें सार्वजनिक बैंकों के प्रमुखों के वेतन ढांचे को नौकरशाहों के वेतन से अलग करके देखना चाहिए क्योंकि दोनों के काम का स्वरूप अलग है। प्रदर्शन करने वाले अधिकारियों को प्रोत्साहन भी दिया जाना चाहिए। दो सार्वजनिक बैंकों- भारतीय स्टेट बैंक और बैंक ऑफ बड़ौदा में कर्मचारियों को स्टॉक विकल्प देने का प्रस्ताव कई वर्षों से नॉर्थ ब्लॉक के भीतर धूल खा रहा है। एक मजबूत बैंकिंग प्रणाली आर्थिक प्रगति के लिए अपरिहार्य है और फंसे हुए कर्जों के बोझ तले दबे सार्वजनिक बैंक यह सार्थक भूमिका नहीं निभा सकते हैं। गैर-बैंकिंग वित्त क्षेत्र में पैदा हुए हालिया संकट ने इस समस्या को और भी गंभीर बनाया है और कई बैंकों पर नए सिरे से गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) का बोझ बढऩे का खतरा मंडराने लगा है। इस समस्या से निपटने का परंपरागत तरीका इन बैंकों में नई पूंजी डालने का रहा है। सरकार अब तक इन बैंकों में 3.5 लाख करोड़ रुपये डाल चुकी है जिसमें से करीब 3.3 लाख करोड़ रुपये वर्ष 2009 के बाद आए हैं। 
 
केंद्रीय बजट पर भरोसा
 
पिछले दो वर्षों में ही सरकार ने बीमार सार्वजनिक बैंकों को दुरुस्त करने के लिए 2 लाख करोड़ रुपये डाले हैं। रिकॉर्ड के तौर पर, वित्त वर्ष 2015-16 में रिजर्व बैंक के हाथों बैंकों के बैलेंसशीट की कथित परिसंपत्ति गुणवत्ता समीक्षा (एक्यूआर) शुरू होने के बाद से सार्वजनिक बैंकों का शुद्ध घाटा 1.78 लाख करोड़ रुपये रहा है। राजग के पिछले वर्षों के शासन में सार्वजनिक बैंकों को तीन साल घाटा उठाना पड़ा और लाभ के दो वर्षों में भी केवल 35,000 करोड़ ही कमाए। फंसे कर्जों के निपटान के लिए बैंकों की तरफ से किए गए 9.2 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान इस भारी घाटे की वजह रही है। सार्वजनिक बैंकों का सकल फंसा कर्ज 2014-15 में 2.62 लाख करोड़ रुपये था लेकिन अगले ही साल एक्यूआर लागू होने से यह उछलकर 5.16 लाख करोड़ और 2017-18 में 8.96 लाख करोड़ रुपये हो गया। वैसे 2018-19 में यह मामूली गिरावट के साथ 7.68 लाख करोड़ रुपये रहा? दो सार्वजनिक बैंकों का करीब एक-चौथाई कर्ज डूब रहा है। इसमें से एक बैंक का फंसा कर्ज कुल कर्ज का 20 फीसदी है तो दूसरे बैंक के लिए यह अनुपात 15 फीसदी है। ब्याज से होने वाली आय में बढ़त भी नहीं हो पा रही है क्योंकि की बैंक नए कर्ज नहीं दे पा रहे हैं। जहां गत पांच वर्षों में बढ़े हुए वित्तीय प्रावधानों के चलते बैंकों का शुद्ध घाटा बढ़ा है लेकिन उनकी शुद्ध ब्याज आय भी 2014-15 के 1.81 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2018-19 में 2.3 लाख करोड़ रुपये हो चुकी है।
 
सवाल उठता है कि सरकार को क्या इन बैंकों का स्वामित्व अपने पास बनाए रखना चाहिए? क्या इनका एकीकरण ही रामबाण इलाज है? पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बीमार चल रहे आईडीबीआई बैंक को निजी हाथों में सौंपने की बात कही थी और उसे अब पूरा भी किया जा चुका है। इस बैंक की बहुलांश हिस्सेदारी सरकार के पास नहीं है। भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) इसका नया मालिक बनकर सामने आया है। क्या यह निजीकरण है? देश के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक के अनुषंगी बैंकों के विलय के साथ बैंकों के एकीकरण की शुरुआत हुई थी। बाद में सरकार ने बैंक ऑफ बड़ौदा में दो सार्वजनिक बैंकों का विलय कर अपनी मंशा साफ कर दी। क्या इससे भी समस्या का निदान होगा? क्या हमें इतने सारे सार्वजनिक बैंकों की जरूरत है? क्या उन सभी बैंकों का अलग समूहों में विलय कर बड़े बैंक बनाए जा सकते हैं?
 
एक पैनल ने सभी सार्वजनिक बैंकों के लिए एक होल्डिंग कंपनी बनाने का सुझाव दिया है जिसे सरकार अपनी हिस्सेदारी सौंप देगी ताकि कारगर ढंग से संचालन हो। हालिया मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक वह प्रस्ताव फिर से जिंदा हो चुका है। हो सकता है कि यह प्रस्ताव काम न करे क्योंकि सरकार के लिए अपना नियंत्रण छोड़ देना मुश्किल है। ऐसे में सबसे अच्छा उपाय बैंकिंग अधिनियम में संशोधन करने का है जो सार्वजनिक बैंकों में न्यूनतम 51 फीसदी हिस्सेदारी सरकार के पास रहना अनिवार्य बनाता है।
 
कुछ कमजोर बैंकों की बैलेंस शीट बिगड़ी हुई है लेकिन उनकी जवाबदेही भी काफी है। कुछ एनबीएफसी भी इसी तरह गहरे तरलता संकट के दौर से गुजर रही हैं जिससे उनकी कर्ज चुकाने की क्षमता प्रभावित हो रही है। कुछ कमजोर बैंकों को नीलामी में सबसे ऊंची बोली लगाने वाले को क्यों न दे दिया जाए? हालांकि संभावित खरीदार के लिए बैंक संचालन संबंधी सभी शर्तें पूरी करनी जरूरी होंगी। सरकार कमजोर बैंकों की बिक्री से भी कमाई कर सकती है। ऐसा होने से सार्वजनिक बैंकों में पूंजी डालने का भी राजकोषीय घाटे पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं होगा। यह एक साहसिक विचार है लेकिन नोटबंदी जैसा कदम उठा चुकी सरकार के लिए यह आसान हो सकता है। 
 
(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक, लेखक और जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड के वरिष्ठ परामर्शदाता हैं)
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