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व्यापार समझौते अहम

संपादकीय /  July 03, 2019

इस बात को लेकर एक पारंपरिक समझ विकसित हुई है कि वैश्वीकरण की स्थिति पलट रही है और दुनिया व्यापार समझौतों और खुलेपन के विरुद्ध हो रही है। परंतु गत सप्ताह इस धारणा को तगड़ा झटका लगा। विश्व के सबसे बड़े कारोबारी संस्थानों में से एक यूरोपीय संघ ने दक्षिण अमेरिका के चार बड़े देशों-ब्राजील, उरुग्वे, पैराग्वे और अर्जेंटीना के साथ समझौता किया है। ये चारों देश अभी हाल तक दुनिया के चौथे सबसे बड़े कारोबारी समूह मर्कोसर के बचे हुए पूर्णकालिक सदस्य थे। वेनेजुएला भी इसका सदस्य था लेकिन उसे दो वर्ष के लिए निलंबित कर दिया गया है। एक बार इन दोनों कारोबारी ब्लॉक के बीच व्यापार शुरू होने के बाद वे दुनिया का अब तक का सबसे बड़ा मुक्त व्यापार क्षेत्र बनाएंगे। इस समझौते पर पहुंचने के लिए यूरोपीय संघ और मर्कोसर को 20 वर्ष लग गए। इस बीच दोनों पक्षों को समझौता करना पड़ा। ब्राजील के नए दक्षिणपंथी राष्ट्रपति को अतीत के जलवायु परिवर्तन समझौतों की अनदेखी संबंधी अपनी योजनाओं को स्थगित करना पड़ा ताकि यूरोपीय संघ से वार्ता जारी रह सके, उधर शक्तिशाली यूरोपीय कृषि लॉबी ने भी कुछ बलिदान किए। इससे अंदाजा लगता है कि दोनों पक्षों के राजनीतिक और अफसरशाही जगत के नेता इस व्यापार समझौते से किस हद तक जुड़े हुए थे।

 
इसमें न केवल भारत बल्कि तमाम अन्य देशों के लिए भी कई अहम सबक छिपे हुए हैं। सबसे अधिक नुकसान ब्रिटेन और अमेरिका को हुआ है। माना जा रहा है कि ब्रिटेन बेल्जियम के साथ समझौता खत्म करेगा ताकि भविष्य में अपने लिए ऐसा कोई समझौता कर सके। यूरोपीय संघ और मर्कोसर समझौते की जटिलता ब्रिटेन के अक्खड़पन को उजागर करती है। उधर, डॉनल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका मुक्त व्यापार के लाभ को लेकर शंकालु ही नजर आया है। परंतु यूरोपीय संघ और मर्कोसर दोनों अमेरिका के बड़े कारोबारी सहयोगी हैं, इन दोनों ने इस समझौते से यह दिखाया है कि वे अमेरिका की दिखाई राह पर चलना नहीं चाहते।
 
परंतु जिन देशों को इससे सबक लेना चाहिए, उनमें भारत भी शामिल है क्योंकि वह भी नए व्यापार समझौतों को लेकर खासा अनिच्छुक नजर आया है। इस बीच उसके कई कारोबारी साझेदार अपने बाजार को मजबूत बनाने के नए तरीके तलाश रहे हैं। जबकि अन्य प्राथमिकता वाले कारोबारी मानक भारतीय निर्यातकों के लिए बंद हैं। उदाहरण के लिए भारतीय वस्त्र निर्यातक पहले ही बांग्लादेश जैसे शुल्क मुक्त पहुंच वाले देशों की तुलना में यूरोपीय देशों के लिए महंगे हो चुके हैं। अब मर्कोसर की ओर से एक अतिरिक्त प्रतिस्पर्धा का सामना करना होगा। अमेरिका ने जनरल सिस्टम ऑफ प्रिफरेंशियल स्कीम के तहत कई भारतीय उत्पादों को मिलने वाली शुल्क मुक्ति हाल ही में समाप्त की है। इससे भी मैक्सिको आदि देशों की तुलना में भारतीय निर्यातकों को नुकसान ही होगा। अब वक्त आ गया है कि भारत यूरोपीय संघ के साथ स्थगित पड़ी मुक्त व्यापार वार्ता को दोबारा शुरू करे।
 
यूरोपीय संघ ने कृषि से जुड़े मुद्दों पर समझौते की मंशा जताई है, भारत को इसका लाभ उठाना चाहिए। भले ही डेरी, वाहन निर्माता और औषधि आदि शक्तिशाली समूह इससे नाखुश हों। यूरोपीय संघ के साथ व्यापार वार्ता के लिए आगे नहीं बढऩे और क्षेत्रीय व्यापार समझौतों को भारत की सहभागिता के बिना आगे बढऩे देने की कीमत हमें वैश्विक व्यापार मंच पर अलग-थलग पडऩे के रूप में चुकानी होगी। श्रम आधारित क्षेत्र मसलन चमड़ा और वस्त्र, जो रोजगार तैयार करने की दृष्टि से अहम हैं, उन्हें इसका खमियाजा उठाना होगा। भारत विकास की इस अवस्था में यूं अलग-थलग होना गवारा नहीं कर सकता। 
Keyword: india, trade, economy, agri,
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