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पर्यावरण संरक्षण व आर्थिक विकास के लिए चार विचार

अरुणाभ घोष /  July 02, 2019

राज्यों को जलवायु जोखिमों की गहरी समझ रखते हुए जलवायु परिवर्तन पर अपनी कार्य योजनाओं को अद्यतन बनाना चाहिए। इस बारे में विस्तार से बता रहे हैं अरुणाभ घोष 

 
अब चुनाव पूरे हो चुके हैं, इसलिए चुनावी घोषणा-पत्रों के 'पर्यावरण' से संबंधित वादों को भूलना आसान होता है क्योंकि आम तौर पर पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास को परस्पर विरोधी माना जाता है। यहां ऐसे चार विचार पेश किए जा रहे हैं, जो न केवल पर्यावरण जोखिमों से निपटते हैं बल्कि आर्थिक लागत को घटाते हैं और निवेश एवं वृद्धि के लिए नए मौके पैदा करते हैं। 
 
जलवायु जोखिम खत्म करने की मुहिम 
 
जलवायु जोखिम एक रफ्तार से नहीं बढ़ते हैं, जिनमें तापमान में बढ़ोतरी होने पर अचानक भारी बढ़ोतरी होगी। रिकॉर्ड गर्म हवाएं, तटीय क्षेत्रों में बार-बार बाढ़, सूखे से कृषि उत्पादन पर असर गर्मी, पानी, फसल नुकसान और पारिस्थितिकी बिगडऩे के मिश्रित दबावों का संकेत देते हैं। जलवायु जोखिम आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के जोखिम भी पैदा कर देते हैं। अन्य किसी गंभीर जोखिम की तरह हमें अनुमान से अधिक विकट हालात के लिए तैयार रहना चाहिए, बजाय कम नुकसानदेह परिणामों की उम्मीद में हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने के। जलवायु जोखिम खत्म करने की मुहिम का लक्ष्य एक दशक में भारत के जलवायु जोखिम में अहम कमी लाना होना चाहिए। 
 
सबसे पहले हमें भारत के लिए जलवायु जोखिम मानचित्र विकसित करने की जरूरत है। इसके अलावा अहम जोखिमों जैसे तट, शहरों में गर्मी के दबाव, जल के दबाव, फसल को नुकसान और जैवविविधता को नुकसान पर ध्यान देने की जरूरत है। इसके बाद 2020 के मध्य तक राष्ट्रीय जलवायु जोखिम सूचकांक विकसित किया जाना चाहिए। इस सूचकांक की पद्धतियों को हर साल अद्यतन एवं परिष्कृत बनाया जाना चाहिए। इस मुहिम में बीमा कंपनियों को शामिल किया जाना चाहिए क्योंकि अगर वे विकट मौसमी घटनाओं के लिए पूरी तरह तैयार नहीं होंगी तो शहरी और तटीय क्षेत्रों में बुनियादी ढांचा कारगर साबित नहीं होगा। 
 
इस राष्ट्रीय मुहिम के साथ हर राज्य के लिए सूचकांक बनाए जाने चाहिए। राज्यों को जलवायु परिवर्तन पर अपनी कार्ययोजनाओं को अद्यतन बनाना होगा और जलवायु जोखिमों की गहरी समझ रखनी होगी। शुरुआत में जलवायु जोखिम खत्म करने की रणनीति राष्ट्रीय स्तर और सबसे अधिक जोखिम वाले पांच राज्यों के लिए तैयार की जानी चाहिए। इससे जलवायु जोखिम सूचकांक को राष्ट्रीय और राज्य आपदा नियंत्रण प्राधिकरणों की आपदा जोखिम कम करने की योजनाओं से जोड़ा जा सकेगा। 
 
भारत उत्सर्जन कारोबार योजना  
 
भारत ने अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन को प्रोत्साहन देकर जलवायु के क्षेत्र में अपनी नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया है। लेकिन उभरती अर्थव्यवस्थाओं के जलवायु को बेहतर बनाने से संबंधित कार्यक्रमों में विदेशी निवेश सीमित बना हुआ है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं में जलवायु की पहल सुस्त पड़ रही हैं। ऐसे समय में भारत भारतीय उत्सर्जन कारोबार योजना (आईईटीएस) स्थापित करने के इरादे जाहिर कर अपनी अगुआ स्थिति को मजबूत कर सकता है। आईईटीएस के बहुत से फायदे मिलेंगे। यह उद्योग को दीर्घकालिक एवं विश्वसनीय नीतिगत दिशा देगी और नवोन्मेष को प्रोत्साहित करेगी। इसके अलावा यह भरोसेमंद ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कारोबार के बाजार का खाका तैयार करने, इसे लागू करने और निगरानी में रोजगार पैदा करेगी। इससे सरकार के लिए भी राजस्व का एक नया स्रोत बनेगा। साथ ही उत्सर्जन कम करने के निर्धारित लक्ष्यों को हासिल किया जा सकेगा। कुछ राज्यों और प्रमुख शहरों को शामिल कर एक प्रायोगिक आईईटीएस वर्ष 2022 तक लागू किया जा सकता है। देश भर में आईईटीएस को लागू करने का लक्ष्य 2025 तय किया जा सकता है। 
 
आईईटीएस भारत के वर्तमान ऊर्जा दक्षता कारोबार के ढांचे (यानी प्रदर्शन, हासिल करना और कारोबार योजना) के प्रशासनिक स्वरूप का लाभ उठा सकती है। इसमें नवीकरणीय ऊर्जा प्रमाणपत्र जैसे नाम मात्र के अन्य कार्बन बाजारों को एक योजना में शामिल किया जाएगा ताकि पारदर्शिता और दक्षता बढ़े। अगर आईईटीएस ठीक से डिजाइन की जाती है तो यह नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन, ऊर्जा भंडारण या जलवायु अनुकूल कृषि को बढ़ावा देने वाली अन्य योजनाओं के लिए भी लाभकारी हो सकती है। अच्छी निगरानी और सत्यापन नियमों के साथ लागू होने के बाद आईईटीएस अन्य देशों या क्षेत्रों की उत्सर्जन कारोबारी योजनाओं के साथ जुड़ सकती है ताकि अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्त का प्रवाह बढ़े। 
 
प्लास्टिक घटाओ, प्लास्टिक हटाओ 
 
वर्ष 2018 में भारत ने घोषणा की थी कि वह 2022 तक एक बार इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक को खत्म करना चाहता है। हालांकि केवल प्रतिबंध ही पर्याप्त नहीं होगा। इसमें विकल्पों के विकास और व्यवसायीकरण को बढ़ाने के आर्थिक मौके भी हैं, जो नई हरित औद्योगिक नीति का अहम हिस्सा होने चाहिए। प्लास्टिक की हमारे जीवन में गहरी पैठ है। अगर लोग तकनीकी विकल्पों की मांग नहीं करेंगे तो वे उभरेंगे नहीं । प्रधानमंत्री को 'प्लास्टिक घटाओ प्लास्टिक हटाओ' अभियान की अगुआई करनी चाहिए। 
 
इसके बाद प्लास्टिक के उन स्थायी विकल्पों के बड़े पैमाने पर उत्पादन एवं इस्तेमाल को प्रोत्साहन देने की बात आती है, जो व्यावसायिक रूप से उपलब्ध हैं। वेंचर निवेश और जोखिमों का आंशिक भार उठाने के लिए सरकारी वित्त पोषण से प्रयोगशालाओं में तैयार विकल्पों का बाजारों में परीक्षण करने और उन्हें व्यावसायिक पैमाने पर पहुंचाने में मदद मिलेगी। अंत में प्लास्टिक पर रोक के लिए पुरस्कार देने से वैकल्पिक पैकेजिंग सामग्रियों के लिए शोध एवं विकास, रिसाइक्लिंग के कारोबारी मॉडलों और प्लास्टिक के दोबारा इस्तेमाल के लिए चक्रीय अर्थव्यवस्था शुरू करने को समर्थन मिल सकता है। 
 
राष्ट्रीय एयरशेड प्रबंधन प्राधिकरण 
 
हाल में राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के लिए दस्तावेज पेश किया गया है, जिसमें राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर व्यापक पहलों और क्रियान्वयन एजेंसियों का ब्योरा दिया गया है। लेकिन यहां एक शीर्ष संस्था का अभाव है, जो एनसीएपी को क्रियान्वित करने में सहायता, समन्वय और नियमन कर सके। सरकार को 2019 के अंत तक एक राष्ट्रीय एयरशेड प्रबंधन प्राधिकरण (एनएएमए) स्थापित करना चाहिए, जिसके पास वैधानिक शक्तियां होनी चाहिए। शहरी-ग्रामीण और राज्यों के बीच की दूरी खत्म करने के लिए एयरशेड पर ध्यान देना जरूरी है। इससे एनएएमए को शहरी स्थानीय संस्थाओं और ग्राम पंचायतों से समन्वय स्थापित करने का अधिकार मिलेगा। राज्य सरकारों की सक्रिय भागीदारी के बिना एनसीएपी के तहत क्षेत्रीय हस्तक्षेप असफल रहेंगे। इसी तरह अगर वैज्ञानिक एयरशेड अवधारणा को नहीं अपनाया गया तो क्षेत्रों में दखल सफल नहीं होगी। एनएएमए को संबंधित एजेंसियों को निर्देश देने का अधिकार दिया जाना चाहिए। 
 
वायु प्रदूषण से निपटने की प्रवर्तन क्षमता का अत्यंत अभाव है। एनएएमए को राज्यों के स्तर पर संख्या और तकनीकी क्षमता दोनों लिहाज से प्रवर्तन क्षमता बनाने और मूल्यांकन करने की जिम्मेदारी दी जा सकती है। इस तरीके से ढांचा बनाने से एनएएमए में सरकारी, निजी और तकनीकी या नागरिक समाज का प्रतिनिधित्व होगा। यह केवल तभी प्रभावी होगा, जब इसकी वैधानिक शक्तियों को वास्तविक संसाधनों का सहारा मिलेगा। वायु प्रदूषण को खत्म करने से जन स्वास्थ्य लागत में अहम कमी आ सकती है। इससे हमारे शहर रहने लायक बनेंगे और ज्यादा निवेश आकर्षित करेंगे। 
 
जब तक हम पर्यावरण पहल को महज एक लागत समझेंगे तब तक लोग, उद्योग और सरकार पूरी व्यवस्था के साथ खेलते रहेंगे या कोई कदम उठाने से बचते रहेंगे। पर्यावरण बाह्यता तब तक किसी की जिम्मेदारी नहीं है, जब तक सार्वजनिक नीति निर्माता इसे किसी का काम नहीं बनाते हैं। पर्यावरण को लगातार अच्छा बनाए रखने और आर्थिक विकास के लिए प्रोत्साहन दिए जा सकते हैं, बाजार बनाए जा सकते हैं और व्यक्तिगत एवं सामूहिक व्यवहार में बदलाव लाया जा सकता है। 
 
(लेखक ऊर्जा, पर्यावरण एवं जल परिषद के सीईओ हैं।)
Keyword: environment, world, india, health, population,,
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