बिजनेस स्टैंडर्ड - चक्रीय अर्थव्यवस्था पर करना होगा नए सिरे से विचार
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चक्रीय अर्थव्यवस्था पर करना होगा नए सिरे से विचार

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  July 01, 2019

मैं एक अंधेरी और मैली नजर आ रही 'फैक्टरी' के भीतर हूं जहां प्लास्टिक के कचरे का पुनर्चक्रण किया जा रहा है। इससे पहले मैंने जाकर यह देखा था कि हमारे घरों से आने वाले प्लास्टिक के कचरे को कैसे अलग-अलग किया जाता है और कैसे देश का गरीब तबका उसका कारोबार करता है। दिल्ली के बाहरी इलाके में स्थित टिकरी में यह सब देखते हुए मैंने सवाल किया था कि यह प्लास्टिक कहां जाता है? मुझे बताया गया कि यह दिल्ली के औद्योगिक इलाके बवाना और नरेला में भेजा जाता है। इसके बाद मैं कई फैक्टरियों के बीच ऐसी फैक्टरी में आई थी जो इस कचरे को खरीदकर उसका पुनर्चक्रण करती है। यह एक भारी भरकम शब्द है लेकिन इसका अर्थ क्या है?

 
व्यापक तौर पर देखा जाए तो कुछ ऐसी तस्वीर बनती है: यह कचरा सावधानीपूर्वक अलग किया जाता है क्योंकि हर फैक्टरी केवल एक तरह के प्लास्टिक का प्रसंस्करण कर सकती है। पहले इसे अलग किया जाता है, फिर उबाला जाता है, गर्म किया जाता है और इसे तार के आकार में ढाला जाता है। प्लास्टिक के इस तार को प्लास्टिक के दानों में परिवर्तित किया जाता है और अब इससे नए उत्पाद बनाए जाते हैं। यह काम करने वाले लोग गरीब हैं और उनकी काम करने की परिस्थितियां निहायत खराब। परंतु वे अपनी आजीविका के लिए ऐसे कारोबार में शामिल हैं जो कचरे से संसाधन जुटाता है। हमें उनके प्रयास को कम करके नहीं आंकना चाहिए। अगर इस कचरे का प्रसंस्करण नहीं किया जाता तो इसे खुले में जलाया जाता या इससे कचरे के ढेर बनते। बवाना जैसी जगहों ने हमें बचा रखा है।
 
इस व्यापार का अर्थशास्त्र तभी कारगर होता है जब गरीबों के स्वास्थ्य और पर्यावरण को कमतर आंका जाता है। सन 1991 में विश्व बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री लैरी समर्स ने यह हिमायत की थी कि विषाक्त कचरे और प्रदूषण फैलाने वाली फैक्टरियों को अल्प विकसित देशों में स्थानांतरित कर दिया जाना चाहिए। समर्स बाद में हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय के अध्यक्ष बने, उनकी इस बयान के लिए काफी आलोचना भी की गई लेकिन आखिरकार वह सही साबित हुए। दुनिया भर में यह सिलसिला चल निकला। तमाम प्रमुख देशों ने अपनी प्रदूषण फैलाने वाली फैक्टरियां गरीब देशों में स्थानांतरित कीं और वहां कचरे के पहाड़ खड़े कर दिए। यह सब व्यापार और गरीबों की आजीविका के नाम पर किया गया। 
 
आखिरकार चीन ने 2018 में प्लास्टिक कचरे का आयात बंद किया। अब नए बाजारों की तलाश थी। मलेशिया और इंडोनेशिया समेत तमाम नए देश स्वेच्छा से आगे आए। परंतु प्लास्टिक कचरा ऐसे ठिकाने खोजता रहा जहां पुनर्चक्रण सस्ता हो और स्थानीय कारोबारों को लाभान्वित कर यह रोजगार मुहैया कराए। यह चक्रीय अर्थव्यवस्था का आधुनिक विश्व है। समर्स का कहना सही साबित हुआ। यह अलग बात है कि विकसित देशों का कचरा संभालने वाले ये सारे देश अपने ही कचरे से जूझ रहे हैं। सच तो यह है कि अगर अमीर देश पुनर्चक्रण की असली कीमत चुका सकते तो वे भी अपना कचरा गरीब देशों में नहीं भेजते। पूरा मामला लागत कम करने का है। यह सिलसिला बढ़ता जा रहा है। मई 2019 में बेसल सम्मेलन की बैठक में पहली बार प्लास्टिक कचरे को उस समझौते में शामिल किया गया जो तमाम देशों को पारंपरिक कचरे में उत्पन्न हानिकारक तत्त्वों के लिए जवाबदेह ठहराता है। इसके लिए भी लंबी लड़ाई लडऩी पड़ी। नॉर्वे ने एक खास किस्म के प्लास्टिक के कारोबार को नियमित करने के लिए संशोधन किए जिसका अमेरिका ने तगड़ा प्रतिवाद किया और आखिरकार काफी शिथिल करने के बाद इस बात पर सहमति बनी कि संक्रमित प्लास्टिक कचरे और तथाकथित स्वच्छ प्लास्टिक कचरे के बीच भेद किया जाएगा। स्वच्छ प्लास्टिक कचरे का पुनर्चक्रण पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए किया जाएगा। इस प्रकार कुछ नियंत्रण कायम हुआ लेकिन यह कारोबार जारी रहेगा और समर्स का सिद्घांत भी लागू रहेगा। 
 
सवाल यह है कि क्या यही हमारा भविष्य है? कचरा संसाधन हो सकता है लेकिन यह भी साफ है कि हमें यथासंभव इसका पुनर्चक्रण और जितनी बार संभव हो दोबारा इस्तेमाल करना होगा। बेसल समझौता हानिकारक उत्पादों का अवैध कारोबार रोकने में सहायक हो सकता है लेकिन यह कचरे के कारोबार, पुनर्चक्रण और प्रसंस्करण की भी इजाजत देता है। पुनर्चक्रण की अर्थव्यवस्था को देखते हुए कहा जा सकता है कि ऐसा केवल वहीं होगा जहां लागत कम होगी और जहां पर्यावरण तथा स्वास्थ्य मानक शिथिल होंगे। 
 
मामला केवल प्लास्टिक और अमीरों के हित का नहीं है। यूरोपीय संघ ने प्लास्टिक कचरे को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। उसने इलेक्ट्रॉनिक कचरे के निर्यात की इजाजत भी चाही है। अफ्रीका के देशों में पुराने कपड़े और कारें खपाई जा रही हैं। यह सब परोपकार के नाम पर किया जा रहा है। इससे एक नए तरह का स्थानीय कारोबारी हित तैयार हो रहा है। यह कचरे का कारोबार करना चाहता है। यही उनका कारोबार है। अब समय आ गया है कि हम कचरे के इस कारोबार पर नए सिरे से विचार करें। हमें अपना कचरा खुद निपटाने पर विचार करना होगा। हर शहर को प्रसंस्करण समेत अपने कचरे का प्रबंधन करना चाहिए। ऐसा करके ही हम कचरा उत्पादित करने और उसके पुनर्चक्रण को लेकर अधिक जिम्मेदार हो पाएंगे। हमें इसके लिए इस चक्रीय अर्थव्यवस्था पर लगाम लगानी होगी। इसके लिए हमें कोई स्थायी तरीका तलाश करना होगा। 
Keyword: india, economy, GDP, plastic,,
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