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मूल चिंता बरकरार

संपादकीय /  July 01, 2019

एयर इंडिया के लिए बॉन्ड बाजार से 22,000 करोड़ रुपये जुटाने की सरकार की योजना जोखिम से भरी हुई है। भारी भरकम धन जुटाने की योजना का व्यापक लक्ष्य इस सरकारी विमानन सेवा को बेचने के दूसरे प्रयास के पहले इसके लिए कुछ वित्तीय संसाधन जुटाने का है। घाटे में चल रही इस विमानन सेवा पर भारतीय और विदेशी ऋणदाताओं की 58,000 करोड़ रुपये की राशि बकाया है। ऐसे में 7,000 करोड़ और 15,000 करोड़ रुपये की दो किस्तों में जुटाई जाने वाली उक्त राशि का इस्तेमाल बिना सरकारी बजट की मदद लिए कुछ कर्ज चुकाने में किया जाएगा। प्रथम दृष्टि में यह समझदारी भरा निर्णय लगता है क्योंकि विमानन कंपनी का कोई संभावित ग्राहक इस कर्ज का बोझ सहने को तैयार नहीं होगा।

 
परंतु तीन बातें इस कदम को लेकर संदेह पैदा करती हैं। पहला, चूंकि संभावित निवेशक 53,584 करोड़ रुपये के समेकित घाटे वाली कंपनी के बॉन्ड में कोई रुचि नहीं दिखाएंगे इसलिए सरकार ने इनके लिए सॉवरिन गारंटी देने का निर्णय लिया है। नब्बे के दशक में एनरॉन बिजली कंपनी का उदाहरण सॉवरिन गारंटी को लेकर सतर्कता बरतने की एक बड़ी वजह है। गहरे कर्ज में डूबी इस विमानन कंपनी के कर्ज के पुनर्गठन के कई प्रयास किए गए लेकिन नाकामी हाथ लगी। क्या वित्त वर्ष 2018 में पिछले वर्ष की तुलना में 58 फीसदी ज्यादा शुद्ध घाटा सहन करने वाली कंपनी इन बॉन्ड के लिए तैयार है? यकीनन ऐसे वक्त जबकि अन्य विमानन सेवाएं जेट एयरवेज की विदाई से लाभान्वित हो रही हैं, एयर इंडिया कोई फायदा उठाने में नाकाम रही है। कंपनी के 15 विमान इसलिए जमीन पर खड़े हैं क्योंकि कंपनी कलपुर्जा बनाने वालों को भुगतान नहीं कर सकी है।
 
दूसरा, भारतीय बॉन्ड बाजार बहुत खोखला है और आईएलऐंडएफएस तथा अन्य डिफॉल्ट के बाद से उसकी हालत बहुत अच्छी नहीं है। बॉन्ड की पर्याप्त बिक्री न होने पर सरकार ने यह संकेत दिया है कि वह जीवन बीमा निगम और कर्मचारी भविष्य निधि को इन बॉन्ड को खरीदने को कहेगी। यह एक परंपरा सी बन गई है। चूंकि दोनों संस्थान सरकारी हैं और सार्वजनिक कोष से चलते हैं इसलिए यह ऐसा ही होगा मानो सरकारी कंपनी ओएनजीसी, एक अन्य सरकारी कंपनी एचपीसीएल में निवेश करे। राजग सरकार ने वित्त वर्ष 2019 में ऐसे ही सौदों के जरिये विनिवेश का आंकड़ा सुधारा। सरकारी संस्थानों के बीच ऐसी चक्रीय व्यवस्था से एयर इंडिया की समस्या का तात्कालिक हल ही निकल सकता है। तीसरा, वित्त मंत्रालय ने एयर इंडिया से कहा है कि वह परिसंपत्तियों और अनुषंगियों की बिक्री से भुगतान की राशि जुटाए। कंपनी लंबे समय से अपनी कुछ अनुषंगियों की बिक्री का प्रयास कर रही है लेकिन नाकाम रही है।
 
यकीनन सरकार ने निजीकरण के पिछले प्रयास की नाकामी से सबक लिया है। यही कारण है कि वह इस बार बिक्री की शर्तों में सुधार को तैयार है। उसने प्रस्ताव रखा है कि नियमों को शिथिल बनाकर खरीदार को बिना समय सीमा के बंधन के शेयर बिक्री का अवसर दिया जाएगा। पहले तीन वर्ष की समय सीमा लगाई गई थी। इसके अलावा खरीदार के मौजूदा कारोबार में विलय या विपरीत विलय और विमानों की बिक्री या लीजबैक की सुविधा देने की बात भी शामिल है ताकि नया मालिक पूंजी जुटा सके। इसके अलावा सरकार बची हुई हिस्सेदारी भी नहीं रखेगी। यह नियम संभावित निवेशकों के लिए सबसे बड़ी बाधा था। ये शर्तें भले ही आकर्षक प्रतीत हो रही हों लेकिन ये विमानन कंपनी के परिचालन में निहित गहन ढांचागत समस्याओं को हल नहीं करतीं। जबकि संभावित खरीदार इन पर विचार करेगा। सरकार को पता लगेगा कि इन कदमों से समस्या केवल टल सकती है।
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