बिजनेस स्टैंडर्ड - शत्रु और मित्र दोनों की दृष्टि में अजेय हैं मोदी
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शत्रु और मित्र दोनों की दृष्टि में अजेय हैं मोदी

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  June 30, 2019

ऐसे समय में जब धु्रवीकरण इतना बढ़ गया है कि हम अपनी क्रिकेट टीम की जर्सी के रंग को लेकर भी झगडऩे लगे हैं, एक बात ऐसी है जिस पर मोदी के प्रशंसक और आलोचक दोनों एकमत हैं: यह कि मोदी अपराजेय हैं। न केवल अभी बल्कि निकट भविष्य में भी वह पराजित होते नहीं दिखते। सबसे पहले बात करते हैं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वफादारों की। उनको लगता है कि कम से कम अगले 25 वर्ष तक उनको सत्ता से हटाना संभव नहीं। काफी हद तक यह कांग्रेस के सन 1952 से 1989 तक के शासनकाल के समान होगा जो केवल सन 1977 और 1979 में थोड़े समय के लिए सत्ता से हटी थी। उनका कहना है कि यह एकदम उचित है क्योंकि राष्ट्रवादी दक्षिणपंथियों को भी देश में उसी तरह आकार में ढालने का हक है जैसे धर्मनिरपेक्ष वाम ने आजादी के बाद किया।

 
पांच वर्षों में वे दिखा भी चुके हैं कि पुराना सामाजिक-राजनीतिक ढांचा कितना कमजोर था, खासतौर पर धर्मनिरपेक्षता। यह भी कि समाजवाद और कल्याणकारी राजनीति को मध्य-वाम से परे ले जाकर कहीं बेहतर क्रियान्वयन किया जा सकता है और उन्हें अधिक प्रभावी तरीके से वोट में बदला जा सकता है। शैक्षणिक और बौद्धिक जगत में वैचारिक और दार्शनिक प्रकृति में बदलाव की योजना बखूबी काम कर रही है। उन्हें यकीन है कि बार-बार बहुमत हासिल कर वे 2025 तक यानी मोदी के तीसरे कार्यकाल के आरंभ तक अपनी विचारधारा से जुड़े अधिकांश लक्ष्यों को हासिल कर लेंगे। उनका मानना है कि देश को हिंदू राष्ट्र की अपनी अवधारणा के मुताबिक बदलने का लक्ष्य अगले छह वर्ष में हासिल किया जा सकता है। यह काम इसी संविधान के दायरे में रहकर किया जा सकता है। वह वर्ष आरएसएस की स्थापना का शताब्दी वर्ष भी है। मोदी के वफादारों को लगता है कि उन्होंने देश के गरीबों के साथ वैसा ही सामाजिक रिश्ता कायम कर लिया है जैसा जवाहरलाल नेहरू या इंदिरा गांधी ने किया था। उन्हें लगता है कि उन्होंने कांग्रेस को हिंदू राष्ट्रवाद के जरिये नहीं बल्कि कांग्रेस के पुराने लोककल्याणवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर उपजे जुनून और मोदी के व्यक्तित्व के करिश्मे की बदौलत ध्वस्त किया है। उन्हें लगता है कि इस सामाजिक रिश्ते ने मोदी को अपराजेय बनाया है। अच्छी से अच्छी सेना भी युद्ध हार सकती है लेकिन उनकी जितनी परीक्षा जबरदस्त जीत में होती है, उतनी ही व्यवस्थित वापसी में भी होती है। कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष उसी तरह आत्मघात की स्थिति में है जैसे सन 1962 में कायर जनरलों के नेतृत्व में हमारी सेना ने मैदान छोड़ा था। मतदाताओं के प्रति विपक्ष की झूठी नाराजगी इसका चरित्र उजागर कर रही है। कांग्रेस का मानना है कि मोदी जीत गए लेकिन भारत हार गया है। प्रधानमंत्री ने बीते दिनों संसद में इसका उल्लेख करते हुए विपक्ष पर तंज कसा। कांग्रेस के सहयोगियों तथा अन्य दलों का हाल और बुरा है। उदाहरण के लिए रोजगार की तलाश करने वालों पर कर्नाटक के मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी की नाराजगी जिसमें उन्होंने कहा था कि आपने मोदी को वोट दिया है, मोदी से रोजगार मांगिए। या मायावती का हार के लिए अपने सहयोगी अखिलेश यादव को दोष देना। ममता बनर्जी भी पीछे नहीं हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री का भाजपा के खिलाफ साझा मोर्चे में कांग्रेस और वाम दलों को आमंत्रित करना नैतिक दिवालियापन दर्शाता है। यह आह्वान राजनीतिक और चुनावी दृष्टि से भी सही नहीं है। इससे यही संदेश जाता है मानो ममता आगामी विधानसभा चुनाव में पहले ही हार मान चुकी हैं। अन्य जिनमें वाम से लेकर नवीन पटनायक, जगनमोहन रेड्डी, केसीआर और स्टालिन तक शामिल हैं, किसी गिनती में ही नहीं हैं। विपक्ष की दलील आकर्षक है कि संसाधनों के मामले में 95:5 की बढ़त बनाने, संस्थानों पर नियंत्रण, संस्थानों पर नियंत्रण और समर्थक मीडिया की बदौलत मोदी अजेय हुए हैं। उनका कहना है कि अगर जनता निर्वाचित तानाशाही पसंद करती है तो क्या कर सकते हैं?
 
ऐतिहासिक रूप से देखे तो राजीव गांधी के बाद कांग्रेस का यही रवैया था। लोगों द्वारा नकारे जाने पर पार्टी कभी उनसे यह जानने की कोशिश भी नहीं करती थी कि उसे क्यों नकारा गया? बतौर चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव एक दिलचस्प निष्कर्ष देते हैं: अगर किसी प्रदेश में कांग्रेस का मत प्रतिशत 20 फीसदी से अधिक गिर जाता है तो वह कभी वापसी नहीं कर पाती। वह मानो जनता की मूर्खता से नाराज होकर मान लेती है कि जनता ही उसके लायक नहीं है। राहुल गांधी कभी अपने गढ़ रहे अमेठी में हार के पांच सप्ताह बाद भी वहां नहीं गए हैं, इसे इस उदाहरण से समझा जा सकता है। अगर आपने मान लिया हो कि मोदी अजेय हैं, तभी आप ऐसी उपेक्षा कर सकते हैं। ऐसे में बेहतर होगा कि मोदी विरोध का काम उदारवादी कार्यकर्ताओं, बौद्धिकों और जनहित याचिका लगाने वालों पर छोड़ दिया जाए। ऐसे में राजनैतिक बदलाव लाने की चुनौती अधकचरे प्रतिरोध में तब्दील हो जाती है।
 
अगर मोदी समर्थक और विरोधी दोनों सही हैं और वह पूरी तरह अजेय हैं तो पहला असर हम राजनीतिक टीकाकारों पर पड़ेगा। सच तो यह है कि राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता। यहां चीजें लौट कर आती हैं, भले ही पहिया घूमने में थोड़ा ज्यादा वक्त लग जाए। नेहरू-गांधी परिवार के साथ ऐसा हो चुका है। लोकतांत्रिक देशों का इतिहास ऐसे आत्मघाती उदाहरणों से भरा पड़ा है जहां बहुत जल्दी जीत या हार की घोषणा कर दी जाती है। तमाम ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने समर्पण नहीं किया, झटका सहा और दोबारा उठ खड़े हुए। आपातकाल के बाद की कांग्रेस और आडवाणी-वाजपेयी की भाजपा इसका सटीक उदाहरण है। इंदिरा गांधी ने ढाई वर्ष में वापसी की। वह जेल भी गईं और बेलछी में हाथी की सवारी के साथ वापस लौटीं। जब उन्हें जनता सरकार की कमजोरी, खासकर राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में कमजोरी का अहसास हुआ तो उन्होंने हमला किया और सफल रहीं। सन 1980 में जनता पार्टी (जिसमें जनसंघ शामिल था) बिखर गई और इंदिरा गांधी ने जोरदार जीत हासिल की। परंतु वाजपेयी-आडवाणी की जोड़ी ने अपने पराजित सैनिकों को जुटाकर भाजपा के रूप में नई पार्टी बनाई। चार वर्ष के भीतर उसे तब झटका लगा जब 1984 की कांग्रेस लहर में पार्टी दो सांसदों तक सिमट गई। सारे विपक्ष का यही हाल था। वे हताश नहीं हुए। उन्होंने कमजोरियों का आकलन किया और प्रतिबद्धता से डटे रहे। याद रहे उस वक्त राजीव ने 414 सीटों पर जीत हासिल की थी। मोदी तो आज भी 303 ही जीत पाए हैं।
 
तीन वर्ष के भीतर उसी पराजित विपक्ष ने राजीव गांधी की हालत खराब कर दी। उनकी गलतियों ने विपक्ष की मदद की लेकिन भाजपा ने संसद में और सड़क पर कड़ी मेहनत की। उसने कांग्रेस के असंतुष्टों को साथ लिया और उन विपक्षी नेताओं को भी जिनसे वह मुकाबिल थी। वह मीडिया और सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ बोफोर्स समेत तमाम घोटाले सामने लाए। भाजपा सन 1998 में सत्ता में आ सकी क्योंकि उसके पास राम मंदिर और नव हिंदुत्व के रूप में ऐसा मुद्दा था जिसकी काट कांग्रेस और समाजवादियों के पास नहीं थी। भले ही आपको रास न आए लेकिन एक वैकल्पिक विचार की आवश्यकता थी। 35 वर्ष लगे लेकिन आज भाजपा का उतना ही दबदबा है जितना एक दौर में कांग्रेस का था।
 
राजनीतिक हार या जीत से सबक सीखने का सबसे अच्छा तरीका है अपने ही वक्त के प्रमाणों पर गौर करना। मोदी अपराजेय भले नजर आ रहे हों लेकिन वह इंसान ही हैं। वह कोई अवतार नहीं हैं। 2014 की जीत के कुछ महीनों के अंदर अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में उनकी पार्टी को 67-3 से हराया था। उस वक्त आप एक नया और बड़ा विचार था। यह क्रिकेट का मौसम है और मैं मोदी को लेकर असदुद्दीन ओवैसी की शानदार टिप्पणी पेश करूंगा: 'वह विवियन रिचर्ड की तरह संसद में प्रवेश करते हैं, गेंदबाजों के प्रति अवमानना से भरपूर। परंतु इंगलैंड ने समस्या का हल खोज निकाला। उसने दूर-दूर फील्डर खड़े कर एक रक्षात्मक फील्डिंग जमाई ताकि वे बल्ला घुमाते और शॉट लगाते हुए बोर हो जाएं और गलती करें।' धैर्य, अपना बचाव और सामने वाले की गलती का इंतजार। यह भी एक रणनीति है। मगर शर्त यह है कि बुद्धिमता से कहीं ज्यादा साहस दिखाएं और मजबूत बने रहें।
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