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अच्छा और बुरा

संपादकीय /  June 30, 2019

ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो देश के बैंकों ने आखिरकार फंसे हुए कर्ज की समस्या पर लगाम लगा ली है। फंसे हुए कर्ज का चक्र मार्च 2018 में उच्चतम स्तर पर पहुंचा। ऐसा भारतीय रिजर्व बैंक की चार वर्षों की उस अथक मेहनत के कारण हुआ जो उसने फंसे हुए कर्ज को चिह्नित करने में की। आरबीआई की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के अनुसार अधिकांश ऐसी परिसंपत्ति के चिह्नित हो जाने के कारण सकल एनपीए अनुपात मार्च 2019 में गिरकर 9.3 फीसदी हो गया और मार्च 2020 तक इसके 9 फीसदी हो जाने का अनुमान है। सरकारी बैंकों के सकल एनपीए अनुपात में भी गिरावट आ सकती है और यह मार्च 2019 के 12.6 फीसदी से गिरकर मार्च 2020 तक 12 फीसदी हो सकता है। वहीं निजी क्षेत्र के बैंकों का सकल एनपीए अनुपात 3.7 फीसदी से सुधरकर 3.2 फीसदी हो सकता है।

 
इन सभी बैंकों का प्रोविजन कवरेज रेशियो (पीसीआर) तेजी से बढ़ता हुआ मार्च 2019 में 60.6 प्रतिशत हो गया। इससे पहले सितंबर 2018 में यह 52.4 फीसदी जबकि मार्च 2018 में 48.3 फीसदी था। इससे बैंकिंग क्षेत्र में मजबूती आई है। रिकग्निशन, रिजॉल्युशन और रिकवरी के तीन 'आर' में से पहला आर हकीकत में बदल चुका है। अब इसका अधिक कठिनाई भरा हिस्सा बकाया है। अच्छी खबर यह है कि ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) एक मजबूत नियमन है, हालांकि कुछ मामलों में निस्तारण अदालती चक्कर में उलझा हुआ है। आरबीआई के जून 2019 में जारी तनावग्रस्त परिसंपत्ति से संबंधित संशोधित खाके के अनुसार बैंकों के लिए ऋणशोधन के आवेदन में देरी करने पर उनका नुकसान होना है। दिलचस्प बात है कि केंद्रीय बैंक ने व्यवस्थित जोखिम संबंधी सर्वेक्षण में पाया कि प्रतिक्रिया देने वालों में से आधे यह मानते हैं कि अगले एक वर्ष में भारतीय बैंकिंग क्षेत्र की संभावनाओं में कुछ सुधार होगा। इसमें आईबीसी की प्रक्रिया के तहत आई स्थिरीकरण का भी योगदान रहेगा। रिपोर्ट के मुताबिक इससे घरेलू वित्तीय क्षेत्र में विश्वास भी बहाल होगा।
 
बहरहाल, बैंकों के लिए यह समझना आवश्यक है कि वे अब पुराने तौर तरीकों से काम नहीं करते रह सकते। वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट यह भी कहती है कि अगर सरकार ने अतिरिक्त पूंजी नहीं दी तो अगले वर्ष तक कम से कम पांच बैंक न्यूनतम पूंजी पर्याप्तता के नियामकीय स्तर से नीचे रहेंगे। चाहे जो भी हो लेकिन बैंकों का पुनर्पूंजीकरण एक अस्थायी उपाय भर है जबकि स्थायी निदान होगा इन कमजोर बैंकों का बड़े बैंकों में विलय करना ताकि उनका बेहतर और किफायती ढंग से प्रबंधन किया जा सके।
 
बड़ी समस्या है गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की सेहत। इस क्षेत्र का सकल एनपीए अनुपात 2017-18 के 5.8 फीसदी से बढ़कर 2018-19 में 6.6 फीसदी हो गया। जबकि पूंजी पर्याप्तता अनुपात मार्च 2018 के 22.8 फीसदी से घटकर 19.3 फीसदी रह गया। सबसे बढ़कर कुछ गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां देनदारी चूक रही हैं या अपने भुगतान दायित्वों का निबाह नहीं कर पा रही हैं। केंद्रीय बैंक के विश्लेषण के मुताबिक अगर सबसे बड़ी आवास वित्त कंपनी विफल होती है तो बैंकिंग व्यवस्था की पहली श्रेणी की पूंजी का करीब 5.8 फीसदी खत्म हो जाएगा। आरबीआई ने यह कहकर उत्साह पैदा करने की कोशिश की कि इस क्षेत्र को कड़े बाजार अनुशासन के अधीन किया गया क्योंकि बेहतर प्रदर्शन करने वाली कंपनियों का फंड बढ़ता रहा। जबकि जिन कंपनियों की परिसंपत्ति गुणवत्ता पर सवाल थे उनके ऋण की लागत बढ़ी। परंतु केवल इतना पर्याप्त नहीं था, नियामक को भविष्य में संक्रमण के जोखिमों से बचने के लिए अग्रगामी कदमों पर विचार करने की आवश्यकता है।
Keyword: bank, loan, debt, RBI, NPA,,
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