बिजनेस स्टैंडर्ड - किसानों तक पहुंचे बांधों का पानी
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किसानों तक पहुंचे बांधों का पानी

मिहिर शाह /  June 27, 2019

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने 21 जुलाई, 2015 को राज्य विधानसभा में एक चर्चा के दौरान कहा कि देश के बड़े बांधों में से 40 फीसदी राज्य में हैं 'लेकिन राज्य का 82 फीसदी क्षेत्र बारिश के पानी पर निर्भर है। जब तक आप किसान के खेतों को पानी नहीं देंगे तब तक आप उसे आत्महत्या करने से नहीं बचा सकते। हम वाटरशेड और संरक्षण के अपने नजरिये को त्याग चुके हैं। हम हर जगह बांध बनाने से पहले किसी क्षेत्र के जल विज्ञान, भूविज्ञान और भौगोलिक स्थिति के बारे में विचार नहीं करते हैं। हमने बांधों को बढ़ावा दिया है, सिंचाई को नहीं। लेकिन अब इस स्थिति को बदलना होगा।' 

 

देवेंद्र फडणवीस ने भारत में सिंचाई के संकट का सटीक ब्योरा दिया है। हम आजादी के बाद के 70 वर्षों मे लगातार 'आधुनिक भारत के मंदिर (बांध)' बनाते रहे, लेकिन ऐसा लगता है कि बार-बार सूखे और पानी की किल्लत की समस्या लगातार विकराल होती जा रही है। हम उनके निर्माण पर 4 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च कर चुके हैं। लेकिन इन बांधों में जमा कई लाख करोड़ लीटर पानी उन किसानों तक नहीं पहुंचा है, जिनके लिए ये बनाए गए हैं। 

जैसा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहा करते थे कि 'खर्च और मिलने वाले लाभ का अंतर' बढ़ रहा है। सिंचाई की शब्दावली में यह सिंचाई की संभावना (11.3 करोड़ हेक्टेयर) और वास्तव में इस संभावना के इस्तेमाल (8.9 करोड़ हेक्टेयर) के बीच अंतर बढ़ रहा है। इस अंतर को खत्म करना उन अहम सुधारों की दूसरी किस्त का लक्ष्य होना चाहिए, जो भारत के जल प्रबंधन के लिए जरूरी हैं। 2.4 करोड़ हेक्टेयर का अंतर हमारे सिंचाई क्षेत्र की नाकामी को दर्शाता है। लेकिन यह आसान लक्ष्य है, जिस पर ध्यान देकर सिंचित रकबे में करोड़ों हेक्टेयर का इजाफा किया जा सकता है। हम यह काम नए बांध बनाने की आधी से भी कम लागत में कर सकते हैं। नए बांध बनाना महंगा हो रहा है। इनके निर्माण कार्य में बड़ी देरी हो रही है और प्रमुख परियोजनाओं की लागत 1,382 फीसदी बढ़ गई है। मझोले बांधों की लागत में भी औसत 325 फीसदी का इजाफा हो गया है। इसमें उनकी वह लागत शामिल नहीं है, जो मानव और पर्यावरण को चुकानी पड़ती है। 

कावेरी, कृष्णा, गोदावरी, नर्मदा और ताप्ती जैसे प्रमुख नदी बेसिन पूर्णतया या आंशिक रूप से बंद हो गए हैं। इन पर आगे और बांध बनाने की मामूली संभावना हैं। गंगा के मैदानों में भौगोलिक क्षेत्र पूरी तरह समतल है, इसलिए वहां बांध बनाकर पानी को रोकना संभव नहीं है। वहीं ऊपर हिमालय में नए पर्वतों की तुलना में विश्व की सबसे नाजुक पारिस्थितिकी है, जहां कटाव की दर बहुत अधिक है। उनके ऊपरी जल ग्रहण क्षेत्र में मिट्टी को रोके रखने के लिए मामूली वनस्पति है। इसलिए हिमालय से निकलने वाली नदियों में ज्यादा गाद होती है। गाद के कारण कई बार बिजली टर्बाइन खराब हो जाते हैं। जलवायु परिवर्तन से नदियों के प्रवाह का अनुमान लगाना अत्यधिक अनिश्चित है। नदियों के प्रवाह क्षेत्र में बदलाव से भी कई क्षेत्र सूखे हो जाएंगे, जिसका स्थानीय लोगों की जीविका पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। 

ब्रह्मपुत्र घाटी और पूर्वी हिमालय में उसके आसपास के ऊंचे क्षेत्रों की सतही बनावट में नया बदलाव आ रहा है। इसका मतलब है कि गहरे गड्ढे बनने या नदी में पानी एवं तलछट के जरिये भौगोलिक क्षेत्र में बदलाव खतरनाक साबित हो सकता है। उत्तराखंड और नेपाल के हाल के घटनाक्रम इन वैज्ञानिक अनुमानों के दुखद सबूत हैं। इसलिए हमें कुछ ऐसे सुधारों की जरूरत है, जो मांग पक्ष के प्रबंधन पर केंद्रित हों। इसमें हमें लापरवाह तरीके से आपूर्ति बढ़ाने की हमारी सनक को छोडऩा होगा, जिसे भ्रष्टाचार की राजनीतिक अर्थव्यवस्था से भी ईंधन मिल रहा है। 

इन सुधारों का दुनिया के बहुत से हिस्सों में परीक्षण भी हो चुका है। इनमें अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, जापान एवं ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित राष्ट्र, चीन, श्रीलंका, फिलीपींस, इंडोनेशिया, वियतनाम एवं मलेशिया जैसे पूर्वी एवं दक्षिण एशियाई देश, उज्बेकिस्तान और किर्गिस्तान जैसे मध्य एशियाई देश, तुर्की एवं ईरान जैसे पश्चिम एशियाई देश, माली, नाइजर, तंजानिया और मिस्र जैसे अफ्रीकी देश और मैक्सिको, पेरू, कोलंबिया और चिली जैसे लैटिन अमेरिकी देश शामिल हैं। लेकिन इससे भी अहम भारत में गुजरात के धारोई एवं हाथुका, महाराष्ट्र में वाघाड, मध्य प्रदेश में सातक, मान और जोबट, बिहार में पीलीगंज और आंध्र प्रदेश में श्री राम नगर जैसे कमांड क्षेत्रों में किए गए सुधारों के सफल उदाहरण हैं। इन सफलताओं को अब बड़े पैमाने पर लागू किया जाना चाहिए। 

यहां सुधारों का मतलब है कि बेहतर प्रबंधन और अंतिम छोर तक उपलब्धता पर ध्यान दिया जाए। इसके लिए जल को नौकरशाही से बाहर निकालना या इसका लोकतंत्रीकरण करना है। जब किसान को स्वामित्व का अहसास होता है तो सिंचाई प्रणाली के परिचालन एवं प्रबंधन की प्रक्रिया में बड़ा बदलाव आता है। किसान स्वेच्छा से अपने जल उपयोगकर्ता संघों को सिंचाई सेवा फीस चुकाते हैं। इन संघों का ढांचा पूर्णतया पारदर्शी एवं भागीदारी के तरीके से निर्धारित किया जाता है। जल उपयोगकर्ता संघ इस एकत्रित फीस का इस्तेमाल वितरण प्रणाली की मरम्मत एवं रखरखाव में करते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि जल प्रत्येक खेत तक पहुंचे। 

इस तरह का भागीदार सिंचाई प्रबंधन (पीआईएम) का मतलब है कि राज्य सिंचाई विभाग केवल मुख्य प्रणाली से लेकर द्वितीयक नहरों तक के तकनीक एवं वित्तीय रूप से जटिल ढांचे पर ध्यान केंद्रित करते हैं। तृतीयक स्तर की नहरें, छोटे ढांचे और फील्ड चैनल जल उपयोगकर्ता संघों को सुपुर्द कर दिए जाते हैं, जिससे अंतिम छोर पर उपलब्धता और नवोन्मेषी जल प्रबंधन संभव हो पाता है। इसमें फसल कटाई का उचित तरीका, जल वितरण में समानता, विवाद निपटान, जल-बचत की तकनीकों को अपनाना और फसल कृषि पद्धति आदि शामिल हैं, जिनसे पानी के इस्तेमाल में किफायत आती है। भारत पानी की सबसे कम किफायत वाले देशों में से एक है। 

निस्संदेह भागीदार सिंचाई प्रणाली कोई रामबाण इलाज नहीं है। दुनियाभर में हुए अध्ययनों में बताया गया है कि किन स्थितियों में भागीदार सिंचाई प्रणाली कारगर साबित होती है। इन जरूरतों पर सावधानीपूर्वक ध्यान दिया जाना चाहिए। हालांकि इन मुद्दों से निपटना राज्यों का काम है, लेकिन राज्यों को प्रोत्साहन एवं सुविधाएं मुहैया कराने में केंद्र की भी अहम भूमिका है ताकि राज्य इन सुधारों को अमलीजामा पहनाएं। राज्यों को बड़ी बांध परियोजनाओं के लिए धनराशि जारी करने को विकेंद्रीकरण सुधारों और जल उपयोगकर्ता संघों को मजबूत बनाने की दिशा में प्रगति से जोड़ा जाना चाहिए। 

हमने 12वीं योजना में इस उद्देश्य के लिए एक प्रोत्साहन फंड बनाने का प्रस्ताव रखा था। 'हर खेत को पानी' के राष्ट्रीय लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्ध राज्य इसे अपने ऊपर अतार्तिक भार नहीं समझेंगे। किसी तरह की चिंता को दूर करने के लिए केंद्र को विभिन्न राज्यों के अधिकारियों और किसानों को जमीन पर भागीदार सिंचाई प्रबंधन का नमूना दिखाना चाहिए ताकि वे सीख सकें और इसे अपने कमांड क्षेत्र में अपना सकें। 

अगर इन सुधारों को प्रभावी तरीके से लागू किया जाए तो सिंचित रकबे में करोड़ों हेक्टेयर का इजाफा तुरंत हो सकता है। वह भी मामूली लागत पर और बिना कोई नया बांध बनाए। 

(लेखकर शिव नाडर यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर और योजना आयोग के पूर्व सदस्य हैं।)
Keyword: Maharashtra, CM, Watershed, Farmer, Dam, चीन, श्रीलंका, फिलीपींस, इंडोनेशिया, वियतनाम,
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