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डेट म्युचुअल फंडों पर सख्ती

बीएस संवाददाता / मुंबई June 27, 2019

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने डेट म्युचुअल फंडों के नियंत्रण से जुड़े कुछ और दिशानिर्देश जारी किए हैं। निवेशकों के हितों की रक्षा और हालके दिनों में कुछ कंपनियों द्वारा भुगतान में चूक के मद्देनजर बाजार नियामक ने ये कदम उठाए हैं। इसके अलावा सेबी ने शेयरों के बदले लिए ऋण के लिए जमानत रकम/परिसंपत्ति भी बढ़ा दी है, साथ ही विभिन्न क्षेत्रों में निवेश सीमा में भी कमी की है। बाजार नियामक ने कुछ योजनाओं के लिए सरकारी प्रतिभूतियों में अपने कुल निवेश का 20 प्रतिशत हिस्सा डालना भी अनिवार्य कर दिया है।

जी और डीएचएफल सहित कुछ अन्य नामी कंपनियों के भुगतान में विफल रहने के बाद 25 लाख करोड़ रुपये वाला म्युचुअल फंड उद्योग परेशानी में फंसा हुआ है। सेबी के चेयरमैन अजय त्यागी ने कहा, 'हमें नहीं लगता है कि हमने ये कदम देर से उठाए हैं। हमने जिन उपायों की घोषणा की है, उनसे निवेशकों खासकर डेट म्युचुअल फंडों में निवेश करने वाले लोगों को राहत मिलेगी।'

आने वाले समय में डेट योजनाएं अब किसी एक क्षेत्र में 25 प्रतिशत के बजाय 20 प्रतिशत तक ही निवेश कर पाएंगी। सेबी ने एक अन्य उपाय के तहत सभी तरल (लिक्विड) योजनाओं के लिए सरकारी प्रतिभूतियों और ट्रेजरी बिल में कुल निवेश का 20 प्रतिशत हिस्सा डालना अनिवार्य कर दिया है। नियामक ने डेट एवं मुद्रा बाजार योजनाओं (मनी मार्केट इंस्ट्रूमेंट) के लिए मूल्यांकन तरीके में भी बदलाव किया है।

सेबी ने अब यह विधि मार्क-टू मार्केट आधारित कर दी है। नियामक ने म्युचुअल फंडों को शेयरों के बदले ऋण के लिए चार गुना जमानत राशि का प्रावधान करने के लिए कहा है। 

सेबी ने उन मौजूदा परिसंपत्तियों की रकम पर पाबंदी नहीं लगाई है, जो नए दिशानिर्देशों से प्रभावित होंगी। त्यागी ने कुछ म्युचुअल फंड कंपिनयों के उस कदम की आलोचना की, जिसके तहत उन्होंने कुछ खास समूहों के साथ समझौते किए हैं। त्यागी ने कहा, 'हम ऐसे किसी समझौते को नहीं मानते हैं। म्युचुअल फंड कंपनियां बैंक जैसी नहीं हैं और वे निवेश करती हैं ना कि उधार देती हैं।' इसी बीच, कुछ अन्य घोषणाएं भी की हैं। इनमें तकनीकी कंपनियों को सुपीरियर राइट्स के साथ शेयर जारी करने की अनुमति, गिरवी रखे शेयरों के लिए खुलासा जरूरतों पर सख्ती और रॉयल्टी भुगतान पर सीमा में छूट देना आदि शामिल हैं। 

सेबी ने कहा है कि सुपीरियर वोटिंग राइट (एसआर) शेयर वाली तकनीकी कंपनियों को आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) लाने और इसे सूचीबद्ध कराने की अनुमति दी गई है। हालांकि सूचीबद्ध कंपनियों को नए एसआर जारी करने की इजाजत नहीं होगी।

डिफरेंशियल वोटिंग राइट्स (डीवीआर) के साथ शेयर की अनुमति के संबंध में सेबी का रवैया पिछले साल के शुरू में आए परिचर्चा पत्र में इसके प्रस्ताव के मुकाबले अधिक कड़ा है। इस बीच, सेबी ने ब्रांड के इस्तेमाल या रॉयल्टी शुल्क के भुगतान की सीमा में भी छूट दी है। पहले अगर यह रकम सालाना समेकित राजस्व का 2 प्रतिशत से अधिक होती थी तो कंपनियों को अल्पांश शेयरधारकों की अनुमति लेनी पड़ती थी।

अब सेबी ने कहा है कि रॉयल्टी भुगतान 5 प्रतिशत से अधिक होने की स्थिति में ही अल्पमत शेयरधारकों की अनुमति लेने की जरूरत होगी। एक अन्य महत्त्वपूर्ण पहल में सेबी ने गिरवी शेयरों से जुड़े खुलासा नियम कड़े कर दिए हैं। नियामक ने कहा है कि किसी प्रवर्तक जिनकी गिरवी कुल शेयरधारिता का 20 प्रतिशत से अधिक होती है या प्रवर्तक शेयरधारिता का 50 प्रतिशत पार कर जाती है तो उसे शेयर गिरवी रखने के कारणों का उल्लेख करना होगा।

Keyword: SEBI, Sales and Exchange Board of India, Mutual Fund, DHFL, Zee, DVR,
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