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कनिष्ठ अधिकारियों से कमजोर सेबी!

श्रीमी चौधरी / नई दिल्ली June 26, 2019

केंद्र सरकार भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के निदेशक मंडल में एक और संयुक्त सचिव स्तर के नौकरशाह की नियुक्ति की योजना बना रही है। कुछ लोगों का मानना है कि इस कदम से वित्तीय बाजार नियामक की स्वायत्तता पर असर पड़ेगा। 

कंपनी मामलों के मंत्रालय (एमसीए) में संयुक्त सचिव केवीआर मूर्ति आगामी गुरुवार को केंद्र सरकार के नामित सदस्य के रूप में कार्यभार संभालेंगे और वह सचिव इंजेति श्रीनिवास की जगह लेंगे। हाल ही में आर्थिक मामलों के विभाग (डीईए) के संयुक्त सचिव आनंद मोहन बजाज ने सेबी के बोर्ड में कार्यभार संभाला था। उन्होंने सचिव सुभाष चंद्र गर्ग की जगह ली थी। 

सेबी ऐक्ट के तहत नियामक के बोर्ड में एक चेयरमैन, वित्त मामले व कंपनी ऐक्ट का प्रशासन देख रहे केंद्र सरकार के मंत्रालयों के दो नामित व्यक्ति और सरकार द्वारा नियुक्त 5 अन्य सदस्य होते हैं, जिनमें से कम से कम 3 पूर्णकालिक सदस्य होने चाहिए।

पर्यवेक्षकोंं का कहना है कि बहरहाल ऐसा कोई लिखित नियम नहीं है कि सेबी बोर्ड में सरकार के नामित सदस्य के रूप में सचिव स्तर के अधिकारी होंगे, लेकिन ऐसा पहली बार होगा, जब सेबी के बोर्ड में सचिव स्तर के नीचे के अधिकारी शामिल होंगे। बिजनेस स्टैंडर्ड की ओर से इस सिलसिले में भेजे गए ई मेल के जवाब में सेबी के प्रवक्ता ने कहा, 'सेबी ऐक्ट के मुताबिक वित्त मंत्रालय और कंपनी मामलों के मंत्रालय के दो सदस्य सेबी के बोर्ड में केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किए जाते हैं। इस तरह से यह सरकार का अधिकार है कि वह इन दो मंत्रालयोंं से उचित स्तर के अधिकारियों की नियुक्ति करे।' 

विशेषज्ञ इसे नियामक के कद को छोटा करने के कदम के रूप में देख रहे हैं, क्योंकि उनका ऐसा मानना है कि इस तरह के अहम संगठन में सरकार की ओर से वरिष्ठतम अधिकारी रखे जाने चाहिए, जो नीतिगत फैसले लेने का हिस्सा हों। सेबी के एक पूर्व अधिकारी ने नाम न दिए जाने की शर्त पर कहा, 'सेबी के बोर्ड में पूर्ण कालिक सदस्य और डीईए, एमसीए और रिजर्व बैंक में पदेन सचिव या डिप्टी गवर्नर स्तर के अधिकारी होते हैं। इसके पहले भी डीईए के जेएस केपी कृष्णन और थॉमस मैथ्यू को बोर्ड का सदस्य बनाया गया है। लेकिन उस समय भी, एमसीए और रिजर्व बैंक के नामित क्रमश: सचिव और डिप्टी गवर्नर थे।' 

नियामक कार्यालय के सूत्रों ने कहा कि यह ऐसे समय में हुआ है जब सरकार और नियामक के बीच कुछ मसलों को लेकर असहमति बनी है। इस साल की शुरुआत में वित्त मंत्रालय ने प्रस्ताव किया था कि पूंजी बाजार नियामक के सभी समितियों में उसके प्रतिनिधि होने चाहिए और उनसे कहा था कि अब तक बनाई गई सभी समितियों की सूची मुहैया कराई जाए। वित्त मंत्रालय चाहता है कि वह सभी प्रमुख फैसलोंं का हिस्सा बने, जिसका असर न सिर्फ इक्विटी बाजार पर बल्कि पूरे वित्त बाजार के माहौल और अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। 

सूत्रों ने कहा कि इसके पीछे तर्क यह ता कि सरकार और नियामक के बीच तालमेल और संचार बने। साथ ही अगर सभी हिस्सेदारों को एक मंच पर लाया जाता है तो नीति निर्माण ज्यादा प्रभावी और कुशल होगा। बहरहाल सेबी ने उपरोक्त उल्लिखित प्रस्ताव पर असहमति जताई क्योंकि उसका मानना था कि इससे नियामक की स्वायत्तता पर असर पड़ सकता है। 

कुछ महीने पहले एक बार और असहमति साने आई थी जब सेबी ने सरकार से अनुरोध किया कि बोर्ड में रिजर्व बैंक का प्रतिनिधित्व खत्म किया जाना चाहिए। सेबी का विचार था कि बोर्ड में पहले से ही सरकार के नामित सदस्य हैं और अन्य नियामकों जैसे आईआरडीएआई और पीएफआरडीए में किसी अन्य नियामक के सदस्य नहीं होते हैं। बहरहाल वित्त मंत्रालय ने सेबी के प्रस्ताव को खारिज कर दिया और कहा कि कुल मिलाकर आर्थिक परिदृश्य के लिए रिजर्व बैंक की राय जरूरी है। 

सरकार और नियामक निकाय के बीच टकराव नया नहीं है। पिछले साल रिजर्व बैंक के गवर्नर ऊर्जित पटेल ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था और पिछले सप्ताह रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है, जबकि उनका 3 साल कार्यकाल बचा हुआ था। 

सूत्रों ने बताया कि सेबी की बड़ी घोषणाओं, इसकी वजह से सरकार असहज हुई, में कर्जदाताओं द्वारा 24 घंटे के भीतर गैर निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) का खुलासा था। वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक के विरोध के बाद सेबी ने इस प्रस्ताव को वापस ले लिया और कहा कि इससे अतिरिक्त पूंजी की जरूरत बढ़ेगी।
Keyword: MCA, DEA, Deputy Governor, NPA, Lender, RBI, Urjit Patel,
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