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दूरदराज तक है जाना तो किराये की बाइक बनाएगी सफर सुहाना

विभु रंजन मिश्र और पीरजादा अबरार /  June 25, 2019

भारत के परिवहन क्षेत्र में, खासकर अंतिम छोर तक संपर्क साधन मुहैया कराने के मामले में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है जिसमें तकनीकी कंपनियां अहम भूमिका निभा रही हैं। फिलहाल बेंगलूरु और हैदराबाद तक सीमित यह बदलाव समय के साथ साथ पूरे देश में फैल जाएगा। 

उबर, ग्रैब, दीदी चक्सिंग और ओला जैसी कंपनियों ने कैब सेवा के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन किए। अब बाउंस, वोगो, ड्राइवजी, रेंटोंगो, ऑनट्रैक जैसी विभिन्न भारतीय कंपनियां अंतिम छोर तक परिवहन सेवा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बाइक साझा करने वाली सेवाएं लेकर आ रही हैं और इसके लिए कृत्रिम मेधा (एआई), मशीन लर्निंग, बिग डेटा और एनालिटिक्स जैसी उभरती हुई तकनीकों का उपयोग कर रही हैं। देश के दूरस्थ इलाकों तक पहुंच बनाना लगातार चुनौतीपूर्ण रहा है और ये कंपनियां इसे निर्बाध और परेशानी-रहित बनाने में लगी हैं।  यह कुछ इस तरह से काम करती है। जब आप शहर में जगह 'क' से 'ख' तक जाना चाहते हैं तो मोबाइल में ऐप खोलकर आसपास किसी बाइक की उपलब्धता खोजें, अपने सबसे नजदीक की बाइक चुनें और थोड़ा पैदल चलकर वहां पहुंच जाएं। इसके बाद स्कूटर में लगे कीबोर्ड में आपके मोबाइल पर आया ओटीपी साझा करें। इससे स्कूटर को स्टार्ट करने वाला प्लाइंट और सीट के नीचे रखा हैलमेट अनलॉक हो जाएगा। और इस तरह आप जाने के लिए तैयार हैं। 

जब आप मंजिल पर पहुंचें तो ऐप पर मौजूद सार्वजनिक पार्किंग स्थल तक जाएं और स्कूटर को वहां छोड़ दें। जैसे ही आप ट्रिक को समाप्त करेंगे, वाहन दोबारा लॉक हो जाएगा और अगले ग्राहक के लिए तैयार होगा। साल 2016 में जब बेंगलूरु अपनी मेट्रो परियोजना के पहले चरण को शुरू करने की तैयारी कर रहा था तो उस समय इन तीनों उद्यमियों ने बाइक साझा करने वाले प्लेटफॉर्म की संभावनाएं तलाशीं। विवेकानंद हालेकर और अनिल जी ने बेहतरीन वेतन वाली अपनी नौकरियां छोड़ीं और तीसरे सह-संस्थापक वरुण अग्नि पहले अन्य बाइक रेंटल कंपनी, विक्ड राइड के साथ काम कर रहे थे। बाउंस के मुख्य तकनीकी अधिकारी वरुण अग्नि कहते हैं, 'हमारा मानना है कि आखिरी छोर तक कनेक्टिविटी की सुविधा देने में सबसे बड़ी चुनौती यात्रा के बाद वाहन को छोडऩे की है। इसका एकमात्र रास्ता यह था कि इसे चाबी रहित बना दिया जाए और ऐसा करने में तकनीक ने अहम भूमिका निभाई।'

आज के दौर में यह विचार बिल्कुल नया था और केवल चीन इस तरह की परियोजना पर काम कर रहा है लेकिन साइकिलों के लिए। इसपर काम करने के लिए कंपनी ने शोध एवं विकास केंद्र स्थापित किया और एक ऐसी विशिष्ट चाबी रहित तकनीक तैयार की जो जीपीएस की मदद से स्कूटर को बैकएंड कमांड सेंटर से जोड़ती है। बाउंस के पास इस नई तकनीक का पेटेंट है। 

कंपनी अपने सभी स्कूटरों के सामान्य लॉक को चाबी रहित तकनीक से बदल रही है। कंपनी स्कूटर में कीपैड और संचार मॉड्यूल इंस्टॉल करती है जिससे जीपीएस और इंटरनेट ऑफ थिंग्स की मदद से हेलमेट, तेल की टंकी और बैटरी तक आसानी से पहुंच बनाई जा सकती है। कंपनी का सर्वर स्वचलित कमांड के जरिये वाहन को दूर से ही नियंत्रित करता है। जैसे, अगर हेलमेट को वापस उसके स्थान पर नहीं रखा गया तो स्कूटर लॉक नहीं होगा और ग्राहक का किराया बढ़ता रहेगा। अगर कोई व्यक्ति वाहन को चोरी करके बेंगलूरु शहर से बाहर ले जाने की कोशिश करता है तो कमांड सेंटर को तत्काल सूचना मिल जाएगी और वे वाहन के इंजन को बंद कर देंगे। 

अगर ग्राहक को यातायात नियमों के उल्लंघन में दोषी पाया जाता है तो भी कंपनी के पास इसका उपाय है। अग्नि कहते हैं, 'अगर हमे वाहन के लिए दंड़ की रसीद मिलती है तो यह पता लगाते हैं कि उस समय वाहन कौन चला रहा है और जब तक वह व्यक्ति निर्धारित राशि जमा नहीं करा देता, वह अगली यात्रा करने से रोक दिया जाता है।' इसी तरह, जब सभी सार्वजनिक पार्र्किंग स्थलों या शुल्क वाले पार्किंग स्थलों की जियो-मैपिंग पूरी हो जाएगी तो अगर व्यक्ति किसी दूसरे स्थल पर वाहन पार्क करता है तो सिस्टम उसे स्वत: यह जानकारी दे देगा कि इस जगह वाहन को खड़ा न करें। 

बाउंस के मुख्य कार्याधिकारी विवेकानंद हालेकर बताते हैं कि कंपनी एक नई तकनीक का परीक्षण कर रही है जिसमें न तो आपको ओटीपी की जरुरत होगी और न ही स्कूटर में कीपैड होगा। इसके बजार उपयोगकर्ता का फोन खुद चाबी की तरह काम  करेगा और इसे ब्लूटूथ के जरिये स्कूटर से जोडऩे पर यह चाबी की तरह काम करेगा। हालेकर कहते हैं कि जब बाउंस छोटे और मझोले शहरों में अपनी सेवाएं लॉन्च करेगी तो यह फीचर काफी लाभदायक होगा। 

बाउंस की प्रतिस्पर्धी कंपनी वोगो भी इसी तरह की तकनीक पर काम कर रही है जहां ग्राहक मोबाइल ऐप के जरिये वाहन को अनलॉक और स्टार्ट कर सकता है। वोगो के सह संस्थापक और मुख्य कार्याधिकारी आनंद अय्यादुरई कहते हैं, 'इसे देखकर लगता है कि निर्बाध ग्राहक अनुभव कि तरह काम करता है। यहां स्कूटर के लिए कोई जटिल प्रणाली नहीं है। केवल एक फोन के जरिये इसे चलाया जा सकता है। हमें ग्राहकों से अच्छी प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं और जल्दी ही इस तकनीक का विस्तार करेंगे।'

बाइक साझा करने वाले प्लेटफॉर्म के सामने एक सबसे बड़ी समस्या बाइक के हिस्से चोरी होने की है। इसके लिए कंपनियां अपने अपने उपाय लेकर आई हैं। बाउंस के स्कूटरों के हिस्से विशेष उपकरणों की मदद के बिना नहीं निकाले जा सकते तो वहीं वोगो का दावा है कि उसके वाहनों में चोरी की संभावना वाले हिस्सों को काफी सुरक्षित किया गया है। जैसे, कंपनी ने वाहन के शीशे उतारकर उन्हें स्टेनलेस स्टील के शीशों से बदल दिया है और कंपनी का कहना है कि इसे सामान्य पेचकस से नहीं खोला जा सकता। स्कूटरों के हेक्सागन बोल्ट को स्प्हेयर बोल्ट से बदल दिया गया है जिन्हें सामान्य उपकरणों से नहीं खोला जा सकता। वोगो के वाहनों मेंं तेल टैंक के चारों ओर एक जाल लगा है। 

तो, क्या ये सभी प्लेटफॉर्म स्केलेबल हैं? बेंगलूरु में करीब 5,000 स्कूटर चलाने वाली बाउंस स्कूटरों के जरिये प्रत्येक महीने 40 लाख किलोमीटर का सफर कर रही है। कंपनी का अनुमान है कि एक साल के अंदर उसके वाहनों की संख्या 25,000 को पार कर जाएगी।

Keyword: उबर, ग्रैब, दीदी चक्सिंग, ओला, AI, Machine Learning, Bid Data, Analitics,
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