बिजनेस स्टैंडर्ड - एनबीएफसी संकट भरोसे का प्रश्न
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एनबीएफसी संकट भरोसे का प्रश्न

आकाश प्रकाश /  June 24, 2019

गैर बैकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) का संकट बरकरार रहने और हालात के बद से बदतर होते जाने को लेकर पर्यवेक्षक काफी हद तक चकित हैं। एनबीएफसी और एचएफसी (हाउसिंग फाइनैंस कंपनी) के शेयर आईएलऐंडएफएस डिफॉल्ट के पहले बाजार के प्रिय थे। इन शेयरों के दाम में बहुत तेजी से इजाफा हुआ, ये मुनाफे में रहे और ऋण बाजार में गहराई का भी इन्हें लाभ मिला। एक वक्त तंत्र में होने वाली ऋण वृद्धि के 25 फीसदी के लिए ये उत्तरदायी थे। इन शेयरों को खूब लाभ पहुंचा और ये निजी बैंकों के तर्ज पर मूल्यवर्धन करते हुए आगे बढ़े।

अगर सितंबर 2018 के पहले ये शेयर इतनी बेहतर स्थिति में थे तो अब कोई उन्हें खरीदना क्यों नहीं चाहता? जबकि अधिकांश शेयरों की कीमत 50 से 75 फीसदी तक गिर चुकी है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि निवेशकों का भरोसा पूरी तरह हिल चुका है। सार्वजनिक बाजार में निवेश करने वालों की पहुंच इन वित्तीय कंपनियों के बहीखातों तक नहीं है। चूंकि वे स्वयं ऋणपुस्तिका नहीं देख सकते इसलिए उन्हें परिसंपत्ति गुणवत्ता, संचालन आदि की जानकारी के लिए बाहरी एजेंसियों पर भरोसा करना पड़ता है। विश्वसनीयता का संकट यहीं आरंभ हुआ।

आईएलऐंडएफएस संकट के बाद रेटिंग एजेंसियों की विश्वसनीयता समाप्त हो चुकी है। इतने अधिक कर्जवाली और जटिल ढांचे की कंपनी को लंबे समय तक एएए या एए प्लस रेटिंग कैसे दी जाती रही? देनदारी में चूक के बाद ही उसकी रेटिंग कम की गई। ऐसी रेटिंग किस आधार पर दी गई? इन रेटिंग की निगरानी का क्या? बाद में अन्य बड़ी और बेहतर रेटिंग वाली एनबीएफसी को निवेश लायक न होने या डिफॉल्ट रेटिंग मिलने से विश्वसनीयता को और क्षति पहुंची। जिन संस्थानों की ग्रेडिंग कम की गई उनमें से कई के पास भारी भरकम खुदरा जमा है और खुदरा बकाया भी।

सार्वजनिक बाजार में निवेश करने वाले फिलहाल इन एजेंसियों की रेटिंग को गंभीरता से नहीं ले रहे क्योंकि इनमें कभी भी गिरावट आ सकती है। कई संस्थान बेहतर रेटिंग के बावजूद अल्पावधि में नकदी संकट का सामना कर रहे हैं। वे भी भरोसा गंवा चुके हैं। सामान्य माहौल में उनकी पहुंच नकदी तक होनी थी। हां, परिसंपत्ति जवाबदेही में विसंगति है लेकिन हर किसी के साथ समस्या नहीं है। रेटिंग में भरोसा न होने के कारण नकदी की तंगी हो रही है।

देश के शीर्ष अंकेक्षकों के साथ भी ऐसा ही मसला है। ये चारों किसी न किसी विवाद में पड़ते रहते हैं। अगर मैं गलत नहीं हूं तो संभव है आने वाले वर्षों में इनमें से किसी को किसी वाणिज्यिक बैंक के अंकेक्षण का काम न करने दिया जाए। आईएलऐंडएफएस के अंकेक्षण में भी गंभीर अनियमितता नजर आ रही है। अगर आप इन अंकेक्षकों की क्षमता पर यकीन नहीं कर सकते तो आप उनके दिए नतीजों पर कैसे यकीन करेंगे? अगर आप लेखा पर यकीन नहीं करते तो आप वास्तविक परिसंपत्ति गुणवत्ता या मुनाफे पर कैसे यकीन करेंगे? उन अंकेक्षण कंपनियों को लेकर भी सावधान रहना होगा जो वर्षों के बाद अचानक किसी कंपनी के अंकेक्षण का काम छोड़ देती हैं। वे एक दिन में काम छोड़ सकती हैं लेकिन कंपनी के अंशधारकों का क्या? 

वित्तीय तंत्र की रखवाली करने वाली रेटिंग एजेंसियां और अंकेक्षक दोनों संदेह के घेरे में हैं। अगर इनमें भरोसा नहीं जन्मा तो निवेशकों को एनबीएफसी और एचएफसी की परिसंपत्ति के बहीखाते देखने होंगे और खुद ही निष्कर्ष निकालना होगा। सार्वजनिक निवेशकों की पहुंच इन तक नहीं होती। हमें सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध सूचनाओं के सहारे रहना होगा। अतीत में जब भरोसे की कमी नहीं थी तब हम इस सार्वजनिक सूचना पर यकीन कर लेते थे और निवेश संबंधी निर्णय लिया करते थे। रेटिंग एजेंसियों और अंकेक्षकों पर भरोसा होने के कारण दोबारा जांच परख की आवश्यकता ही नहीं थी। आज मामला अलग है। कतिपय एनबीएफसी को लेकर अफवाहों का बाजार गर्म है इससे भय और आशंका का माहौल है। शांत होकर विचार करना और इन कंपनियों में निवेश करना बहुत मुश्किल है क्योंकि इनके बारे में सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं है।

इससे निपटने का एक ही तरीका है कि निजी इक्विटी बढ़ाई जाए। निजी इक्विटी वाले बही खातों तक पहुंच की मांग कर सकते हैं और उचित सतर्कता बरतते हैं। उनमें यह क्षमता है कि आंकड़ों की विस्तृत परख कर सकें। अगर एक विश्वसनीय निजी निवेशक इन संकटग्रस्त एनबीएफसी या एचएफसी में से किसी में निवेश करना चाहेगा तो इससे विश्वसनीयता में तत्काल इजाफा होगा तथा और निवेशक भी आएंगे। निवेश से भरोसा बढ़ेगा। पुनर्पूंजीकरण से वृद्घि पूंजी बढ़ेगी और नकदी तक पहुंच भी आसान होगी। 

दूसरा विकल्प यह है कि नियामक इन संकटग्रस्त वित्तीय संस्थानों के बहीखातों की जांच करें। तनाव के मानकों का इस्तेमाल करके परिसंपत्ति की गुणवत्ता का खुलासा करें। अगर नियामकीय इजाजत से स्ट्रेस टेस्ट किया जाता है तो इससे निवेशकों में भरोसा पैदा होगा और वे समझ पाएंगे कि इन एनबीएफसी और एचएफसी में से अधिकांश की वास्तविक स्थिति कैसी है। इससे उन्हें निवेश संबंधी निर्णय लेने में आसानी होगी और वे कड़े विश्लेषण के बाद बिना भय के निर्णय ले पाएंगे। 

इस क्षेत्र को लेकर काफी अटकलबाजी चल रही है। हर रोज किसी न किसी संस्थान के संकटग्रस्त होने को लेकर अफवाह सामने आती है। लोग इस बात को लेकर चिंतित हैं कि इन कंपनियों में निवेश किया जाए या नहीं। कई के लिए रोजगार की चिंता उत्पन्न हो गई है। इस क्षेत्र में नकदी का संकट था जो अब दिवालिया संकट में बदल रहा है। इन अटकलों को खत्म करने का एक मात्र जरिया यह है कि संकटग्रस्त संस्थानों की परिसंपत्ति गुणवत्ता पर स्ट्रेस टेस्ट किया जाए। इससे अटकलों का बाजार खत्म होगा और उन चुनिंदा संस्थानों की पहुंच पूंजी तक बनेगी जिनको बाजार अविश्वास के इस माहौल के कारण बिना वजह दंडित कर रहा है।

एनबीएफसी और एचएफसी कंपनियों पर दबाव बनाया जा रहा है कि वे अच्छी खुदरा परिसंपत्तियों की बिक्री करके पुनभुर्गतान सुनिश्चित करें। कई कंपनियां आठ महीने से नकदी की कमी से जूझ रही हैं। उन्होंने ऋण देना पूरी तरह बंद कर दिया है जिसका अर्थव्यवस्था पर अनिवार्य रूप से असर पड़ रहा है। ज्यादातर कंपनियों को दोबारा पूंजी की आवश्यकता होगी। ऐसा तभी हो सकता है जब व्यवस्था और उसकी निगरानी करने वालों में यकीन बहाल हो जाए।

Keyword: NBFC, HFC, Company, IL&FS, Rating Agency, Auditor,
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