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स्वर्ण खरीद की होड़

संपादकीय /  June 24, 2019

सोना एक बार फिर चर्चा में है। दुनियाभर में केंद्रीय बैंकों द्वारा की जा रही खरीद के कारण इसकी कीमतें पांच वर्ष के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं। पांच वर्ष पहले सन 2013 में अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व द्वारा की जा रही कटौती के चलते सोने की कीमतें 1,500 डॉलर प्रति औंस से घटकर 2015 में 1,072 डॉलर प्रति औंस रह गई थीं। हालांकि बाद में स्थिति में कुछ सुधार हुआ था। सन 2019 में कीमतें डॉलर के हिसाब से 10 फीसदी बढ़ीं और यह 1,407 डॉलर प्रति औंस हो गईं। जब भी भरोसे का संकट हो, निवेशक सोने में निवेश करना उचित समझते हैं। सोने की कीमतों में हालिया तेजी की जड़ें अमेरिका और चीन के बीच छिड़े व्यापार युद्ध में हैं। अमेरिका-ईरान के बीच के तनाव ने भी इसे बल दिया है।

रूस, चीन और भारत के केंद्रीय बैंकों ने 2018 में भी और इस वर्ष भी काफी सोना खरीदा। कजाकस्तान और तुर्की के केंद्रीय बैंकों ने भी अपना स्वर्ण भंडार बढ़ाया। वेस्ट गोल्ड काउंसिल के मुताबिक 2018 में केंद्रीय बैंकों की सोने की मांग 651 टन के साथ कई दशकों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई। यह 2017 के मुकाबले 74 फीसदी अधिक थी। सन 1971 में ब्रेटन वुड व्यवस्था के भंग होने के बाद यह उच्चतम स्तर था। 613 टन के स्वर्ण भंडार के साथ आरबीआई इस मामले में 10वां सबसे बड़ा भंडार वाला केंद्रीय बैंक है।

अमेरिका और चीन के बीच की कारोबारी जंग ने दुनिया भर में अनिश्चितता पैदा की है। अगर ये दोनों किसी समझौते पर नहीं पहुंचते तो वित्तीय बाजार में बहुत बुरी हलचल मच सकती है। अप्रैल 2019 तक चीन के पास अमेरिकी सरकार की 1.1 लाख करोड़ डॉलर मूल्य की प्रतिभूति थी। अगर यह इसका कुछ हिस्सा बेचना चाहे तो अमेरिकी डॉलर औंधे मुंह गिर सकता है। डॉलर में परिसंपत्ति रखने वाले किसी भी केंद्रीय बैंक के लिए यह अच्छी खबर नहीं होगी। भारत के 400 अरब डॉलर से अधिक के भंडार में 155.3 अरब डॉलर अमेरिकी बॉन्ड में है जबकि पूरी दुनिया में यह 6.4 लाख करोड़ डॉलर है। जाहिर है काफी कुछ दांव पर लगा है।

सवाल यह भी है पिछले वर्षों में सोने से दूरी बनाए रखने वाले केंद्रीय बैंकों के लिए सोना दोबारा महत्त्वपूर्ण क्यों हो गया? इसका उत्तर आसान है। दरअसल कोई अन्य विकल्प नजर नहीं आ रहा। चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और बहुत संभव है कि 2030 के आरंभ में वह अमेरिका को बेदखल कर सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाए। परंतु डॉलर के उलट युआन एक नियंत्रित मुद्रा है। इसमें दो राय नहीं कि अमेरिका के पास फिलहाल सबसे बड़ा हथियार डॉलर या कहें पेट्रो डॉलर है।

दुनिया जीवाश्म ईंधन पर चल रही है और उसे खरीदने के लिए डॉलर आवश्यक है। पेट्रो डॉलर ने करीब 50 वर्ष तक वैश्विक व्यवस्था को संभाला। संभव है कि वह एक दो दशक तक और ऐसा करता रहे लेकिन विकल्प बहुत तेजी से उभर रहे हैं। भारत स्वयं 2030 तक पूरी तरह इलेक्ट्रिक वाहनों की नीति अपना रहा है। इससे तेल आयात घटेगा। दूसरी ओर, बैटरी बनाने के लिए संसाधन की जरूरतों के चलते उसकी निर्भरता चीन पर बढ़ेगी।

विविधता लाने के अलावा भी इसके ऐसे कारण हैं जिन्हें समझा जा सकता है। आर्थिक हथियार के रूप में डॉलर की धार भोथरी करना भी एक वजह हो सकती है। रूस और चीन ने बिक्री के लिए उपलब्ध सोने में से सबसे अधिक मात्रा में सोने की खरीद की है। डॉनल्ड ट्रंप अमेरिका आने वाली हर बाहरी वस्तु पर जिस तरह कर लगा रहे हैं उसने दुनिया के देशों को डॉलर केंद्रित व्यवस्था से दूरी बनाने पर मजबूर किया है। ऐसे परिदृश्य में निकट भविष्य में सोना मजबूत बना रह सकता है।
Keyword: Gold, Central Bank, RBI, Donald Trump, रूस, चीन, भारत,
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