बिजनेस स्टैंडर्ड - धुन के पक्के, कायापलट के माहिर शाह
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धुन के पक्के, कायापलट के माहिर शाह

ऋषभ कृष्ण सक्सेना /  06 24, 2019

पुस्‍तक समीक्षा

अमित शाह और भाजपा की यात्रा

लेखक : अनिर्बान गांगुली और शिवानंद द्विवेदी
प्रकाशक : ब्लूम्सबरी       
कीमत : 299 रुपये
पृष्ठ : 218

बिजनेस स्टैंडर्ड धुन के पक्के, कायापलट के माहिर शाहउत्तर प्रदेश में महज 10 लोकसभा सीटों पर सिमट चुकी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 2014 के आम चुनावों में जब प्रदेश की 80 में से 73 सीटें जीतीं तो हर किसी की जुबान पर अमित शाह का नाम था। लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद जब शाह ने 2017 में उसी प्रदेश में भाजपा गठबंधन को 325 विधानसभा सीटें दिला दीं तो हर कोई उनका लोहा मान गया। उसके बाद से शाह के बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है। लेकिन यह बात कम लोग ही जानते हैं कि उत्तर प्रदेश की जीत इत्तफाक नहीं थी। उसके पीछे बूथ स्तर के कार्यकर्ता से प्रदेश प्रभारी तक के शाह के तीन दशक के तुजर्बे का कमाल था।  भाजपा का कायाकल्प वाकई अचंभे में डालता है, लेकिन 'अमित शाह और भाजपा की यात्रा' पुस्तक बताती है कि शाह कायापलट के पुराने माहिर हैं।

पुस्तक के लेखक अनिर्बान गांगुली और शिवानंद द्विवेदी लिखते हैं कि अर्थ और कारोबार की गहरी समझ रखने वाले शाह जब 31 साल के थे तो उन्हें गुजरात राज्य वित्त निगम की कमान थमाई गई। उन्होंने निगम को 214 फीसदी मुनाफा तो दिलाया ही, अपने कार्यकाल में ही उसे सफल पब्लिक लिमिटेड कंपनी में भी बदल दिया। ऐसा ही कारनामा उन्होंने अहमदाबाद राज्य सहकारी बैंक में भी दिखाया। केवल 36 साल की उम्र में शाह इस बैंक के चेयरमैन बने तो बैंक 20 करोड़ रुपये का घाटा झेल चुका था। लेकिन साल भर के भीतर ही शाह ने अपनी रणनीतियों से इसे घाटे से उबार दिया और 6 करोड़ रुपये के मुनाफे तक पहुंचा दिया।

असल में शाह की कारोबारी बाजीगरी ने ही 1998 से 2000 के बीच कई सहकारी संस्थाओं को मुनाफे के रास्ते पर खड़ा किया था, जिसका सीधा फायदा भाजपा को मिला। उन संस्थाओं पर दशकों से कांग्रेस का दबदबा था, जिसे शाह ने कुछ साल में ही खत्म कर दिया और भाजपा एक के बाद एक सहकारी बैंकों, कृषि विपणन समितियों और डेयरी सहकारी संस्थाओं में जीत दर्ज करती रही। 

लेखक बताते हैं कि उस समय सीखी तरकीबों को शाह ने उत्तर प्रदेश की सियासी बिसात पर आजमाया और आम चुनावों से पहले करीब 93,000 किलोमीटर घूमकर हर बूथ पर चुनावी किला तैयार किया। राजभर, सैनी, गड़ेरिया, धोबी, निषाद जैसी गैर यादव पिछड़ी जातियों को लामबंद करने की जुगत भी शतरंज के माहिर खिलाड़ी शाह की ऐसी ही चाल थी, जिसमें चुनावी बिसात ही पलट दी। शाह के करीबी लोग जानते हैं कि कमरों में बैठकर चुनावी रणनीति बनाने के बजाय वह शहर-गांव घूमकर जनता की नब्ज पकडऩा पसंद करते हैं। वह कहते भी हैं कि तजुर्बा किताब पढ़कर नहीं आता, गांव-गांव घूमने से आता है। 

अमित शाह की एक खासियत को उनके विरोधी भी मानते हैं और वह है उनकी जिद। कहते हैं कि शाह अगर जिद पकड़ जाएं तो कुछ भी कर गुजरते हैं। यह किताब 2019 के आम चुनावों से पहले लिखी गई थी वरना इसमें पश्चिम बंगाल में शाह की उपलब्धि का जिक्र जरूर होता। जिस राज्य में विश्लेषक भाजपा को 4-5 सीट से अधिक देने को तैयार नहीं थे, वहां लगातार प्रवास कर शाह ने पार्टी को 18 लोकसभा सीटें दिला दीं।

इस बात से शायद ही कोई इनकार करे कि राष्ट्रीय पटल पर भाजपा के विस्तार के पीछे नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व के साथ शाह की जिद और मेहनत का भी बराबर योगदान है। किताब में शाह की मेहनत के बारे में किताब में कई रोचक किस्से हैं। जैसे अमेठी में चुनावी बैठक के बाद शाह वहीं ठहरने पर अड़ गए और कोई इंतजाम नहीं होने पर डालडा के कारखाने में पुराने फर्नीचर के बीच ही सो गए।

पश्चिम बंगाल में चुनावी अभियान की शुरुआत उन्होंने खुद घर-घर घूमकर की या पकौड़ों के शौकीन शाह आधी रात को बैठक खत्म होने पर कार्यकर्ताओं के साथ चौराहे पर पकौड़े खाने पहुंच गए। शाह को हर समय चुनावी गणित में मशगूल देखकर पारिवारिक व्यक्ति की छवि नहीं बनती। लेकिन इस किताब को पढ़कर पता चलता है कि वह अपने परिवार के कितने करीब हैं। शाह को शादी की सालगिरह बेशक याद नहीं रहती है, लेकिन दिन में एक बार वह अपनी पत्नी से फोन पर बात जरूर करते हैं। पढऩे-लिखने के बेहद शौकीन शाह घर पर हों तो नन्हीं पौत्री रुद्री के साथ खेलते हुए उसे 'वैष्णव जन ते तेने ही कहिए...' भी सिखाते हैं।

अमित शाह की जीवन यात्रा बताने वाली पुस्तक जनसंघ और भाजपा के भी पूरे सफर की कहानी सुनाती है, जो इसकी खासियत है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मदद से डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वार जनसंघ की नींव रखे जाने से लेकर दीन दयाल उपाध्याय से वैचारिक तेवर मिलने, उनके बाद अटल-आडवाणी के हाथ कमान आने, जनता पार्टी की सरकार टूटने और भाजपा के बनने तथा दो सीटों से देश की सबसे बड़ी पार्टी बनने तक की पूरी कहानी इस किताब में मिलती है। किताब की एक खासियत यह भी है कि वह प्रामाणिक संदर्भों से भरी पड़ी है, जो युवा पत्रकारों और राजनीति शास्त्र के छात्रों के लिए उपयोगी हो सकती है।
Keyword: Amit Shah, Book, Life, UP, Election, BJP, President, Political Party,
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