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खत्म नहीं हुई जातिवादी राजनीति

नितिन कुमार /  June 24, 2019

क्या जाति की राजनीति अब भी प्रासंगिक है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में आम चुनावों में जीत के बाद कहा कि इन चुनावों में लोगों ने जातिवाद की राजनीति को तिलांजलि दे दी है जिसका हिंदी भाषी राज्यों की राजनीति में दबदबा रहा है। लेकिन हरियाणा में आम चुनावों के नतीजों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि जाति के आधार पर मतदान बदस्तूर जारी है। इससे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को हरियाणा में आगामी विधानसभा चुनावों में अपनी सत्ता बरकरार रखने में मदद मिल सकती है। 

भाजपा ने अक्टूबर में होने वाले विधानसभा चुनावों में 'अबकी बार 75 पार' का लक्ष्य रखा है। लोकसभा चुनाव के नतीजों पर नजर डालें तो यह एक महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य है लेकिन इसे हासिल किया जा सकता है। भाजपा ने हरियाणा की सभी दस लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की। इस परिणाम के आधार पर देखें तो भाजपा राज्य की 90 विधानसभा सीटों में से 79 पर आगे रही। कांग्रेस, इंडियन नैशनल लोक दल (इनेलो) और आम आदमी पार्टी (आप)-जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) गठबंधन को कोई सीट नहीं मिली। विधानसभा सीटों के हिसाब से देखें तो कांग्रेस और आप-जेजेपी ने क्रमश: 10 और एक सीट पर आगे रही।

उल्लेखनीय है कि भाजपा जिन विधानसभा क्षेत्रों में अच्छा प्रदर्शन किया उनमें विभिन्न जातियों का दबदबा है जबकि विपक्ष जाट और मुस्लिम बहुल सीटों पर आगे रहा। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक भाजपा गढ़ी सांपला किलोई, झज्जर, बेरी, खारखोदा, बरोदा, नूंह, फिरोजपुर झिरका और पुन्हाना में पीछे रही जो जाट या मुस्लिम बहुल सीटें हैं। जेजेपी के संस्थापक दुष्यंत चौटाला जाट बहुल नारनौद विधानसभा सीट पर भाजपा पर बढ़त कायम करने में सफल रहे। 

लोकनीति के राज्य संयोजक और करनाल के दयाल सिंह कॉलेज में राजनीति विज्ञान विभाग के प्रमुख कुशल पाल ने कहा, 'यह साफ है कि मुस्लिमों ने भाजपा को वोट नहीं दिया। कांग्रेस ने जिन विधानसभा क्षेत्रों में अच्छा प्रदर्शन किया वे जाट बहुल हैं। इस बार जाटों ने एकजुट होकर रणनीतिक वोटिंग की और इनेलो के बजाय कांग्रेस को वोट दिया।'

हरियाणा में जाटों की आबादी महज 27 फीसदी है लेकिन इसके बावजूद राज्य की राजनीति में उनका दबदबा रहा है। 2014 से पहले हरियाणा को जाटों का गढ़ माना जाता था। 1966 में हरियाणा के गठन के बाद राज्य में 10 मुख्यमंत्री हुए जिनमें से पांच जाट थे। गैर जाट मुख्यमंत्रियों ने राज्य में केवल 18 साल तक सत्ता संभाली। 

मनोहर लाल खट्टर 18 साल बाद मुख्यमंत्री बनने वाले पहले गैर जाट नेता थे। इससे पहले 1996 में भजन लाल बिश्नोई ने मुख्यमंत्री के तौर पर अपना कार्यकाल खत्म किया था। इससे पहले कांग्रेस राज्य में गैर-जाट आबादी का प्रतिनिधित्व करती थी जबकि इनेलो को मुख्यत: जाटों का समर्थन हासिल था। लेकिन 2005 में भूपिंद्र सिंह हुड्डïा के उभार ने इस राजनीतिक और सामाजिक समीकरण को बदल दिया और जाटों को कांग्रेस का मुख्य जनाधार बना दिया। 

हरियाणा ने कभी भी जातीय हिंसा नहीं देखी थी लेकिन 'छत्तीस बिरादरी एक हरियाणा' की इस भावना को फरवरी 2016 में उस समय धक्का लगा जब जाटों ने आरक्षण की मांग करते हुए जबरदस्त हिंसा की। इस हिंसा में 30 से अधिक लोगों की जान गई और इसने भाजपा को जाटों के खिलाफ 35 जातियों का गठबंधन बनाने का मौका दे दिया। 

अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के अध्यक्ष यशपाल मलिक ने कहा, 'भाजपा पिछले चार साल से 35 बनाम एक का समीकरण साधने की कोशिश कर रही है। हालांकि यह चुनाव स्थानीय मुद्दों के बजाय राष्टï्रवाद के मुद्दे पर लड़ा गया। इस बार जाटों ने भाजपा को वोट दिया।'

द हिंदू में प्रकाशित सीएसडीएस-लोकनीति के चुनाव बाद सर्वेक्षण में यह बात साबित होती है। भाजपा को लोकसभा चुनावों में हरियाणा में 58 फीसदी वोट मिले। इनमें गैर-जाट अगड़ी जातियों के 74 फीसदी, अन्य पिछड़ी जातियों के 73 फीसदी और अनुसूचित जाति के 58 फीसदी वोट शामिल हैं। केवल 14 फीसदी मुसलमानों ने भाजपा को वोट दिया जबकि 50 फीसदी जाट वोट भी पार्टी की झोली में गए। इससे साफ है कि इन चुनावों में राष्ट्रवाद अहम मुद्दा था। 

फरवरी 2016 में हुई हिंसा के बाद हरियाणा में तीन चुनाव हुए हैं। 2018 में महापौर चुनाव, जनवरी 2019 में जींद विधानसभा के उप चुनाव और मई में लोकसभा चुनाव। इन सभी चुनावों में भाजपा को भारी जीत मिली। पाल ने कहा, 'भाजपा की जीत का मुख्य कारण मोदी और 2016 की हिंसा के बाद जाटों और गैर-जाटों के बीच पैदा हुई खाई रही।'

आंकड़ों पर करीबी नजर डालें तो भाजपा ने कांग्रेस के बजाय इनेलो को ज्यादा नुकसान पहुंचाया। भाजपा को 58 फीसदी और कांग्रेस को 28.44 फीसदी वोट मिले। इनेलो को 2014 में 24 फीसदी वोट मिले जबकि इस बार उसे महज 1.89 फीसदी वोट ही हासिल हुए। पाल ने कहा, '2019 के चुनाव रुझानों से साफ है कि अधिकांश जाट वोट कांग्रेस के साथ बने हुए हैं और भाजपा की नजर दूसरी जाति के वोटों पर है जिनकी आबादी हरियाणा में 70 फीसदी से अधिक है।'

लेकिन हिसार के सांसद बृजेंद्र सिंह का कहना है, 'कांग्रेस को कुछ सीटों पर इसलिए बढ़त मिल रही है क्योंकि इनेलो का पत्ता साफ हो गया है। ये सीटें इनेलो का गढ़ हुआ करती थीं। भाजपा को हिसार और जींद में बढ़त मिली जहां जाटों की अच्छी खासी आबादी है। हर जाति ने भाजपा को वोट दिया और यह अकेली पार्टी है जो राज्य की सभी छत्तीस बिरादरियों को साथ लेकर चलती है।'

खट्टïर की सरकार के पक्ष में चल रही लहर के दम पर भाजपा को दूसरी बार सरकार बनाने की उम्मीद है। उनकी छवि एक ईमानदार प्रशासक और ऐसे नेता की है जो राज्य के सभी इलाकों को बराबर तरजीह देता है। साथ ही 35 बनाम एक जाति का फॉर्मूला भी उनके हक में है। 

दिलचस्प बात है कि नई मोदी सरकार में हरियाणा के तीन सांसदों राव इंद्रजीत सिंह, कृष्ण पाल गुर्जर और रतन लाल कटारिया को मंत्री बनाया गया है। तीनों क्रमश: यादव, गुर्जर और अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखते हैं। हरियाणा में पार्टी के दो सांसद धरमवीर सिंह और बृजेंद्र सिंह जाट समुदाय के हैं। 2014 में भाजपा ने जाटों को संतुष्ट करने के लिए जाने माने जाट नेता बिरेंद्र सिंह को कैबिनेट में शामिल किया था। बृजेंद्र सिंह ने कहा, 'किसी को मंत्री बनाना प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार है और यह जाति के आधार पर नहीं होता है। इसकी एक प्रक्रिया है और एक समर्पित टीम यह फैसला करती है कि किसको क्या दिया जाए।'

विधानसभा चुनाव जीतने के लिए भाजपा का जोर ब्राह्मण, पंजाबी, यादव, गुर्जर, सैनी और अनुसूचित जाति के वोटों पर है। पाल ने कहा, 'भाजपा का प्रचार अभियान इस बात पर केंद्रित होगा कि उसने युवाओं को रोजगार देने का वादा पूरा किया है। सरकार ने मार्च 2018 तक 200,000 से अधिक युवाओं को रोजगार दिया है। इसके साथ ही भाजपा में कांग्रेस की तरह आंतरिक गुटबाजी नहीं है जिससे खट्टïर को फायदा होगा।'

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