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बदहाल व्यवस्था की भेंट चढ़े बिहार के बच्चे

सत्यव्रत मिश्रा /  June 24, 2019

बिहार में सरकारी निष्क्रियता की वजह से आसानी से काबू की जाने वाली एक बीमारी ने महामारी का रूप धारण कर लिया। इस बीमारी से अब तक 173 बच्चों की जान चली गई है। बता रहे हैं सत्यव्रत मिश्रा

बीते 10 जून को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मुस्कुराकर पत्रकारों के सवालों का सामना कर रहे थे। सभी जनता दल (यू) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच नए विवाद को लेकर ज्यादा उत्सुक थे। अचानकर एक सवाल मुजफ्फरपुर में एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) या 'चमकी बुखार' का उठा और नीतीश के चेहरे के भाव बदल गए। उनका जवाब था, 'यह बीमारी आम तौर पर बरसात के पहले फैलती है। विभाग ने इस बारे में कदम उठाए हैं। बीते कुछ वर्षों में हमने इस बीमारी को लेकर जागरूकता अभियान शुरू किया है। हमारी यह गुजारिश है कि लोग अपने बच्चों को रात में भरपेट खाना खिलाकर ही सोने दें। इस बार अब तक मामले लगातार आ रहे हैं। लगता है कि अभियान में सुस्ती आई है।' 

उन्होंने तुरंत इस मसले पर स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव संजय कुमार से सफाई मांगी। अधिकारी ने उन्हें भरोसा दिलाया कि मुजफ्फरपुर और उसके आसपास के अस्पतालों में पूरा इंतजाम किया गया है। प्रधान सचिव ने बताया, 'अब तक हाईपोग्रलाईसिमिया (खून में शक्कर की कमी) से अब तक 10 बच्चों की मौत हुई है। हमने पूरे इंतजाम किए हैं। उम्मीद है कि मॉनसून की आमद के बाद इस बीमारी पर लगाम लग जाएगी।' सरकारी दावे की हकीकत एक हफ्ते के भीतर लोगों के सामने थी।  

इस दावे के पांच दिन के भीतर मुजफ्फरपुर जिले में 70 बच्चों की मौत हो चुकी थी। शहर के दो सबसे बड़े अस्पतालों, श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज अस्पताल (एसकेएमसीएच) और केजरीवाल अस्पताल, में नए रोगियों की बाढ़ आ चुकी थी। जिले में कुल मिलाकर 280 से ज्यादा मामले सामने आ चुके थे और पूरा उत्तर बिहार भय के साये में था।  

नौ बिस्तरों वाले आईसीयू और 20 बिस्तर वाले बाल वार्ड का एसकेएमसीएच इतनी बड़ी तादाद में रोगियों के लिए तैयार नहीं था। नतीजा पूरी व्यवस्था चरमरा गई और एक के बाद एक कई ब'चे काल के गाल में समाते चले गए। हालात काबू से बाहर होता देख केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन पिछले से पिछले रविवार को अस्पताल के दौरे पर आए। साथ में थे केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री अश्विनी चौबे और राज्य के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय। वैसे तो चौबे को 12 जून को इस बीमारी को लेकर समीक्षा बैठक करनी थी, लेकिन उन्होंने इसे रद्द कर दिया क्योंकि उस दिन चौबे को भागलपुर में 'विजय जुलूस' में शिरकत करनी थी। हालांकि, इस दौरे के दौरान चौबे ऊंघते नजर आए, जबकि मंगल पांडेय को बच्चों से ज्यादा क्रिकेट स्कोर की चिंता थी। खुद हर्षवर्धन अपने पांच साल पुराने वादों को ही दोहराते नजर आए। 

आखिरकार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दौरे के एक दिन पहले सोमवार शाम को सरकार हरकत में आई। अस्पताल में तीन नए आईसीयू के निर्माण की अनुमति दी गई। साथ ही, सभी सरकारी डॉक्टरों की छुट्टियां रद्द कर तुरंत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को चालू हालत में लाने को कहा गया। पटना और दरभंगा से 10 डॉक्टरों की टीम मुजफ्फरपुर भेजी गई। राज्य सरकार ने चमकी बुखार के रोगियों के लिए मुफ्त एंबुलेंस सेवा और मुफ्त इलाज का भी ऐलान किया। तब तक 100 से ज्यादा बच्चों की मौत हो चुकी थी। 

मंगलवार को नीतीश जब अस्पताल आए, तो मरीजों के परिजनों के गुस्से का सामना करना पड़ा। पूरा अस्पताल 'नीतीश वापस जाओ' के नारों से गूंज रहा था। उसके कुछ घंटे बाद ही मुख्य सचिव दीपक कुमार ने पहली बार स्वीकार किया कि राज्य सरकार अब तक इस बीमारी के बारे में कुछ नहीं जानती है।    

मुजफ्फरपुर के कांटी प्रखंड में दरियापुर मुसहरी में 50-60 महादलित घर हैं। इस बस्ती में बीते 10 दिनों में दो ब'चे काल के गाल में समा चुके हैं। फूस के एक घर के बाहर बैठे नूनू महतो बताते हैं, 'मेरे प्रिंस को भोज में जाना बहुत अच्छा लगता था। उस दिन पड़ोस के गांव में एक मुंडन संस्कार था। हम सभी गए थे, दिन में खाना खाकर शाम को वापस आ गए। वापसी में उसने अपनी बहिनों के साथ समोसा भी खाया था। शाम को थककर सो गया था और सुबह में चमकी आने लगी। हम उसे तुरंत केजरीवाल अस्पताल ले गए, जहां अगले दिन सुबह उसकी मौत हो गई।'

करीब चार वर्ष के प्रिंस की 14 जून को मौत हुई थी। उसकी मां शीला देवी के आंखों से आंसू नहीं रुक रहे हैं। उनका कहना है, 'वह मेरी आंखों का तारा था। अब मैं कैसे जीऊंगी?' उनकी बेटियां अपनी मां के पास चुपचाप बैठी थीं। उनकी रसोई भी खाली थी, मिट्टी के चूल्हे पर जैसे कई दिनों से कुछ नहीं बना हो। 

कुछ ऐसी ही हालत पड़ोस के सुबोध पासवान और रेखा देवी की थी। उनकी छह वर्षीय बेटी निधि भी 13 जून को काल के गाल में समा चुकी थी। बमुश्किल अपने आंसुओं को रोकती हुई रेखा बताती हैं, 'वह हर दिन की तरह जल्दी ही उठी थी। मेरे साथ गांव की दुकान से दाल लाने भी गई थी। वहां से वापस आने पर उसका बदन अकडऩे लगा। उसके पापा उसे तुरंत मोटरसाइकिल पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले गए, जहां से डॉक्टरों ने उसे मुजफ्फरपुर भेज दिया। उसी शाम मेरी बेटी गुजर गई।' 

इस बीमारी ने पड़ोस के रामपुर साह मुसहरी में भी दो चचेरे भाइयों की जान ले ली। दो वर्ष के राजकुमार की मां चिंता देवी ने बताया, 'हमें किसी ने कुछ बताया ही नहीं, नहीं तो मेरा बेटा आज जिंदा होता। जब राजू बुखार से तड़पने लगा, तो हमारी समझ में ही कुछ नहीं आया। हम उसे पड़ोस में एक हकीम के पास ले गए, लेकिन उसने रास्ते में ही दम तोड़ दिया।' 

इसके अगले ही दिन चिंता के देवर सुनील मांझी के 19 महीने के बेटे प्रिंस की तबीयत भी खराब हो गई और कुछ ही घंटे में वह भी काल के गाल में समा गया। मांझी ने कहा, 'क्या कहूं? उसने शाम को दूध पिया, लेकिन सोना नहीं चाहता था। मेरे साथ खेलना चाहता था, लेकिन मेरे पास वक्त नहीं था। वह फिर कभी उठा ही नहीं।' 

कुछ ऐसी ही कहानी प्रांत के 170 से ज्यादा परिवार की भी है, जिन्होंने सरकारी निष्क्रियता की सबसे बड़ी कीमत चुकाई है। ज्यादातर मामलों में बच्चों की मौत एईएस की वजह से हाईपोग्लाइसिमिया या रक्त में ग्लूकोज की अत्यधिक कमी से हुई है। राज्य सरकार अब भी चमकी बुखार के नाम से प्रचलित इस बीमारी के कारण के बारे में नहीं जानती है। डॉक्टरों के मुताबिक इस बीमारी में दिमाग की झिल्ली सूज जाती है, जिस वजह से तेज बुखार, तेज सिरदर्द, उल्टी, कंपकंपी और अकडऩ होती है और लकवा तक मार जाता है। 

राज्य सरकार इस बीमारी का पूरा ठीकरा लीची और गर्मी के सिर पर फोड़ रही है। हालांकि, सरकारी अधिकारी इस बारे में ज्यादा जानते भी नहीं हैं। मुख्य सचिव दीपक कुमार ने कहा, 'इस बारे में कई प्रकार की बातें हैं, लेकिन हम भरोसे से कुछ कह नहीं सकते।'

डॉक्टरों और विशेषज्ञों के मुताबिक इस बीमारी के कई कारण हो सकते हैं। टीएचएसटीआई, फरीदाबाद की कार्यकारी निदेशक और रॉयल सोसाइटी में पहली भारतीय महिला फेलो गगनदीप कंग ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, 'यह बीमारी वायरस, बैक्टीरिया या फंगस के कारण हो सकती है। इस बीमारी के बारे में जानने के लिए अच्छे प्रयोगशालाओं और कुशल पेशेवर वैज्ञानिकों की जरूरत है। इस बारे में राज्य सरकार को एक विस्तृत अध्ययन भी करवाना चाहिए।' 

हालांकि, इंडियन एसोसिएशन ऑफ पीडियाट्रिक्स के सदस्य और बाल रोग विशेषज्ञ अरुण शाह के मुताबिक गर्मी, गंदगी और कुपोषण इस बीमारी के लिए मुख्य रूप से दोषी है। शाह मुजफ्फरपुर में रहते हैं और बीते 20 वर्षों से एईएस मामलों पर नजर रखे हुए हैं। वह मशहूर बाल रोग विशेषज्ञ जैकब जॉन की टीम में भी शामिल थे, जिन्होंने एईएस पर विस्तृत शोध किया था। इस टीम ने इस बीमारी के लिए एक मानक प्रक्रिया बनाने में भी बड़ी भूमिका निभाई थी। 

उन्होंने कहा, 'सरकार पूरा ठीकरा लीची पर फोड़ रही है, जो सही नहीं है। हमने अपने शोध में पाया था कि क'ची या सड़ी लीची में एमसीपीजी नाम का एक विष जरूर होता है। ये बीमारी का एक कारण हो सकता है, लेकिन इकलौता कारण नहीं। इस बीमारी की जड़ में है कुपोषण, गर्मी और उमस। दरअसल, इस बीमारी में रातोरात रक्त में ग्लूकोज की मात्रा निम्न स्तर पर पहुंच जाती है। स्वस्थ बच्चों के शरीर मे तो ग्लूकोज का अतिरिक्त भंडार होता है, लेकिन कुपोषित बच्चों में नहीं। इसीलिए इस बीमारी का सबसे ज्यादा सबसे ज्यादा असर गरीब परिवारों के बच्चों पर होता है।'     

 

श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज अस्पताल में माहौल काफी गमजदा है। हर ओर बीमार ब'चे, गरीब माता-पिता और काम के बोझ तले दबे डॉक्टर ही दिखाई देते हैं। मरीजों की देखभाल में जुटे एक डॉक्टर ने बताया, 'यहां हम पर काफी दबाव में हैं।'

लगातार फोन पर मंत्रियों, अधिकारियों और पत्रकारों के सवालों से घिरे एसकेएमसीएच के अधीक्षक सुनील कुमार शाही अपना गुस्सा चाहकर छुपा नहीं पाते हैं। उन्होंने कहा, 'इस वक्त हमारा अस्पताल अपनी क्षमता से ज्यादा पर काम कर रहा है। हमारे डॉक्टर चौबीसों घंटे काम पर हैं। हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहे हैं। हमें अपना काम करने दीजिए।' 

अस्पताल के एक वरिष्ठ डॉक्टर के मुताबिक इस वक्त एसकेएमसीएच में करीब 100 ब'चे एईएस का इलाज करा रहे हैं। उन्होंने कहा, 'हमारे बाल रोग विभाग में कुल मिलाकर 21 डॉक्टर हैं। राज्य सरकार 10 डॉक्टरों को और भेज रही है। हालांकि, असल समस्या नर्सों और पैरा-मेडिकल स्टाफ को लेकर है। हमें कम से कम हर दो मरीज पर एक नर्स की जरूरत है।' विभाग के पास इस वक्त महज आधी दर्जन नर्स हैं। 

डॉक्टरों को अपनी सुरक्षा की चिंता भी सता रही है। उन्होंने कहा, 'इस वक्त अस्पताल के निजी सुरक्षाकर्मियों के भरोसे काम चला रहा है। इतनी बड़ी त्रासदी के बावजूद लोगों ने अब तक यहां हमारे साथ कोई बेअदबी नहीं की है। हालांकि, जहां बच्चों की मौत हो रही हो, वहां स्थिति किसी भी क्षण खराब हो सकती है।'

बाल वार्ड में स्थिति काफी खराब है। वार्ड पूरी तरह से लोगों से अटा पड़ा है। ब'चे दर्द और गर्मी के मारे चिल्ला रहे हैं। वार्ड में एक डॉक्टर ने बताया, 'यहां बीते साल एसी लगने वाला था। इसीलिए सभी खिड़कियां बंद की गई। हालांकि, पैसे की किल्लत की वजह से एसी नहीं लग पाया। इसीलिए अब इस वार्ड में हवा निकलने की भी कोई व्यवस्था नहीं बची है।'

लोग भी डॉक्टरों के काम की तारीफ कर रहे हैं। सात वर्षीय हरिकिशन के पिता रवि राय ने बताया, 'अस्पताल में कई समस्याएं हैं, लेकिन डॉक्टरों ने काफी अच्छा काम किया है। उन्होंने मेरे बेटे का अच्छे से इलाज किया है। उम्मीद है कि वह जल्दी ही ठीक हो जाएगा।' 

सीतामढ़ी जिले के जमालउद्दीन अंसारी का भांजा आलम आईसीयू में भर्ती है। उन्होंने बताया, 'डॉक्टर अपना काम बखूबी कर रहे हैं। अगर कोई दोषी है, तो यह पूरी व्यवस्था और सरकार है। नेताओं को हमारे बच्चों से ज्यादा चिंता हमारे वोट की रहती है।'    

मुजफ्फरपुर में बच्चों की मौत ने बिहार में स्वास्थ्य व्यवस्था की लचर व्यवस्था को भी सबके सामने ला दिया। एसकेएमसीएच के एक डॉक्टर ने बताया, 'इस बीमारी को बेहद आसानी से रोका जा सकता था। जरूरत थी जागरूकता और बेहतर प्राथमिक अस्पतालों की। इन अस्पतालों ने अपना काम नहीं किया और इसी वजह से पूरी व्यवस्था ही चौपट हो गई।'

केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक मुजफ्फरपुर में 1,719 गांव हैं, जिनमें से महज 630 में स्वास्थ्य केंद्र हैं। जिले के सभी 103 प्राथमिक अस्पतालों को स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से शून्य रेटिंग मिली है। वहीं, इनमें से 98 को तो मंत्रालय ने जांच के लायक भी नहीं पाया था क्योंकि खुद राज्य सरकार के मुताबिक उनमें बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। 

स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव संजय कुमार ने कहा, 'कुछ दिक्कतें हैं, हम इससे इनकार नहीं कर रहे हैं। हम अपनी ओर से पूरी कोशिश कर रहे हैं। उम्मीद है कि बारिश के बाद इस बीमारी से राहत मिलेगी।' शनिवार को बिहार में मॉनसून ने दस्तक दे भी दी, लेकिन सरकारी निष्क्रियता पर अफसोस के अलावा कुछ नहीं किया जा सकता है।
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