बिजनेस स्टैंडर्ड - निवेशकों पर रेलवे की पाबंदी नामंजूर
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निवेशकों पर रेलवे की पाबंदी नामंजूर

एम जे एंटनी /  June 23, 2019

कलकत्ता उच्च न्यायालय और उड़ीसा उच्च न्यायालय ने वैगन इनवेस्टमेंट स्कीम (डब्ल्यूआईएस) में समझौता करने वाली कंपनियों पर रेलवे की पाबंदियों को नामंजूर कर दिया है। डब्ल्यूआईएस नीति में निवेशक को प्रति माह रेक की एक निश्चित संख्या और मालभाड़े में दस साल की छूट की गारंटी दी गई थी। रेलवे बोर्ड के मुताबिक निवेशक तीसरे पक्ष के सामान की ढुलाई नहीं करेंगे और यह लाभ उन्हीं कंपनियों को मिलेगा जिन्होंने रेलवे के साथ अनुबंध किया है। इस नियम को ओडिशा उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई।

न्यायालय ने रेलवे बोर्ड के परिपत्रों को निरस्त कर दिया। ओडिशा उच्च न्यायालय के इस फैसले के खिलाफ रेलवे बोर्ड ने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने उसकी अपील खारिज कर दी। अब रश्मि मैटालिक्स लिमिटेड बनाम भारत संघ वाद में यह मुद्दा एक बार फिर कलकत्ता उच्च न्यायालय में उठा। उच्च न्यायालय ने रेलवे को ओडिशा उच्च न्यायालय के फैसले का पालन करने को कहा।

कलकत्ता उच्च न्यायालय ने कहा, 'जब ओडिशा उच्च न्यायालय के फैसले के मुताबिक योजना के तहत कई अन्य निवेशकों को तीसरे पक्ष के सामान की ढुलाई की अनुमति दी गई तो न्यायिक सिद्घांत का तकाजा है कि बाकी कंपनियों को भी यह सुविधा मिलनी चाहिए।' न्यायालय ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने अपने कई फैसलों में कहा है कि प्रत्येक उच्च न्यायालय को दूसरी अदालतों द्वारा दिए गए फैसलों का उचित सम्मान करना चाहिए, हालांकि उसका रुख अलग हो सकता है। 

टोयोटा की चुनौती खारिज

कर्नाटक उच्च न्यायालय ने दोहरे कराधान से बचने के लिए भारत और दूसरे देशों के बीच हुई संधि के तहत निर्धारित राशि पर जुर्माना लगाने वाले आय कर कानून के प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। जापान की कंपनी टोयोटा मोटर कॉरपोरेशन की सहयोगी कंपनी टोयोटा किर्लोस्कर ने आकलन वर्ष 2006-07 के संबंध में आय कर विभाग के नोटिसों को चुनौती दी थी। कंपनी ने ट्रांसफर प्राइसिंग ऑफिसर, विवाद निपटान पंचाट, आय कर अपील पंचाट और उच्च न्यायालय में इस मुद्दे को उठाया था।

इस बीच जापानी कंपनी ने अपने देश की नैशनल टैक्स एजेंसी में दोहरे कराधान के लिए भारत और जापान के बीच हुई संधि के तहत आपसी सहमति प्रक्रिया का सहारा लिया और इसमें एक राशि तय की गई। लेकिन आय कर विभाग ने मूल्य निर्धारण समायोजन में 30,89,98,800 रुपये का जुर्माना लगाया। उसका कहना था कि कंपनी ने आय कर कानून की धारा 271 (1) (सी) की परिभाषा के तहत अपनी आय छिपाई थी। उच्च न्यायालय ने प्रावधान को दी गई चुनौती खारिज करते हुए अपील संस्था से कहा कि वह कंपनी के मामले पर गुणदोष के आधार पर विचार करे।

मोबाइल टावर से स्वास्थ्य को नुकसान

मोबाइल टावरों से स्वास्थ्य को नुकसान होता है या नहीं, इस मुद्दे पर कई उच्च न्यायालयों में बहस चल रही है। इस बारे में उच्चतम न्यायालय में भी कुछ अपीलों पर सुनवाई हुई है। पिछले सप्ताह मद्रास उच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी कि जब तक इस मामले में कोई ठोस निष्कर्ष सामने नहीं आते हैं, तब तक महज आशंका के कारण मोबाइल टावरों को लगाने से नहीं रोका जा सकता है।

उच्च न्यायालय रिलायंस जियोइन्फोकॉम लिमिटेड द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। कंपनी ने आरोप लगाया था कि कोयंबत्तूर शहर के कुछ इलाकों में लोग टावरों के निर्माण में व्यवधान पैदा कर रहे हैं। उसने अपने अधिकारियों के लिए पुलिस संरक्षण की मांग की। पुलिस संरक्षण की अनुमति देते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि मोबाइल टावर से रेडिएशन के खतरे के बारे में लोगों की आशंका का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। न्यायालय ने बंबई उच्च न्यायालय के एक फैसले को भी उद्घृत किया जिसका यही रुख था।

न्यायालय ने कहा कि जब तक मोबाइल टावर से लोगों के स्वास्थ्य को नुकसान होने के बारे में कोई ठोस निष्कर्ष सामने नहीं आता है तब तक उन्हें लगाने से नहीं रोका जा सकता है। उल्लेखनीय है कि कुछ साल पहले राजस्थान उच्च न्यायालय ने स्कूलों और अस्पतालों के करीब मोबाइल टावर लगाने पर रोक लगा दी थी। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने उसके फैसले पर रोक लगा दी थी। 

केंद्रीय भंडारण निगम की याचिका खारिज

बंबई उच्च न्यायालय ने पिछले सप्ताह केंद्रीय भंडारण निगम (सीडब्ल्यूसी) की पांच याचिकाओं को खारिज कर दिया। निगम ने एक्दास मैरिटाइम एजेंसी लिमिटेड के साथ विवाद में मध्यस्थता पंचाट के फैसले को चुनौती दी थी। कंपनी सीडब्ल्यूसी के हैंडलिंग और ट्रांसपोर्ट ठेकेदार के तौर पर काम कर रही थी। उसने आय कर विभाग के पास सेवा कर जमा कराया था। निगम ने कर की राशि ठेकेदार को वापस कर दी। निगम ने मध्यस्थता पंचाट में कहा कि यह राशि देना एक गलती थी और इसे वापस किया जाना चाहिए।

पंचाट ने कहा कि सेवा प्राप्तकर्ता के रूप में सेवा कर देना निगम की जिम्मेदारी थी और अनुबंध की शर्तों के मुताबिक ठेकेदार ने सेवा कर चुकाने की जिम्मेदारी नहीं ली थी। निगम ने उच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश के पीठ में अपील की लेकिन उसे कोई राहत नहीं मिली। न्यायालय ने कहा कि अनुबंध की शर्तों की व्याख्या करने का काम मध्यस्थ का है और न्यायालय ऐसा नहीं कर सकता है। निगम ने फिर खंड पीठ में अपील की और उसने भी इसे खारिज कर दिया। 

सेवानिवृत्त कर्मी पर कार्यवाही 

किसी कर्मचारी के स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बावजूद सेवा के दौरान उसके द्वारा किए गए दुव्र्यवहार पर अनुशासनात्मक कार्यवाही की जा सकती है। बंबई उच्च न्यायालय ने पद्मिनी नंदकुमार बनाम रजिस्ट्रर जनरल, बंबई उच्च न्यायालय वाद में एक सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी की रिट याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला दिया।

जब उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति मांगी, उस समय उनका चयन राष्ट्रीय राजमार्ग पंचाट के अध्यक्ष के रूप में हुआ था। विभाग ने उनके अनुरोध को स्वीकार किया और साफ किया कि उनके खिलाफ सेवा के दौरान शुरू की गई अनुशासनात्मक कार्यवाही जारी रहेगी। न्यायालय ने कहा कि वह स्थिति से अच्छी तरह वाकिफ थी और वह यह दलील नहीं दे सकती हैं कि उनके खिलाफ विभागीय कार्यवाही खत्म की जानी चाहिए। महाराष्ट्र सिविल सर्विस रूल्स पर आधारित उनकी दलीलों को भी खारिज कर दिया गया।  

एक अक्षर से हो सकता है भ्रम

कलकत्ता उच्च न्यायालय ने स्वीटन ब्रांड से स्पीकर और इलेक्ट्रॉनिक सामान बनाने वाली कंपनी प्रोलाइन इंक की ट्रेड मार्क याचिका को स्वीकार कर ली और प्रतिद्वंद्वी कंपनी पर इससे मिलते जुलते नाम का इस्तेमाल करने पर रोक लगा दी। दोनों कंपनियों के ट्रेड मार्कमें केवल एक अक्षर का अंतर है। न्यायालय ने कहा, 'महज एक अतिरिक्त ई जोडऩे से नाम में कोई बड़ा अंतर नहीं आता है और इससे उपभोक्ताओं में आसानी से भ्रम हो सकता है।'

इतना ही नहीं प्रतिद्वंद्वी कंपनी का ट्रेड मार्क का रंग आकार और रंग प्रोलाइन के पंजीकृत ट्रेड मार्क की तरह है। न्यायालय ने इसे ट्रेड मार्क कानून का उल्लंघन मानते हुए कहा, 'ट्रेड मार्क की आकृति, रंगरूप और उच्चारण को देखते हुए यह साफ है कि आम आदमी इससे भ्रम में पड़ सकता है।'

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