बिजनेस स्टैंडर्ड - संकटग्रस्त कंपनियों को स्थिर बनाना
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संकटग्रस्त कंपनियों को स्थिर बनाना

अजय शाह /  June 23, 2019

एक बार जब किसी कंपनी पर बहुत अधिक कर्ज हो जाए तो उधार करना रोजमर्रा का काम हो जाता है। पुराने कर्ज को चुकाने के लिए नियमित तौर पर नया कर्ज लिया जाता है। जब कर्जदारों को संदेह होने लगता है तो उधारी की इस आवक पर रोक लग जाती है और तनाव उत्पन्न होने लगता है। तब तनावग्रस्त कंपनियों को कर्ज चुकाने के लिए नकदी की आवश्यकता होती है। सभी कर्जदाता या कम से कम अधिकांश आगे बढ़कर अपना पैसा वापस मांगते हैं। औपचारिक निस्तारण प्रक्रिया के अभाव में प्रबंधन के पास यह क्षमता होती है कि वह तय करे कि किसका भुगतान किया जाना है। औपचारिक निस्तारण प्रक्रिया का एक लाभ यह है कि प्राथमिकता का क्रम कानूनन तय है। इससे स्थिरता बढ़ती है। 

कई बार कंपनियां यदाकदा उधार लेती हैं। उन्हें इस बात को लेकर चिंतित होना होगा कि कर्जदार उनके बारे में केवल उस वक्त सोचते हैं जब उन्हें नया कर्ज लेना होता है। अन्य फर्म भारी भरकम कर्ज ले लेती हैं। जब उधार बहुत ज्यादा हो जाता है तो पुराना कर्ज चुकाने का सामान्य तरीका यही है कि नया कर्ज ले लिया जाए। कुल मिलाकर उधारी अब कंपनी को चलाते रहने का अहम जरिया बन जाती है। हर महीने या दो महीने में कंपनी को कर्जदारों से संपर्क कर नया कर्ज मांगना पड़ता है। 

जो कंपनी लगातार उधारी लेती है वह एक तरह से तनी हुई रस्सी पर चलती है। किसी भी समय अगर कर्जदारों की ऋण के जोखिम को लेकर अवधारणा बदलती है तो यह कर्ज के प्रवाह को बाधित कर सकता है। भारत में यह दिक्कत खासतौर पर है क्योंकि यहां बॉन्ड बाजार कमजोर है। हमारे यहां वसूली जाने वाली ब्याज दरों में तेजी नहीं आती क्योंकि वह ऋण की गुणवत्ता को प्रभावित करती है।

जब ऋण की गुणवत्ता प्रभावित होती है तो उस तक पहुंच भी कमजोर पड़ती है। इसके परिणामस्वरूप हमें कुछ कंपनियां असहज हालत में मिलती हैं। इन कंपनियों में पुनर्भुगतान बाकी होता है और नए ऋण बाजार तक पहुंच नहीं बन पाती। पहले आदर्श स्थिति की बात करते हैं: कंपनी के पास नकदीकृत परिसंपत्तियां थीं। इस मामले में यह संभव है कि कंपनी को कायदे से नकदीकृत कर दिया जाए। एक एक कर फर्म अपनी परिसंपत्तियों को बेचती है और नकदी की मदद से पुनर्भुगतान करती है। 

आज हमारे देश की वित्तीय स्थिति 10 या 20 साल पहले की तुलना में बेहतर है। अब समुचित समय में ऐसी परिसंपत्ति का निपटान करना और बेहतर मूल्य हासिल करना आसान है। ऐसा करके उन मामलों से निपटा जा सकता है जहां कर्जदाता एक मजबूत कंपनी से रुख फेर चुके हों। परिसंपत्ति का नकदीकरण अच्छी कीमत पर होता है और ऋण भुगतान भी समय पर होता है।

ऐसा ही होना चाहिए। मान लीजिए कंपनी के पास नकदीकृत करने के लिए परिसंपत्ति है। नकदी की तलाश में वह अच्छी परिसंपत्ति को सस्ती दर पर बेच सकती है। ऐसे नुकसान की भरपाई शेयर पूंजी से हो सकती है। दूसरी ओर मान लेते हैं कि कंपनी का परिसंपत्ति मूल्य इतना नहीं कि सारी देनदारी चुकाई जा सके। इन हालात में परिसंपत्तियों की बिक्री कंपनी को गिरावट के चक्र में डाल देती है। हर परिसंपत्ति की बिक्री के साथ उसकी हालत बिगड़ती चली जाती है। उदाहरण के लिए मान लेते हैं कि 100 रुपये की एक बैलेंस शीट है जिसमें 20 रुपये की इक्विटी और 80 रुपये का ऋण है। हड़बड़ी में की गई बिक्री में 50 रुपये की परिसंपत्ति 30 रुपये में बिकती है। इन 30 रुपये का इस्तेमाल ऋण चुकाने में किया जाता है और 20 रुपये का नुकसान इक्विटी पूंजी को समाप्त कर देता है और कंपनी की स्थिति और खराब नजर आने लगती है।

दूसरी ओर अगर 100 रुपये की एक और बैलेंस शीट है जिसमें 50 रुपये की अच्छी और 50 रुपये की ही खराब परिसंपत्ति है। अगर 50 रुपये की अच्छी परिसंपत्ति इसी मूल्य में बिक जाती है और कर्ज चुकता हो जाता है लेकिन इसके पश्चात कंपनी के 50 रुपये की खराब संपत्ति बचती है जिसमें 10 रुपये की इक्विटी और 30 रुपये की ऋण देनदारी है। तब यह कंपनी भी अच्छी नहीं प्रतीत होती। दोनों ही मामलों में कर्ज भुगतान की जरूरत पूरी करने के लिए शीघ्र नकदीकरण से कंपनी को स्थिरता नहीं मिली। नए कर्ज तक पहुंच अवरुद्ध रही। 

दिवालिया प्रक्रिया का औपचारिक संस्थानिक ढांचा यहां मददगार साबित होता है। ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) के तहत एक तारीख ऐसी आती है जहां कॉर्पोरेट इन्सॉल्वेंसी रिजॉल्युशन प्रक्रिया की शुरुआत होती है। इस अवधि में फर्म के खिलाफ सभी दावे निलंबित रहते हैं। यह कर्जदाताओं की समिति के लिए अवसर होता है कि वे कंपनी को स्थिर बना सकें। अगर कंपनी का बचाव संभव नहीं होता है तो तमाम ऋणदाताओं का बकाया चुकाया जाता है।

ऐसे नियम से ऋणदाता थोड़ा स्थिर होते हैं। वे अपनी ऊर्जा का सकारात्मक प्रयोग करते हुए ऋणदाताओं की समिति में शामिल होते हैं ताकि कंपनी का ऐसा पुनर्गठन हो सके कि उसका अधिक से अधिक मूल्य मिल सके। किसी कर्जदाता के लिए ऐसी संभावना नहीं होती कि वह प्रबंधन पर दबाव बनाए और केवल अपना पैसा निकलवा सके। आईबीसी का होना और न होना ही प्रमुख अंतर है।

वित्तीय क्षेत्र विधायी सुधार आयोग (एफएसएलआरसी) द्वारा तैयार डिजाइन में दो तत्त्व शामिल हैं। सामान्य वित्तीय फर्म के लिए और दूसरा व्यवस्थागत रूप से महत्त्वपूर्ण वित्तीय फर्म के लिए दिवालिया प्रक्रिया जो निस्तारण निगम के माध्यम से काम करेगी। यह वित्तीय निस्तारण एवं जमा बीमा (एफआरडीआई) में निहित है। तमाम अन्य फर्म के लिए हमें आईबीसी चाहिए। दिवालिया कानून सुधार समिति की दृष्टि भी कुछ ऐसी ही थी। हम इस बात पर जोर दे सकते हैं कि यह भेद सामान्य वित्तीय बनाम गैर वित्तीय फर्म का भेद नहीं है। बल्कि दो हिस्सों में बंटी इस मशीनरी को क्रियान्वित करना होगा।

हमारे यहां एक और बड़ी कमी है समुचित बॉन्ड बाजार का अभाव। जब ऋण का जोखिम ऊपर जाता है तो उसे महंगी उधारी से जोड़ा जाना चाहिए न कि ऋण बाजार में गिरावट से। बॉन्ड बाजार पहुंच में यह गिरावट मौजूदा माहौल के लिए सबसे बड़ी वजह है। यही वर्तमान में विभिन्न फर्म को अस्थिर कर रही। इसे हल करने के लिए बॉन्ड बाजार सुधार की आवश्यकता है।

(लेखक नई दिल्ली स्थित नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी में प्रोफेसर हैं।)

Keyword: Bond Market, Debt, New Debt, Company, Lender,
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