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जरूरत से ज्यादा कड़ाई

संपादकीय /  June 23, 2019

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की अध्यक्षता में आयोजित वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) परिषद की पहली बैठक में सलाह मशविरे के आधार पर चर्चा करने की पहले से चली आ रही स्वस्थ परंपरा को जारी रखा गया। शुक्रवार को आयोजित इस बैठक में परिषद ने दरों के पुनर्गठन पर कोई निर्णय नहीं लिया और कर वंचना के मामलों पर निगरानी के मानकों को कड़ा करने पर ध्यान केंद्रित किया। इलेक्ट्रिक व्हीकल और चार्जरों पर कर दरों में कमी के प्रस्तावों को निर्धारण समिति को सौंप दिया गया और लॉटरी पर एकसमान जीएसटी दर के विवादित मुद्दे को महान्यायवादी के पास भेज दिया गया। 

परिषद ने करदाताओं को भी यह संदेश दिया कि वह उनकी आशंकाओं को लेकर सचेत है। इस क्रम में उसने वर्ष 2017-18 का वार्षिक जीएसटी रिटर्न भरने की अवधि को दो माह बढ़ाकर अगस्त के अंत तक कर दिया। साथ ही यह घोषणा भी की गई कि अगले वर्ष एक जनवरी से एक फॉर्म वाली नई रिटर्न फाइलिंग व्यवस्था लागू की जाएगी। कारोबार से कारोबार को होने वाले लेनदेन के लिए इलेक्ट्रॉनिक इनवॉइस की व्यवस्था को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी गई। इसे आधिकारिक पोर्टल के माध्यम से अंजाम दिया जाएगा। यह भी एक अच्छा कदम है। हालांकि यही बात उस निर्णय के बारे में नहीं कही जा सकती है जिसके तहत कंपनियों द्वारा तथाकथित रूप से मुनाफाखोरी करने पर भारी भरकम जुर्माना लगाए जाने की बात कही गई। 

बदले हुए नियमों के तहत अगर कर दरों में कटौती से होने वाले लाभ को ग्राहकों को देने के बजाय अपनी जेब में डालने वाली कंपनियां 30 दिन के भीतर उक्त राशि लौटाती नहीं हैं तो उन्हें मुनाफे में कमाई गई राशि का 10 फीसदी जुर्माने के रूप में चुकाना होगा। इसके अतिरिक्त मुनाफे में अर्जित राशि उपभोक्ता को अथवा उपभोक्ता कल्याण बोर्ड को लौटानी होगी। यह अतिरिक्त जुर्माना कारोबारी जगत को भारी पड़ेगा। खासतौर पर तब जबकि मुनाफाखोरी को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने वाले नियमों और निर्देशों का अभाव है। कानून स्पष्ट रूप से यह नहीं बताता है कि लाभ का हस्तांतरण कारोबारी संस्था के स्तर पर होगा या उत्पाद श्रेणी के स्तर पर अथवा शेयर धारक स्तर पर। इसके चलते पहले ही कई बड़ी कंपनियों के बीच विवादों की शुरुआत हो चुकी है। जीएसटी को अपनाने वाले अन्य देशों मसलन ऑस्ट्रेलिया आदि की बात करें तो वहां यह स्पष्ट है कि कैसे समकक्ष प्राधिकार को किसी खास उत्पाद के विशुद्ध मार्जिन की जांच करनी चाहिए। 

भारत में केवल प्रक्रिया के बारे में ही जानकारी दी गई है। यह विचित्र है कि जीएसटी परिषद ने जीएसटी व्यवस्था लागू होने दो वर्ष बाद भी नियम तो नहीं बनाए लेकिन कंपनियों के खिलाफ उसने कड़े प्रावधान अवश्य लागू कर दिए। राष्ट्रीय मुनाफाखोरी रोधी प्राधिकार (एनएए) की कार्यावधि में दो वर्ष का विस्तार भी सवाल उठाने लायक है। इस प्राधिकार का कार्यकाल पहले दो वर्ष का माना जा रहा था। यह अपने मूल विचार में ही सही नहीं था और क्रियान्वयन की चूकों से इसका स्तर और गिर गया। कंपनियों को यह स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वे कर बदलाव पर अपनी प्रतिक्रिया दे सकें। खासतौर पर जीएसटी जैसे जटिल करों के मामले में, जिसकी विविधता का उनकी लागत पर असर पड़ता है। यह उनके प्रतिस्पर्धी और वाणिज्यिक हितों को प्रभावित करता है। अगर प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति कमजोर है और कर दरों का उचित पारेषण नहीं होने दिया जा रहा है तो यह प्रतिस्पर्धा आयोग का विषय है। यह मानना अनुचित है कि प्रतिस्पर्धा के कारण कम दर होने पर भी लागत कम नहीं होगी। जीएसटी का उद्देश्य यही था कि उपभोक्ता पर कम से कम प्रभाव पड़े। ऐसे में अगर एक अस्थायी प्राधिकार की आवश्यकता ही थी तो भी एनएए  को तय अवधि में बंद कर दिया जाना था।

Keyword: Nirmala Sitaraman, Finance Minister, GST, EV, Electric Vehicle, NAA,
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