बिजनेस स्टैंडर्ड - बुनियादी ढांचे में प्रगति के वास्ते कार्यसूची
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बुनियादी ढांचे में प्रगति के वास्ते कार्यसूची

विनायक चटर्जी /  June 21, 2019

नए भारत के निर्माण के लिए बुनियादी ढांचागत क्षेत्र की अनेक समस्याओं को दूर करना होगा। इस सिलसिले में 10 प्राथमिकताएं बता रहे हैं विनायक चटर्जी

 
बुनियादी ढांचा क्षेत्र में बहुत सी समस्याओं को दूर करना होगा। नई सरकार की प्राथमिकताओं में ये 10 विशेष पहल शामिल होनी चाहिए। 
 
सरकारी संपत्तियों की बिक्री : सरकारी खर्च की बुनियादी ढांचा निवेश और अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन देने में प्रमुख भूमिका बनी रहेगी। इस उद्देश्य के लिए उपलब्ध राजकोषीय गुंजाइश बहुत कम है। इस गुंजाइश को केंद्र और राज्यों के स्तर पर चल रही सरकारी कंपनियों में फंसे पैसे को मुक्त कर बढ़ाया जाना चाहिए। यह पहले से प्रमाणित है कि विदेशी संस्थागत निवेशक लंबी अवधि में प्रतिफल देने वाली इन परिसंपत्तियों में निवेश के इच्छुक हैं। हालांकि इससे प्राप्त होने वाली रकम को भारत की संचित निधि में नहीं मिलाया जाना चाहिए, बल्कि इस राशि को एक अलग राष्ट्रीय बुनियादी ढांचा विकास कोष में डाला जाना चाहिए। 
 
पीपीपी प्लग ऐंड प्ले मॉडल को बहाल करना : भाजपा ने अपने घोषणापत्र में वर्ष 2024 तक बुनियादी ढांचे पर 1 लाख करोड़ रुपये के निवेश का महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है, जिसे केवल सरकारी खर्च से हासिल नहीं किया जा सकेगा। तत्काल निजी निवेश लाया जाना चाहिए और इसमें प्लग ऐंड प्ले से बेहतर तरीका अन्य कोई नहीं हो सकता। इस मॉडल में सरकार के 100 फीसदी स्वामित्व वाली एसपीवी (विशेष उद्देश्य इकाई ) बनाई जाती है, जो जमीन अधिग्रहण समेत सभी मंजूरियां, लाइसेंस और स्वीकृतियां लेती है। इसके बाद इस एसपीवी के लिए निजी डेवलपर बोली लगाते हैं। यह जोखिम को बांटने का संभवतया सबसे उपयुक्त तरीका है और इसमें सरकार को सबसे ऊंची बोलियां मिलती हैं। इसके अलावा पीपीपी को उबारने पर केलकर समिति की रिपोर्ट की सिफारिशों पर काम किया जाना चाहिए। 
 
नल से जल : यह भाजपा के घोषणापत्र में आम आदमी के लिए सबसे अधिक लुभावना वादा है। नल से जल के तहत देश के प्रत्येक घर को 2024 तक पाइपलाइन से जलापूर्ति सुनिश्चित की जाएगी। इसे पूरी तरह लागू करने से करोड़ों लोगों, विशेष रूप से महिलाओं के जीवन में बड़ा बदलाव आएगा। इसे सौभाग्य योजना को तेजी से लागू करने के बाद शुरू किया जा रहा है, इसलिए योजना को लेकर लोगों की बड़ी उम्मीदें हैं। सौभाग्य योजना के तहत सभी परिवारों को बिजली कनेक्शन दिए गए हैं। नल से जल योजना से 2024 के चुनावों में तगड़ा चुनावी लाभ मिल सकता है। 
 
राष्ट्रीय बिजली खरीद एवं वितरण कंपनी : उदय के नतीजों के बाद राष्ट्रीय बिजली खरीद एवं वितरण कंपनी (एनपीपीडीसी) की स्थापना और ज्यादा तर्कसंगत नजर आने लगी है। भारत को एक एनपीपीडीसी की जरूरत इसलिए है क्योंकि यह न केवल मुश्किल दौर से गुजर रहीं डिस्कॉम की प्रभावी विकल्प होगी बल्कि बिजली खरीद एवं शुल्कों के लिए एक राष्ट्रीय कीमत तय करने में भी मददगार होगी। एनपीपीडीसी इस स्थिति में होनी चाहिए कि वह खस्ताहाल बिजली उत्पादक कंपनियों को नियमित खरीद की गारंटी दे सके, समय पर भुगतान कर सके और बिखरे हुए बिजली क्षेत्र में खरीद और बिक्री को एक मंच मुहैया करा सके। 
 
नदियों को जोडऩा : पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने 14 अगस्त, 2002 को राष्ट्र को अपने संबोधन में इस विचार का समर्थन किया था और इस पर अमल करने का आग्रह किया था। इससे बाढ़ और सूखे का समाधान मिलेगा। नदियों को जोडऩे से 3.4 करोड़ हेक्टेयर जमीन की सिंचाई की जा सकेगी, ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में पेयजल मुहैया कराया जा सकेगा, 34,000 मेगावॉट जल विद्युत का उत्पादन किया जा सकेगा, देश के भीतर जलमार्ग विकसित होंगे और बड़े स्तर पर रोजगार का सृजन होगा। सरकार ने वर्ष 2003 में उच्चस्तरीय कार्यदल गठित किया था, जिसने 9 सितंबर, 2003 को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। इसमें अनुमान जताया गया था कि नदियों को जोडऩे की लागत 5.6 लाख करोड़ रुपये आने का अनुमान है। संभव है कि अब यह लागत बढ़कर 10 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गई हो। 
 
वर्ष 2024 तक बुलेट ट्रेन चलाने के काम को पूरा करना : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन का 12 सितंबर, 2017 को शिलान्यास किया था। भारत किसी चीज के अनुभव के बाद काम करता है। उदाहरण के लिए दिल्ली मेट्रो और दिल्ली/मुंबई हवाई अड्डे। इस परियोजना के समय पर पूरा होने से रेल यात्रा को लेकर धारणा बिल्कुल बदल जाएगी, भले ही यह रफ्तार, सेवा, आराम या सुरक्षा हो। देश भर में नई पीढ़ी के बीच रेल यात्रा की मांग बढ़ेगी।  
 
तटीय आर्थिक जोन (सीईजेड) को लागू करना : यह अरविंद पानगडिय़ा का एक शानदार सुझाव था, जो उन्होंने नीति आयोग का प्रमुख रहते हुए दिया था। प्रस्तावित सीईजेड में परिधान, फुटवियर, इलेक्ट्रॉनिक्स, हल्की इंजीनियरिंग, चमड़े जैसे श्रम बहुल एवं निर्यात आधारित उद्योगों को लक्षित किया जाएगा। जहाजरानी मंत्रालय ने सागरमाला कार्यक्रम की राष्ट्रीय दृष्टिकोण योजना के तहत तटीय क्षेत्रों में 14 सीईजेड की पहचान की है। केंद्र में मददगार सरकार होने से ये सीईजेड भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धी क्षमता में सुधार ला सकते हैं। 
 
यूएमटीए (एकीकृत महानगरीय परिवहन प्राधिकरण) : भारतीय शहरों को परिवहन से संबंंधित फैसलों में रोजाना आवाजाही करने वाले लोगों को केंद्र में रखना चाहिए। यूएमटीए अनिवार्य और तात्कालिक पूर्व शर्त है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अगस्त 2017 में नई मेट्रो रेल नीति को मंजूरी दी थी। इसके तहत अगर कोई शहर अपनी मेट्रो रेल परियोजना के लिए केंद्र की सहायता लेना चाहता है तो उसकी राज्य सरकार को यूएमटीए की स्थापना एवं परिचालन को लेकर प्रतिबद्धता जतानी होगी। यूएमटीए के विभिन्न विकल्पों को प्रभावी तरीके से जोड़ देने की संभावना है। 
 
बुनियादी ढांचे के लिए एक डीएफआई की दरकार : सरकारी स्वामित्व वाली इंडिया इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनैंस कंपनी लिमिटेड को इस क्षेत्र के लिए डीएफआई (विकास वित्त संस्थान) का दर्जा दिया जाना चाहिए। वाणिज्यिक बैंकों और एनबीएफसी ने परियोजनाओं को लंबी अवधि का कर्ज देने से दूरी बना ली है और बॉन्ड, इनविट, रीट और डेट फंड जैसी बाजार की वैकल्पिक योजनाएं अभी पूर्ण परिपक्वता के स्तर पर नहीं पहुंची हैं। इसलिए निजी घरेलू बाजार में निजी ऋण उपलब्ध नहीं है और लंबी अïवधि के विकास उद्देश्य अनिश्चित स्थिति में हैं। 
 
म्युनिसिपल बॉन्ड : दुनियाभर में म्युनिसिपल बॉन्डों का चलन है और ये शहरी बुनियादी ढांचे एवं सुविधाओं के लिए धन जुटाने का प्रमुख स्रोत हैं। अमेरिका इस समय म्युनिसिपल बॉन्ड बाजार का आकार 3.8 लाख करोड़ डॉलर से अधिक है। जनगृह की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में शहरी निकाय महज 19.1 करोड़ डॉलर जुटा पाए हैं। नगर निकायों की अकाउंटिंग, रेटिंग, स्वायत्तता और नागरिक संस्थानों को बढ़ावा देना होगा जैसा कि संविधान के ऐतिहासिक 74वें संविधान संशोधन में कहा गया है। ऐसा करने के बाद ही म्युनिसिपल बॉन्डों के जरिये पर्याप्त राशि जुटाई जा सकेगी और हम असली स्मार्ट शहर हासिल कर सकेंगे। 
 
(लेखक फीडबैक इन्फ्रा के चेयरमैन हैं।)
Keyword: new india, infrastructure,,
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