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वृद्धि सुस्त व महंगाई कम रहने से हुई दरों में कटौती

अनूप रॉय / नई दिल्ली June 20, 2019

भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) के सदस्य वृद्धि की रफ्तार सुस्त रहने को लेकर चिंतित थे और उन्हें महंगाई नियंत्रण में रहने का भरोसा था, जिसकी वजह से उन्हें नीतिगत दरों में कटौती करने का मौका मिला।  भारतीय रिजर्व बैंक ने 6 जून को नीतिगत दरों में 25 प्रतिशत अंक की कटौती कर दी थी, जिससे रीपो दर घटकर 5.75 प्रतिशत रह गया है और एमपीसी ने एकमत से नीतिगत रुख को 'तटस्थ' से 'समावेशी' कर दिया था।  मौद्रिक नीति समिति की 3, 4 और 6 जून को हुई बैठक के मिनट्स से पता चलता है कि सदस्यों ने यह महसूस किया कि दरों मेंं कटौती और रुख मे बदलाव विभिन्न वजहों से जरूरी है, जिसमें भारत की वास्तविक ब्याज दरें नीचे लाना जरूरी है, जिसने  कारोबारी साझेदारों की तुलना में कारोबार को अप्रतिस्पर्धी बना दिया है। समिति की अध्यक्षता कर रहे रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा, 'वृद्धि की रफ्तार साफतौर पर कमजोर हुई है, जबकि प्रमुख महंगाई दर के अनुमान से पता चलता है कि यह 2019-20 में 4 प्रतिशत से नीचे बनी रहेगी, भले ही पिछली 2 नीतिगत कटौतियों का असर है।'
 
नीतिगत रुख में बदलाव और 25 आधार अंक कटौती के लिए मतदान करते हुुए दास ने कहा, 'वृद्धि और महंगाई की गति को ध्यान में रखते हुए निर्णायक मौद्रिक नीति कार्रवाई की जरूरत है।' डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य की कटौती को लेकर थोड़ी अलग राय थी, लेकिन उन्होंने भी ऐसा ही किया। मिनट्स के मुताबिक आचार्य ने कहा, 'प्रतितथ्यात्मक कवायद से पता चलता है कि रिजर्व बैंक के बेसलाइन अनुमान के मुताबिक नीतिगत रीपो दर 6 प्रतिशत रखना सही है, क्योंकि एमपीसी ने मध्यावधि के हिसाब से महंगाई दर 4 प्रतिशत रखने का लक्ष्य रखा है। बहरहाल अप्रैल महीने के बाद से खाद्य और ईंधन की महंगाई में गिरावट की वजह से प्रतितथ्यात्मक कवायद मेंं थोड़ी सी जगह मिली है, जिससे वृद्धि की रफ्तार को ठीक किया जाए और करीब 2019-20 के मध्य में करीब 20 आधार अंक की कटौती की जाए।'
 
आचार्य ने कहा कि यह महत्त्वपूर्ण है कि केंद्रीय बैंक  महंगाई से लडऩे को लेकर अपनी विश्वसनीयता बरकरार रखे, खासकर आयातित महंगाई के माले में, क्योंकि भारत की अर्थव्यवस्था नियमित तौर पर दोहरे घाटे (चालू खाता और राजकोषीय घाटा) से जूझ रही है, जबकि बाहरी झटके घरेलू कमजोरियों को और बढ़ा रहे हैं। आचार्य ने 2018 में तुलनात्मक रूप से केंद्रीय बैैंक का रुख सख्त रहने की नीति का भी बचाव किया, जब महंगाई दर कम रहने के बावजूद नीतिगत दरों में कोई कटौती नहीं की गई थी।  उन्होंने कहा, 'महंगाई को कम रखना मौद्रिक नीति की सिर्फ मौलिक अवधारणा है, कुछ और भी संकेत चाहिए होते हैं, जिससे महंगाई दर का अनुमान लक्ष्य से कम रखा जा सके और अगर किसी वजह से आयातित महंगाई में तेज बढ़ोतरी होती है तो उसका असर कम किया जा सके।' इसी तरह से नीतिगत दरों में वृद्धि को बहाल कर पाने की भी संभावना रहनी चाहिए। उन्होंने कहा, 'मेरे हिसाब से दरअसल यह शानदार कदम थे, जो पिछले साल एमपीसी ने स्वीकार किया।'
 
मौद्रिक नीति के प्रभारी डिप्टी गवर्नर ने कहा कि भारत की वैश्विक निर्यात में हिस्सेदारी बहुत ज्यादा नहीं है, ऐसे में वैश्विक मंदी और वैश्विक कारोबारी तनाव के भारत पर पडऩे वाले असर को लेकर कुछ बढ़ा चढ़ाकर कहा गया था।  आचार्य ने कहा कि महंगाई पर बेहतर विचार बजट के बाद बन सकेगा, जब यह साफ होगा कि ग्रामीण क्षेत्रों में संकट की स्थिति का समाधान किस तरीके से किया गया है।  रिजर्व बैंक के एक और कार्यकारी निदेशक माइकल पात्रा ने दरों में कटौती और रुख में बदलाव के पक्ष में मतदान करते हुए कहा, 'सिर्फ मौद्रिक नीति से ही आर्थिक गतिविधियों में नए जीवन का संचार नहीं किया जा सकता है। मौद्रिक नीति से पहल हो सकती है, लेकिन इसे व्यापक आर्थिक प्रबंधन की सभी विधाओं से समर्थन वक्त की जरूरत है।'
 
इस मौके पर बाहरी सदस्य रवींद्र ढोलकिया ने कहा कि इस स्थिति में राजकोषीय चूक और इसके महंगाई पर विपरीत असर दोनों ही गलत होगा। उन्होंने कहा, 'मेरे विचार से हमें नीतिगत दरों के माध्यम से असल ब्याज दरों में सुधार जारी रखनी चाहिए। ऐसे में मैं रुख में बदलाव और दरों मेंं 25 आधार अंक कटौती के पक्ष मेंं मतदान करूंगा, हालांकि इस समय मैं नीतिगत दरों में 40 आधार अंक कटौती के पक्ष में हूं।' उन्होंने कहा कि वास्तविक ब्याज दर 1.5 प्रतिशत तक कम होनी चाहिए। ढोलकिया ने कहा कि महंगाई दर 3.7 प्रतिशत के आसपास रहने की उम्मीद है, ऐसे में नीतिगत दरों में 75-80 आधार अंक कटौती की गुंजाइश है। बहरहाल कटौती को लेकर आगे बढऩे में सावधानी जारी रखी जानी चाहिए और इस मामले में धीमा और स्थिर तरीका अपनाना चाहिए।  चेतन घाटे ने भारत के वृद्धि मॉडल के प्रकृति को लेकर चिंता जताई। वहीं एक और बाहरी सदस्य पामी दुआ ने कहा कि धूमिल वैश्विक परिदृश्य से भी पता चलता है कि भारत मौजूदा परिस्थितियों में बाहरी वृद्धि इंजन पर भरोसा नहींं कर सकता। 
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