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देसी फर्मों में हिस्सा लेने वाले विदेशी निवेशकों की संख्या में बढ़ोतरी

सुरजीत दास गुप्ता और सचिन मामबटा / नई दिल्ली June 19, 2019

कुछ महीने पहले कई भारतीय कंपनियों ने डीएचएफएल की दो वित्तीय सेवा कंपनियों अवांसे और आधार हाउसिंग खरीदने में दिलचस्पी दिखाई थी, जिसकी बिक्री हो रही थी। लेकिन जब वित्तीय बोली लगाने का समय आया तो सभी ने इस सौदे से हाथ खींच लिए। आखिर में वैश्विक पीई फंड वारबर्ग पिनकस और ब्लैकस्टोन ने इन कंपनियों को खरीद लिया। सूत्रों ने कहा कि फंड की कमी के चलते ही भारतीय प्रवर्तकों ने हाथ खींच लिए थे। यह सिर्फ एक उदाहरण है कि किस तरह से विदेशी निवेशकों खास तौर से वैश्विक पीई फंड भारतीय कंपनियों की नियंत्रक हिस्सेदारी के अधिग्रहण में नकदी संकट झेल रहे प्रवर्तकों से आगे निकल गए।
 
वित्त वर्ष 2019 में विदेशी निवेशकों ने भारतीय कंपनियों की नियंत्रक हिस्सेदारी खरीदने में 21.28 अरब डॉलर खर्च किए। भारतीय कंपनियों की तरफ से इस अवधि में अधिग्रहण सौदों पर हुए 5.6 अरब डॉलर के निवेश से यह काफी आगे है। एक साल पहले यानी वित्त वर्ष 2018 में भारतीय निवेशक इस मामले में विदेशी निवेशकों से काफी आगे थे और देश के 76 फीसदी सौदों पर कब्जा किया। वित्त वर्ष 2019 में हालांकि उनकी हिस्सेदारी काफी ज्यादा घटकर कुल सौदों का 21 फीसदी रह गई। दिलचस्प रूप से विदेशी निवेशकों के सौदों का आकार देसी निवेशकों के मुकाबले काफी बड़ा था। वित्त वर्ष 2018 में विदेशी निवेशकों के सौदे का औसत आकार 64.4 करोड़ डॉलर था जबकि भारतीय निवेशकों का 14.4 करोड़ डॉलर था।
 
अधिग्रहण के मामले में भारतीय कंपनियों के पिछडऩे की वजह समझना मुश्किल नहीं है। कर्ज के बोझ से दबे भारतीय कारोबारी घराने नई परिसंपत्तियां खरीदने के बजाय अपनी परिसंपत्तियों के मुद्रीकरण पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। साल 2017 की क्रेडिट सुइस की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय कंपनी जगत कर्ज संकट में फंस रही है। अनुमान लगाया गया था कि भारतीय कंपनियों के 530 अरब डॉलर का 40 फीसदी ब्याज का भुगतान भी नहीं कर पाएंगे। ये चीजें इस वास्तविकता में प्रतिबिंबित हुईं जब 2016-17 में उद्योग का क्रेडिट ग्रोथ घट गया और 2017-18 में महज 0.7 फीसदी बढ़ा। इसके अतिरिक्त बैकों की तरफ से उद्योग को दी जाने वाली उधारी में बढ़ोतरी भी उस वित्त वर्ष में घटकर महज 3.3 फीसदी रह गई।
 
उद्योग के विशेषज्ञों ने कहा कि भारतीय कारोबारी घरानों ने कर्ज में 3.50 लाख करोड़ रुपये की कमी लाने के लिए अपनी परिसंपत्तियों का मुद्रीकरण किया। उदाहरण के लिए जीएमआर समूह ने अपना कर्ज 32,000 करोड़ रुपये से घटाकर 12,000 करोड़ रुपये पर ला दिया है। कुछ दिन पहले अनिल अंबानी समूह ने ऐलान किया कि उसने कर्ज में 35,000 करोड़ रुपये की कमी की है, वहींं रुइया ने कर्ज में 1,35,000 करोड़ रुपये की कमी की है। कुछ भारतीय कंपनियों ने कर्ज का बोझ अपने आप कम किया, वहीं अन्य को दिवालिया संहिता की ओर जाना पड़ा। लेकिन कर्ज घटाने के लिए रकम का बड़ा हिस्सा विदेशी निवेशकों से आया, जिन्होंने इन कंपनियों की नियंत्रक हिस्सेदारी खरीदी। इनमें प्राइवेट इक्विटी फंडों ने अहम भूमिका निभाई। 
 
Keyword: pharma, medicine, health, DHFL,,
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