बिजनेस स्टैंडर्ड - कम लागत वाली तरंग ऊर्जा में संभावनाएं ज्यादा
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कम लागत वाली तरंग ऊर्जा में संभावनाएं ज्यादा

तकनीकी तंत्र
देवांग्शु दत्ता /  June 19, 2019

नवीकरणीय ऊर्जा के जिन स्वरूपों का बहुत कम इस्तेमाल हुआ है उनमें से एक है जल तरंग ऊर्जा। जल तरंगों से बहुत ज्यादा ऊर्जा उत्पन्न होती है। अगर इसे बिजली में बदलकर इसका लाभ उठाया जा सके तो बहुत फायदा हो सकता है। सौर ऊर्जा या पवन ऊर्जा के उलट यह हर मौसम में पूरी तरह उपलब्ध रहती है। हालांकि यह विचार काफी समय से हमारे सामने है लेकिन इस पर बहुत अधिक शोध नहीं किया गया है। जल तरंगों के इस्तेमाल का पहला प्रयास सन 1799 में हुआ जब फ्रांसीसी विद्वान पियरे सिमॉन गिरार्ड ने पानी का एक टर्बाइन बनाया और उसके पेटेंट के लिए आवेदन दिया। ऐसे आधुनिक प्रयोग सन 1940 के दशक में योशिओ मासुदा ने किए। मासुदा जापानी नौसेना में कमांडर थे। उन्होंने एक उपकरण तैयार किया जो दोलन करने वाले पानी के कॉलम (ओडब्ल्यूसी) का प्रयोग करता था।

 
ओडब्ल्यूसी की अवधारणा एकदम सामान्य है। मासुदा ने जो उपकरण बनाया था वह पानी पर बहने वाला एक चैंबर था। इस चैंबर में हवा का एक कॉलम था और नीचे पानी की ओर एक छेद था। जल तरंगों के कारण उपकरण के अंदर पानी का स्तर ऊपर नीचे होता था जिससे एयर कॉलम में संकुचन उत्पन्न होता था। इससे एक पिस्टन संचालित होता था और बिजली बनती थी। वर्तमान में भी इस उपकरण के कुछ बेहतर स्वरूपों का उपयोग आम है। कई अन्य बेहतरीन अवधारणाओं का भी इस्तेमाल किया गया है। साल्टर डक एक और ऐसा उपकरण है जो एक पेंडुलम का इस्तेमाल करता है। इसके अतिरिक्त हाइड्रॉलिक रैम का प्रयोग किया जाता है जो एक दोहरे वॉल्व या मल्टी वॉल्व में दबाव उत्पन्न करके काम करती है। जब तरंग चरम पर होती है तब यह पानी पर दबाव बनाकर उसे रैम में भेजती है। एक वॉल्व बंद होता है और दूसरा खुलता है। इससे ऐसा उच्च दाब बनता है जो पानी को गुरुत्वाकर्षण के प्रतिकूल धकेलता है और टर्बाइन को संचालित करता है। तरंग के लौटने के साथ ही दबाव कम होता है और दूसरा वॉल्व बंद हो जाता है। इस बीच पहला वॉल्व खुल जाता है और टर्बाइन एक बार फिर से चल पड़ती है। कुछ अन्य जनरेटर गति का इस्तेमाल करते हैं। तरंगों की गति का इस्तेमाल करके उसे विद्युत शक्ति में बदला जाता है। एक अन्य अवधारणा है पानी में डूबे हुए कारपेट कन्वर्टर की। यह रबर जैसे लचीले पदार्थों से बना होता है। यह कारपेट तरंग की गति के साथ झुकता है। इस गति का इस्तेमाल पिस्टन को संचालित करने में किया जाता है।
 
ओवरटॉपर्स के रूप में संबद्ध रैंप्स का प्रयोग किया जाता है जो तैरते हुए हाइड्रो इलेक्ट्रिक डैम के रूप में काम करते हैं। जब कोई तरंग अपने चरम पर होती है तब पानी रैंप पर चढ़ता है और जलाशय भर जाता है। इसके बाद हाइड्रो टर्बाइन की सहायता से पानी निकाल दिया जाता है। तरंग ऊर्जा स्थानीय भूगोल, हवा से जुड़े कारकों और विभिन्न तरंगों के आपसी संबंधों के गणित पर निर्भर करती है। ऐसे कई कंप्यूटर मॉडल हैं जो इन चरों का अध्ययन करके यह अनुमान लगाते हैं कि आदर्श स्तर पर कितनी तरंग ऊर्जा निरंतर मिलती रहेगी। इसका बिजली में रूपांतरण आश्चर्यजनक रूप से ऊंचे स्तर पर हो सकता है। एक अनुमान के मुताबिक कुछ उपकरणों के माध्यम से तो 80 से 90 फीसदी तरंग ऊर्जा को बिजली में बदला जा सकता है। हालांकि तरंग ऊर्जा कई कारणों से बेहद महंगी भी है। तरंगों से बिजली प्राप्त करने के लिए जटिल अभियांत्रिकी का प्रयोग करना होता है। इसके अलावा इसे समुद्री मार्ग से कहीं उपयोगी स्थान पर ले जाना भी आसान नहीं है। इस प्रक्रिया में उपयोग किए जाने वाले उपकरणों को भी काफी रखरखाव की आवश्यकता होती है। समुद्र का पानी खारा होता है और खराब मौसम भी कई बार उपकरणों को नुकसान पहुंचाता है या नष्ट कर देता है।
 
हमेशा की तरह नई तकनीक से जुड़ा होने के कारण पर्यावरण को लेकर भी कई गंभीर चिंताएं हैं। तरंग परिवर्तक समुद्री पर्यावरण को कई तरह से नुकसान पहुंचा सकते हैं। पानी के भीतर आवाज की तीव्रता बढ़ जाती है और वह अधिक तेज गति से गुजरता है। हवा के उलट समुद्री जल कहीं बेहतर इलेक्ट्रिकल कंडक्टर होता है इसलिए परिवर्तक और पारेषण व्यवस्था को बेहद सावधानीपूर्वक बनाना होता है। इसका भलीभांति इंसुलेटेड होना आवश्यक है ताकि किसी भी तरह की चुनौती से निपटा जा सके। 
 
यूरोप, ऑस्टे्रेलिया, अमेरिका, वेस्ट इंडीज समेत दुनिया के तमाम देशों में जल तरंग से बनने वाली ऊर्जा को लेकर प्रयोग किए जा रहे हैं। इन देशों में इसके संयंत्र भी स्थापित हैं। देश की इकलौती ऐसी प्रायोगिक परियोजना केरल के विझिनजम में चलाई गई जिसे आईआईटी मद्रास संचालित करता था। इसे कुछ वर्ष पहले बंद कर दिया गया। सौर, पवन या जीवाश्म ईंधन के उलट तरंग ऊर्जा को लेकर देश में कोई मिशन भी नहीं चल रहा है। अमेरिकी ऊर्जा विभाग ने वेव्स टु वाटर नामक दिलचस्प प्रतियोगिता आयोजित की है जिसमें इनाम के रूप में 25 लाख डॉलर की राशि दी जानी है। प्रतिस्पर्धियों को केवल समुद्री लहरों को बिजली के स्रोत के रूप में इस्तेमाल करके समुद्री पानी से स्वच्छ जल निर्मित करना है। उन्हें अपनी परियोजना की अवधारणा और तकनीकी डिजाइन प्रस्तुत करना होगा तथा एक नमूना बनाकर खुली प्रतियोगिता में उसका प्रदर्शन करना होगा। 
 
अब तक तरंग ऊर्जा काफी महंगी है और कई तकनीक ऐसी हैं जो अभी प्रारंभिक स्तर पर हैं। जब तक तकनीक स्थिर नहीं होती है तब तक लागत ज्यादा बनी रहेगी। अगर तकनीक उन्नत होती है और बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है तो तरंग ऊर्जा सस्ती भी होगी और पवन या सौर ऊर्जा से अधिक विश्वसनीय भी होगी। भारत और शेष विश्व के लिए इस क्षेत्र में व्यापक संभावनाएं हैं। हमारे यहां 7,500 किलोमीटर की तट रेखा है, कई द्वीप हैं। हम 60 गीगावॉट तक तरंग ऊर्जा उत्पन्न कर सकते हैं। अमेरिकी ऊर्जा विभाग का अनुमान है कि उसकी बिजली जरूरत का 65 फीसदी इसके जरिये पूरा हो सकता है।
Keyword: renewable energy, power, electric,,
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