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पर्याप्त सलाह, अमल जरूरी

संपादकीय /  June 19, 2019

सरकार कृषि क्षेत्र में ढांचागत सुधार लाने के लिए एक अधिकार प्राप्त समिति के गठन की योजना बना रही है। इसकी कोई खास तुक समझ में नहीं आ रही। इस विषय पर तमाम पैनल पहले ही चर्चा कर चुके हैं और उनकी रिपोर्ट इस संकटग्रस्त क्षेत्र को मजबूत बनाने संबंधी लगभग हर सलाह दे चुकी है। इन पैनलों में सबसे उल्लेखनीय हैं एम एस स्वामीनाथन की अध्यक्षता वाला राष्ट्रीय किसान आयोग, शांता कुमार की अध्यक्षता वाली खाद्य क्षेत्र सुधार समिति और अशोक दलवई के नेतृत्व वाली किसानों की आय दोगुनी करने संबंधी अधिकार प्राप्त समिति। इसके अलावा सरकार का अपना थिंक टैंक नीति आयोग भी कृषि क्षेत्र के कुछ अहम हिस्सों में सुधार के लिए जरूरी और उपयोगी सूचनाएं प्रस्तुत कर चुका है। हकीकत तो यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा अन्य लोगों ने नीति आयोग की संचालन परिषद में प्रस्तावित समिति के संदर्भ में जो बातें कहीं उन पर भी उक्त दस्तावेजों में पर्याप्त चर्चा की जा चुकी है। ये मुद्दे कृषि क्षेत्र में निजी निवेश लाने, लॉजिस्टिक्स, मूल्यवर्धन, विपणन सहायता, सिंचाई, खासतौर पर ड्रिप और अन्य प्रकार की सूक्ष्म सिंचाई तथा उन विधायी बदलावों से संबंधित हैं जो कृषि और उससे संबद्ध क्षेत्रों में सुधार ला सकते हैं।

 
स्वामीनाथन आयोग ने वर्ष 2006 में पांच हिस्सों में जो रिपोर्ट जारी की थी उसमें कृषि विकास कार्यक्रमों में आमूलचूल बदलाव लाते हुए उत्पादन बढ़ाने के बजाय किसानों की आय बढ़ाने पर जोर दिया गया था। सरकार को इस सलाह का महत्त्व समझने और इस दिशा में काम करने में एक दशक से अधिक वक्त लग गया। हालांकि समिति की कई अन्य समान समझदारी भरी अनुशंसाओं पर अब तक ध्यान नहीं दिया गया है। दलवई समिति की 14 हिस्सों में जारी रिपोर्ट का हाल भी कुछ अलग नहीं रहा। इस रिपोर्ट का एक हिस्सा कृषि क्षेत्र के ढांचागत सुधारों और संचालन ढांचे से संबंधित था। इस दिशा में ताजातरीन कवायद सितंबर 2018 में आई रिपोर्ट है जो मौजूदा कृषि संकट की दृष्टि से सर्वाधिक प्रासंगिक है। नीति आयोग द्वारा कृषि क्षेत्र के लिए तीन वर्षीय कार्य योजना भी उतनी ही प्रासंगिक है। अगर सरकार वाकई कृषि क्षेत्र में सुधार लाने को लेकर इतनी तत्पर है तो उसे इन पर ध्यान देते हुए जरूरी सुझावों का चयन करना होगा और समयबद्ध तरीके से उनका अनुपालन करना होगा।
 
उस लिहाज से देखा जाए तो इस सच की अनदेखी नहीं की जा सकती है कि कृषि से जुड़े मसलों में केंद्र के हस्तक्षेप की गुंजाइश बहुत कम है क्योंकि संविधान के मुताबिक यह राज्य का विषय है। केंद्र बिना राज्यों के सहयोग के कुछ खास नहीं कर सकता है। अक्सर राज्यों का पर्याप्त सहयोग नहीं मिल पाता। केंद्र की चुनिंदा पहल मसलन कृषि विपणन सुधार, भूमि की पट्टïा प्रणाली और अनुबंधित कृषि को विनियमित करने जैसी छिटपुट सफलताओं में इस बात की अहम भूमिका रही है। राज्यों के कानूनों में जरूरी सुधारों के गाइड के रूप में काम करने वाले आदर्श विधेयक वांछित परिणाम दे पाने में नाकाम रहे हैं। ऐसे में आश्चर्य नहीं कि स्वामीनाथन आयोग ने कृषि को संविधान की राज्य सूची से हटाकर समवर्ती सूची में रखने की बात कही है। इससे केंद्र कृषि क्षेत्र में कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा पाएगा जबकि राज्य सरकारों के अधिकारों में भी कोई कमी नहीं आएगी। सन 1976 में 42वें संविधान संशोधन की सहायता से शिक्षा, वन एवं वन्यजीव संरक्षण जैसे पांच विषयों को राज्य सूची से हटाकर समवर्ती सूची में डाला गया था। जब तक केंद्र सरकार सांविधिक उपायों से या दबाव बनाकर राज्य सरकारों को मंच पर नहीं लाती है, कृषि क्षेत्र में सुधार होता नजर नहीं आता।
Keyword: agri, farmer, crop,,
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