बिजनेस स्टैंडर्ड - भारतीय कारोबारी समूहों की सीमित वैश्विक पहचान
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भारतीय कारोबारी समूहों की सीमित वैश्विक पहचान

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  June 18, 2019

करीब दो दशक पहले तीन कॉर्पोरेट गुरुओं ने एक पुस्तक लिखी जिसका शीर्षक था: वल्र्ड क्लास इन इंडिया। इन लेखकों में से दो भारतीय थे। एक थे स्वर्गीय सुमंत्र घोषाल जो उस वक्त उभर रहे इंडियन स्कूल ऑफ बिज़नेस (सन 2004 में महज 56 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया) के संस्थापक डीन थे और दूसरी गीता पीरामल, जो भारतीय कारोबारी जगत की सम्मानित इतिहासकार हैं। तीसरे लेखक थे क्रिस्टोफर बार्टलेट। बार्टलेट हॉर्वर्ड बिज़नेस स्कूल से हैं और उन्होंने घोषाल के साथ मिलकर वैश्विक कारोबारी निगमों की प्रकृति पर अन्य किताबें भी लिखी हैं। किताब खूब चर्चा में रही। उन दिनों मैकिंजी द्वारा प्रवर्तित आईएसबी की शुरुआत होने ही वाली थी लेकिन किताब केवल विभिन्न संगोष्ठियों में घोषाल की शानदार उपस्थिति की वजह से चर्चा में नहीं आई। वे दिन भारतीय उद्यमी जगत के लिए उम्मीद से भरे हुए दिन थे। सन 1990 के शुरुआती दिनों के अनुमान के उलट भारतीय कारोबार वैश्विक प्रतिस्पर्धा की लहर को झेल गए थे। तरुण दास के करिश्माई नेतृत्व में सीआईआई की औद्योगिक लॉबी की बातें नीति निर्माण के क्षेत्र में उच्चतम स्तर पर भी सुनी जाती थी। उस वक्त अविभाजित आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे चंद्रबाबू नायडू ने निवेश और तकनीक से जुड़े राजनेता के रूप में अपनी पहचान बनाई थी जो विकास को लेकर कॉर्पोरेट रुख रखता हो। यह उस दौर की बात है जब राष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी का उदय तक नहीं हुआ था। हवाई अड्डों से लेकर सड़कों तक और नए टेलीविजन से लेकर मोबाइल फोन तक भारतीय कारोबारी जगत जल्दी ही चीन का प्रतिद्वंद्वी बनता नजर आ रहा था।

 
वल्र्ड क्लास इन इंडिया नामक पुस्तक में देश में आमतौर पर व्याप्त आशावाद का जिक्र था। किताब में देश की विभिन्न कंपनियों की केस स्टडी प्रस्तुत की गई जिनमें उक्त तमगा हासिल करने का गुण था। इनमें रिलायंस, रैनबैक्सी, विप्रो, बजाज ऑटो, हीरो होंडा, एचसीएल, इन्फोसिस और हिंदुस्तान लीवर जैसे नाम शामिल थे। लेखकों के मुताबिक इन कंपनियों के पास फोकस वाली प्रबंधन नीति तो थी ही, साथ ही आम लोगों और प्रक्रियाओं पर भी पूरा जोर था। ये सारी बातें उन्हें भविष्य के लिए बेहतर बनाती थीं।
 
दो दशक के अंतराल के बाद इनमें से कुछ नामों को लेकर तिरछी मुस्कान देखने को मिल सकती है। रैनबैक्सी एक के बाद एक स्कैंडल में उलझी और इसका देश के औषधि क्षेत्र पर पर दशक भर अत्यंत बुरा असर पड़ा। छह वर्ष के अंतराल में कंपनी में दो मालिक बदले। उसके मूल प्रवर्तक कई बार विवादों तो कई बार मजाकिया कारणों से चर्चा में रहे। हीरो और होंडा ने चौथाई सदी की साझेदारी खत्म की और अलग-अलग राह पकड़ी, हालांकि बाजार हिस्सेदारी में दोनों शीर्ष दो स्थानों पर कायम रहीं। आईटी क्षेत्र की दिग्गज कंपनियां जितना प्रबंधन में बदलाव के लिए सुर्खियों में रहीं उतना ही वैश्विक आईटी सेवा शृंखला में अपने मूल्यवर्धन के लिए भी। उधर हिंदुस्तान लीवर देश के दैनिक उपयोग के उपभोक्ता वस्तु बाजार में अपनी शीर्षस्थ होने की प्रतिष्ठा गंवा चुका है। घोषाल की सूची बताती है कि कॉर्पोरेट समूहों की महानता के बारे में अनुमान लगाना कितना कठिन है। दूर से नजर डालने पर तो टाइटन, इंडिगो, एयरटेल, पेटीएम, फ्लिपकार्ट, ओयो, भारत फोर्ज, रॉयल एनफील्ड, सन फार्मा, जीएमआर, जीवीके और निजी क्षेत्र के बैंकों के उभार का अनुमान लगाना मुश्किल था। 
 
इसी तरह अगर वर्तमान कॉर्पोरेट जगत का सर्वेक्षण किया जाए तो बीते कल का आशावाद गलत प्रतीत होता है। वर्ष 2000 में जेट एयरवेज को एयर इंडिया का प्रतिद्वंद्वी माना जाता था और आईएलऐंडएफएस को भविष्य में बुनियादी निवेश का बहुत बड़ा खिलाड़ी समझा जाता था। जिन कंपनियों और संस्थानों को एक वक्त भारतीय कारोबारी जगत की जीवंतता का प्रतीक माना जाता था वे या तो दिवालिया हैं या फिर डिफॉल्ट कर चुकी हैं। इनमें से कई तो किसी न किसी तरह की धोखाधड़ी के मामले में उलझी हैं। यह संकट दशकों के खराब नीति निर्माण, सांठगांठ वाले पूंजीवाद, कुछ सरकारी संस्थानों की गलत सक्रियता और कुछ अन्य की अक्षमता की वजह से हुआ। परंतु लगभग हर रोज दिख रही अखबारी सुर्खियों के बीच शायद कॉर्पोरेट भारत की एक और कमजोरी की अनदेखी हो गई है। प्रतिस्पर्धा मानक शिथिल होने के तीन दशक बार चंद ही भारतीय कंपनियां ऐसी हैं जिन्हें सही मायने में विश्वस्तरीय कहा जा सकता है। ठीक सन 1970 और 1980 के दशक की तरह देश के सबसे ताकतवर कारोबारी समूह वैश्विक स्तर पर कुछ खास पहचान नहीं रखते। हालांकि इसके कुछ अपवाद भी हैं। 
 
प्रथम दृष्टया इस रुझान में कुछ तो अतार्किक लगता है। कारोबारी सुगमता के मामले में हमारा स्तर कमजोर है और आपको लग सकता है कि शायद इसके चलते देश की बड़ी कंपनियों ने अपनी पूंजी कम प्रतिस्पर्धा वाले देशों में निवेश की हो। विदेशों में कारोबार चलाकर भारतीय बाजार में सेवा देना टैरिफ दरों  में कमी आने के बाद हमेशा एक विकल्प रहा है। टेलीविजन, मोबाइल, घरेलू उपकरण बनाने वाली कई विदेशी कंपनियां ऐसा करती आई हैं। उन्होंने ओनिडा, वीडियोकॉन या माइक्रोमैक्स जैसे भारतीय प्रतिस्पर्धियों को चुटकियों में पीछे छोड़ दिया। 
 
भारतीय उद्यमी जगत के इस सीमित वैश्विक नजरिये को कैसे परिभाषित किया जाए? इस सवाल का जवाब इस बात में निहित है कि हर स्तर पर विकृत पूंजीवाद के सहारे लालफीताशाही की जटिलताओं में से राह निकाल ली जाती है। जिनको इस खेल में महारत हासिल है उनके लिए यह सांठगांठ समान शर्तों पर नीतिगत सोच के साथ प्रतिस्पर्धा से बचने का रास्ता बन जाता है। असमान कारोबारी शर्तें आकर्षक हो सकती हैं लेकिन हालिया कारोबारी इतिहास यही बताता है कि लंबी अवधि में यह भारतीय उद्यमियों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए नुकसानदेह है। 
Keyword: corporate, group, business,,
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