बिजनेस स्टैंडर्ड - आगामी बजट में वृद्धि बढ़ाने पर हो जोर
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आगामी बजट में वृद्धि बढ़ाने पर हो जोर

नितिन देसाई /  June 18, 2019

बजट भाषण में पीएसयू बैंकों में सुधार के उपाय, पीएसयू बैंकों का ऋण वितरण बढ़ाने की प्रतिबद्धता और एनबीएफसी की समस्याओं के समाधान के लिए विशेष उपाय शामिल होने चाहिए। बता रहे हैं नितिन देसाई 

 
अगले महीने के शुरू में नई वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का पहला बजट पेश करेंगी। उनके सामने मुख्य चुनौती निरंतरता और बदलाव के वादे में तालमेल बैठाना होगा ताकि चुनावी वादों से पैदा हुई उम्मीदों को पूरा किया जा सके। लेकिन वर्तमान स्थिति में इसे कम अहमियत दी जानी चाहिए और अर्थव्यवस्था को खुराक देने की जरूरत को सबसे अधिक प्राथमिकता दी जानी चाहिए क्योंकि अर्थव्यवस्था बीमार होने के संकेत दिखा रही है। उन्हें जिन आर्थिक चिंताओं पर विचार करना होगा, उनकी फेहरिस्त लंबी है और इनमें ये शामिल हैं। 
 
1. जीडीपी की वृद्धि दर लगातार घट रही है। यह वित्त वर्ष 2018-19 की जनवरी-मार्च तिमाही में घटकर 5.8 फीसदी पर आ गई है। 
 
2. कर संग्रह में भारी कमी से राजकोषीय दबाव बढ़ा है। इससे 2018-19 में वास्तविक घाटा जीडीपी के 4 फीसदी से अधिक हो गया है। इसे चालू वित्त वर्ष के बहुत से खर्च को अगले वित्त वर्ष में स्थानांतरित कर छिपाया गया है। 
 
3. गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों में डिफॉल्ट के जोखिम और धोखाधड़ी के गंभीर आरोपों जैसी प्रमुख समस्याएं हैं। इससे इन कंपनियों से निवेशक दूर होंगे और कर्ज लेने के इच्छुक लोगों को कर्ज नहीं मिल पाएगा। 
 
4. कंपनी क्षेत्र में बैलेंस शीट की समस्याएं बरकरार हैं। बड़ी कंपनियों में से करीब 25 फीसदी कर्ज घटाने और अपना वजूद बचाने के लिए कड़ी जद्दोजहद कर रही हैं। 
 
5. लघु एवं मझोले उद्योगों को ऋण लेने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। 
 
6. रोजगार सृजन की धीमी रफ्तार और किसानों के संकट को लेकर चिंताएं बरकरार हैं। 
 
अमेरिका एवं ईरान और अमेरिका एवं चीन के बीच विवाद और वैश्विक वृद्धि के मुख्य अगुआ देशों में मंदी से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर जोखिम बना हुआ है।  हालांकि नई वित्त मंत्री और नई चुनी गई सरकार का पहला बजट महज मरम्मत का काम नहीं हो सकता। शब्द और सुर बहुत अधिक मायने रखते हैं। इसलिए वित्त मंत्री को वह संवाद कौशल दिखाना चाहिए, जो उन्होंने पार्टी प्रवक्ता रहते हुए दिखाया था। लेकिन मौजूदा स्थिति में उन्हें क्या संदेश देने की कोशिश करनी चाहिए? वित्त मंत्री का भाषण बजट को बुनियादी ढांचे और कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च के उन वादों को पूरा करने के रूप में पेश कर सकता है, जो सत्तारूढ़ पार्टी ने चुनावी घोषणापत्र में किए थे। लेकिन इस साल यह विकल्प उपलब्ध नहीं है क्योंकि कर संग्रह के रुझानों पर हाल के आंकड़े सार्वजनिक खर्च में किसी बड़ी बढ़ोतरी की गुंजाइश नहीं छोड़ते हैं। 
 
वह इस राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति उन कुछ प्रमुख सुधारों के ब्योरों के बारे में बताकर कर सकती हैं, जो चुनावी घोषणापत्र का हिस्सा हैं। हालांकि यह बहुत मुश्किल होगा क्योंकि इन ब्योरों पर काम करने के लिए ज्यादा समय की जरूरत होगी, जबकि उनके पास बजट पेश करने में एक महीने से भी कम समय बचा है।  एक ज्यादा अच्छा विकल्प राजकोषीय स्थिति को दुरुस्त करने और लघु एवं मध्यम अवधि के घाटे के लक्ष्यों के दायरे के भीतर बने रहने का वादा है। लेकिन ऐसा होने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं क्योंकि वास्तविक घाटा 2018-19 के बजट में तय लक्ष्यों से ऊपर बना हुआ है और अंतरिम बजट के कर अनुमान वास्तविकता के नजदीक नजर नहीं आ रहे हैं। 
 
तेल की कीमतों में बढ़ोतरी की संभावनाओं और देरी से मॉनसून के खाद्य कीमतों पर असर के कारण अर्थव्यवस्था पर महंगाई का जोखिम है। लेकिन ये दबाव आपूर्ति से संबंधित हैं, जो ऊंची ब्याज दरों या घाटे को नियंत्रित करने जैसे मांग पर अंकुश लगाने वाले उपायों से खत्म नहीं होंगे। इसलिए हाल में ब्याज दरों में कटौती स्वागत योग्य है और इससे निश्चित रूप से मदद मिलेगी। लेकिन ब्याज दरों में कटौती अपने आप में पर्याप्त नहीं है। दरों में कटौती का लाभ ग्राहकों तक पहुंचाया जाना चाहिए और पूंजी बाजार के अवरोधों को दूर किया जाना चाहिए। इस साल बजट भाषण वृद्धि को बढ़ाने पर केंद्रित होना चाहिए, जो अर्थव्यवस्था के लिए बेहद जरूरी है। कंपनियों की रिपोर्टों से पता चलता है कि रोजमर्रा के सामान (एफएमसीजी) की ग्रामीण मांग में वृद्धि धीमी पड़ गई है। वाहन और अन्य टिकाऊ उत्पादों की बिक्री के आंकड़े भी मंदी का संकेत दे रहे हैं। इसकी वजह यह हो सकती है कि सातवें वेतन आयोग से मांग में आई तेजी धीरे-धीरे कमजोर पडऩे लगी है। इस मकसद के लिए और मकानों के लिए ऋण मुहैया कराने वाली एनबीएफसी का संकट में होना भी एक अन्य कारण हो सकता है। निजी कॉरपोरेट निवेश में वृद्धि भी सुस्त पड़ रही है क्योंकि मांग में वृद्धि घट रही है और बड़ी कंपनियों में से करीब एक चौथाई ताजा निवेश के बजाय अपने कर्ज को कम करने और अपने वजूद को बचाने पर ध्यान दे रही हैं। निर्यात वृद्धि भी निराशाजनक है। आर्थिक वृद्धि को केवल सार्वजनिक खर्च का सहारा मिल रहा है। 
 
वित्त मंत्री कर संग्रह के वर्तमान रुझानों को मद्देनजर रखते हुए प्रत्यक्ष राजकोषीय प्रोत्साहनों के बारे में विचार नहीं कर सकती हैं। हालांकि बजट को नीतिगत बदलावों से मदद मिल सकती है। ये बदलाव उद्योग के लिए मांग की संभावनाएं सुधारते हैं। बजट नए ग्राहकों को आकांक्षी मध्य वर्ग में ला सकता है, संभवतया जीएसटी परिषद के समक्ष उचित अप्रत्यक्ष कर बदलावों का प्रस्ताव रखकर। बजट में ऐसे उपाय शामिल होने चाहिए, जिनसे मेट्रो रेल जैसे उच्च तकनीक वाले बुनियादी ढांचे के लिए रक्षा खरीद एवं सरकारी खरीद और घरेलू विनिर्माताओं के बीच जोड़ मजबूत हो। इसके लिए विनिर्माताओं को डिजाइन के चरण में शामिल किया जाना चाहिए। 
 
एक अन्य क्षेत्र, जिसमें बड़े सुधारों की जरूरत है, वह कृषि विपणन एवं प्रसंस्करण है। क्या वह ऐसे उपायों की घोषणा करना चाहेंगी, जो डेरी, मांस निर्यात और चमड़ा उद्योग को गौ रक्षकों के डर से मुक्त करेंगे? वित्त मंत्री को वृद्धि को बढ़ाने के पैकेज में संगठित विनिर्माताओं और असंगठित क्षेत्र के लिए सूक्ष्म-आर्थिक उपाय शामिल करने चाहिए, जिनका जोर मांग वृद्धि और ऋण प्रवाह को बढ़ावा देने पर होना चाहिए। वित्तीय बाजारों में उठापटक एवं असमंजस की स्थिति है। इसे मद्देनजर रखते हुए वित्त मंत्री को 70 फीसदी वित्तीय संपत्तियों के धारक वित्तीय संस्थानों की नियंत्रक के रूप में इनके बारे में व्यापक प्रस्ताव पेश करने होंगे। बजट प्रस्ताव में पीएसयू बैंकों के लिए सुुधार उपायों, पीएसयू बैंकों का ऋण वितरण बढ़ाने की प्रतिबद्धता और एनबीएफसी की दिक्कतों को दूर करने के लिए विशेष उपायों को शामिल किया जाना चाहिए। अगर सेबी घरेलू प्राइवेट इक्विटी एवं वेंचर फंड को प्रोत्साहन देने और विशेष रूप से स्टार्टअप के लिए आईपीओ विकल्पों को बढ़ाने के लिए कुछ अच्छे सुझाव देता है तो वित्त मंत्री को उन्हें बजट में जगह देनी चाहिए। 
 
लंबी अवधि में वृद्धि एवं रोजगार की संभावनाएं बनाए रखने, सामाजिक सुरक्षा एवं जीवन स्तर सुधारने जैसे सुधारों को इन पर काम करने के बाद लागू किया जा सकता है। राजकोषीय मितव्ययिता को नहीं भूला जाना चाहिए, लेकिन यह मुख्य मुद्दा नहीं होना चाहिए। यह राजस्व एवं व्यय के तर्कसंगत अनुमानों पर आधारित होनी चाहिए। यह बजट अल्पावधि में वृद्धि को बढ़ाने वाले उपायों पर केंद्रित होना चाहिए और भरोसे को मजबूत करने और निवेशकों के रुझान को एक खुराक मुहैया कराए। 
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