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वैश्विक कारोबारी जंग को देखते हुए स्वर्ण भंडार बढ़ाने की रणनीति अपना रहा है भारत

अनूप रॉय और राजेश भयानी / मुंबई June 17, 2019

अमेरिका और चीन के बीच कारोबारी जंग से वैश्विक कारोबार अनिश्चितता से घिर गया है। ऐसे में केंद्रीय बैंक अन्य देशों की तरह ही विदेशी मुद्रा भंडार के फिर से समायोजन में लगा है। अब मुद्रा भंडार में सोने के पक्ष में समायोजन हो रहा है, जो सुरक्षा व रणनीतिक वजहों से है।  सभी देशों की अपनी वजहें होती हैं, लेकिन केंद्रीय बैंक अपने देशों की वित्तीय स्थिरता के हिसाब से ऐसा करते हैं और वे अनिश्चितता की स्थिति में प्राचीन समय से विश्वसनीय सोने पर दांव लगा रहे हैं।  अब तक चीन और रूस सबसे आक्रामक खरीदार रहे हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के आंकड़ों के मुताबिक भारतीय रिजर्व बैंक के पास दुनिया का 10वां सबसे बड़ा स्वर्ण कोष है।
 
भारत ने 2009 में आईएमएफ से 200 टन सोना खरीदकर दुनिया को चौंका दिया था। उसके सात साल बाद तक भारत ने कोई सोना नहीं खरीदा। लेकिन रिजर्व बैंक ने 2017 में 0.3 टन, 2018 में 42.3 टन और 2019 में 12.1 टन सोने की खरीद की है। इसके पास कुल सोना 612.6 टन हो गया है।  विश्व स्वर्ण परिषद (डब्ल्यूजीसी) के मुताबिक केंद्रीय बैंक की सोने की मांग बढ़कर 2018 में कई दशकों के शीर्ष स्तर 651 टन पर पहुंच गई और मांग में 2017 की तुलना में 74 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। यह राशि 1971 में ब्रेटन वुड्स सिस्टम खत्म किए जाने के बाद सबसे ज्यादा है।
 
2018 में रूस, तुर्की और कजाकिस्तान पूरे साल के दौरान सबसे बड़े खरीदार बने रहे, लेकिन अब इसमें अन्य केंद्रीय बैंक भी शामिल हो गए हैं।   डब्ल्यूजीसी ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है, 'भू राजनीतिक और आर्थिक अनिश्चितता बढऩे के साथ केंद्रीय बैंक अपने भंडार का विविधीकरण कर रहे हैं और वे सुरक्षित और तरल संपत्तियों में निवेश करने के मुख्य उद्देश्य पर फिर से ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।' डब्ल्यूजीसी ने कहा, 'वैश्विक आर्थिक संकट को एक दशक हो चुके हैं, इसके बावजूद अभी निश्चितता नहीं दिख रही है। केंद्रीय बैंक अपने स्वर्ण भंडार बढ़ाकर व्यापक आर्थिक व्यवस्था और भू राजनैतिक दबावों को कम करने की कवायद कर रहे हैं।' 
 
वैश्विक अनिश्चितता के मामले में रूस और चीन का मामला अलग अलग है। वे अमेरिका केंद्रित आर्थिक व्यवस्था से हटने के मकसद से सोने की सक्रियता से खरीदारी कर रहे हैं।  अमेरिका ने चीन के 325 अरब डॉलर के चीनी सामान पर 25 प्रतिशत शुल्क लगाने की धमकी दी है, जिससे प्रतिस्पर्धी शुल्क की शुरुआत हो सकती है। अगर अमेरिका समझौता करने की मनोदशा में नहीं है तो 29 जून को कारोबारी वार्ता खत्म हो जाएगी। मॉर्गन स्टैनली के मुख्य अर्थशास्त्री चेतन अह्या ने बिजनेस स्टैंडर्ड से बातचीत में कहा है कि अगर ऐसा होता है तो तीन तिमाहियों में दुनिया में मंदी छा सकती है। अह्या ने चेतावनी दी थी कि ऐसी स्थिति में भारत भी सुरक्षित नहीं रहेगा।
 
बहरहाल इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिकी डॉलर को निवेशक छोड़ देंगे। वैश्विक उथापुथल की स्थिति में निवेशक डॉलर पर भरोसा करते हैं क्योंकि यह वैश्विक कारोबार की मुद्रा है। यूरो ने डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती देने की कवायद की, लेकिन ब्रेक्जिट व अन्य अनिश्चितताओंं की वजह से अब यूरोपियन यूनियन में ही इसके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। चीनी युवान में कारोबार बढ़ रहा है, लेकिन इस मुद्रा पर इतना नियंत्रण है कि यह मुक्त रूप से बदली नहींं जा सकती। ऐसे में यह मुद्रा डॉलर की जगह नहीं ले सकती। 
 
वहीं इसके विपरीत डॉलर पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा तरल मुद्रा है। इसे पेट्रो डॉलर भी कहा जाता है क्योंकि तेल की खरीद डॉलर में की जाती है। सऊदी अरब अपने तेल निर्यात का बिल डॉलर में बनाता है, जो अमेरिका के साथ समझौते के तहत किया जाता है और अमेरिका इसके बदले उसके तेल क्षेत्र को संरक्षण प्रदान करता है। सऊदी में भी स्थानीय मुद्रा रियाल में भुगतान करना संभव नहीं है।  ऐक्सिस बैंक में मुख्य अर्थशास्त्री सौगात भट्टाचार्य ने कहा, 'भारत को सऊदी अरब के साथ कारोबार में भारी व्यापार घाटा उठाना पड़ता है, ऐसे में सऊदी रियाल में तेल का भुगतान करना कठिन हो जाता है। कारोबारी घाटा भारत के पक्ष में होने पर सामान्यतया द्विपक्षीय मुद्रा में कारोबार संभव हो पाता है। साथ ही गैर पारंपरिक मुद्रा भंडारण की कवायदों के बावजूद भविष्य में भी डॉलर के मजबूत रहने की संभावना है।'
 
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि डॉलर का प्रभुत्व हमेशा के लिए बना रहेगा। देशों ने ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) जैसे रणनीतिक गठबंधन बनाए हैं, जो ब्लॉक के रूप में काम करते हैं और रणनीतिक मसलों पर साथ मिलकर मतदान करते हैं। ब्रिक्स देशोंं की आईएमएफ में हिस्सेदारी करीब 16 प्रतिशत है, जो अमेरिका के बराबर है और वह अमेरिका के दबाव में फैसला नहीं कर सकता क्योंकि यह संभव है कि ब्रिक्स ब्लॉक उस फैसले को मंजूरी न दे। इसके बावजूद सोने की चमक का मुकाबला अभी कोई नहीं कर सकता। इंडसइंड बैंक में मुख्य अर्थशास्त्री गौरव कपूर ने कहा, 'उभरते बाजार के केंद्रीय बैंक सोना खरीदते नजर आ रहे हैं क्योंकि यूरो में जिन संपत्तियों का मूल्यांकन होता है, उनसे मुनाफा बहुत कम है और ब्रेक्जिट के कारण पाउंड में मूल्यांकन वाली संपत्तियां प्रभावित हो रही हैं।' इसके अलावा भारत सहित ज्यादातर देशों के केंद्रीय बैंक कारोबार से जुड़ी अनिश्चितता को नजर में रख रहे हैं। रिजर्व बैंक के एक अधिकारी के मुताबिक कारोबारी बातचीत की विफलता से पैदा होने वाली किसी तरह की विपरीत स्थिति की निश्चित रूप से पूरी तैयारी होनी चाहिए। 
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