बिजनेस स्टैंडर्ड - कचरे का कारोबार और गरीबी की मार
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कचरे का कारोबार और गरीबी की मार

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  June 17, 2019

मेरी नजर कचरे के एक विशाल ढेर पर है जो बाकी कचरे से अलग है। यह कचरा मेरे, आपके और हम जैसे अनगिनत लोगों के घरों से आया है। इसे छांटा गया है, अलग किया गया है और इससे एक अलग तरह का ढेर लग गया है। मैं दिल्ली के टिकरी कलां में हूं जिसे एशिया का सबसे बड़ा थोक कचरा बाजार कहा जा सकता है। जाहिर तौर पर यह जगह शहर के बाहरी इलाके में है क्योंकि हम सभी अपना कचरा नजरों से दूर रखते हैं। तभी तो वह हमारे जेहन से भी दूर रहता है। इसके बाद हम उस बाजार में जाते हैं जो बहादुरगढ़ में स्थित है। यह दिल्ली से लगा हुआ हरियाणा का इलाका है। यहां भी छंटे और बिना छंटे कचरे के ढेर लगे हैं। दिल्ली का बाजार कुछ हद तक औपचारिक है क्योंकि इसके लिए दिल्ली विकास प्राधिकरण ने जमीन मुहैया कराई है। हरियाणा का बाजार कृषि भूमि पर स्थित है।

 
मैं किसानों से पूछती हूं कि उन्होंने अपनी जमीन कचरे के कारोबार के लिए क्यों दी? वे हमारा ध्यान उस विकास की ओर दिलाते हैं जिसका नाम मॉडर्न इंडस्ट्रियल एस्टेट है और जो उनके खेतों के करीब स्थित है। रिवर्स बोरिंग (जमीन में गहरे गड्ढे कर अपना कचरा दफन करना) के कारण इस औद्योगिक क्षेत्र से भारी मात्रा में औद्योगिक कचरा किसानों की खेती की जमीन में मिलता है। यहां का भूजल रसायनों से संक्रमित हो गया है। अब यहां खेती संभव नहीं है। हम यहां ढेरों चिमनियां और उनसे निकलता धुआं देख सकते हैं। हमारे साथ मौजूद प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी कहते हैं कि हमें सबूत दीजिए और हम उन औद्योगिक इकाइयों को बंद कर देंगे जो रिवर्स बोरिंग करती हैं। दरअसल वे असल सवालों के जवाब देना ही नहीं चाहते। खेतों के करीब और फैक्टरियों से वापस आते समय हम महसूस कर सकते हैं कि किस कदर बदबू और गंदगी फैली हुई है। हरियाणा सरकार ने व्यवस्था की है कि उसके प्रदूषण बोर्ड के अधिकारी पांच साल में एक बार ही किसी औद्योगिक इकाई का निरीक्षण कर सकते हैं।
 
जाहिर है वह चक्र पूरा हो चुका है। इसे हमारे समय की विकृत चक्रीय अर्थव्यवस्था भी कहा जा सकता है। हम कचरा उत्पन्न करते हैं, जमीन और अपनी आजीविका को नष्ट करते हैं, उसके बाद गरीबों को कोई विकल्प देने के बजाय हम उसी कचरे का कारोबार शुरू करते हैं जिसे हमने उत्पादित किया और फेंका है। मैं वहां पर्यावरण प्रदूषण (निरोध एवं नियंत्रण) प्राधिकरण (ईपीसीए) के चेयरमैन के साथ गई थी क्योंकि मैं समझना चाहती थी कि कचरे को खुले में जलाए जाने से रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं। इससे पहले जब चेयरमैन भूरे लाल ने इस क्षेत्र का दौरा किया था तो उन्हें टिकरी और मुंडका प्लास्टिक फैक्टरी में बहुत बड़े पैमाने पर (यह कम करके बताया गया) कचरा मिला था। उन्होंने इस कचरे को हटाने और नियंत्रित रूप से जलाने के लिए एक ऊर्जा संयंत्र ले जाने का निर्देश दिया था। इससे पिछले जाड़ों में बहुत अधिक फर्क पड़ा था।
 
बताया गया कि इस बार खुले में बहुत कम कचरा था। कारोबारियों ने हमें बताया कि कचरा भी एक संसाधन है। वे उसे यूंही जलाए जाने नहीं दे सकते। परंतु सच यह भी है कि कचरे का एक प्रकार ऐसा भी है जिसका पुनर्चक्रण संभव नहीं है। हम जैसे तमाम लोग जो जूते खरीदते हैं, उनके लिए एक जानकारी यह है कि जूतों का ऊपरी हिस्सा दोबारा प्रयोग में नहीं लाया जा सकता। उसे जलाना पड़ता है। ऐसी तमाम अन्य चीजें भी हैं। उदाहरण के लिए बहुस्तरीय प्लास्टिक, हर बार जब हम प्रसंस्कृत और डिब्बा बंद चीजें खाते हैं तो हम ढेर सारा प्लास्टिक कचरा उत्पन्न करते हैं। 
 
इसमें भी दो राय नहीं है कि टिकरी और बहादुरगढ़ जैसे ये बाजार जहां सबसे गरीब लोगों को रोजगार मिलता है, उनके चलते ही आज हम सब शहरों में रहने वाले कचरों के ढेर में डूबने से बचे हुए हैं। ये बाजार गरीबों के श्रम पर आधारित होते हैं। ये गरीब हमारे कचरे को छांटते हैं, उसमें से किसी भी कीमत वाली चीज को अलग करते हैं और उसे प्राथमिक संग्राहक को बेच देते हैं। वह उसे आगे बेचता है और यह सिलसिला चलता रहता है। यह अनौपचारिक कारोबार है लेकिन बहुत संगठित तरीके से काम करता है। मुझे बताया गया कि इस बाजार में कचरे से 2,000 उत्पाद छांटे जाते हैं और इनकी कीमत 5 से 50 रुपये प्रति किलोग्राम तक होती है। इसके कारोबारी जीएसटी चुकाते हैं। पहले सरकार ने 18 फीसदी जीएसटी लगाया था जिसे अब घटाकर 5 फीसदी कर दिया गया है। सरकार इस कारोबार से भी आय अर्जित करती है। इसका समर्थन किया जाना चाहिए क्योंकि यह कचरे से संसाधन बनाता है और हमारे आसपास कचरे के ढेर लगने से बचाता है। हमें इस कारोबार के बारे में कुछ नहीं पता। परंतु हम मानते हैं कि इसे गंदा माना जाता है। नगर निगम कचरा डालने के लिए जमीन दे देंगे लेकिन उसके पुनर्चक्रण के लिए कुछ नहीं करेंगे। हमारे शहरी नियोजन में कबाड़ की दुकानों के लिए कहीं जगह नहीं है।
 
यह ऐसा मुद्दा है जो मुझे खाए जाता है। इस कचरे के प्रबंधन का सही मॉडल क्या होना चाहिए? क्या हमें यह बात स्वीकार कर लेनी चाहिए कि यह कारोबार गरीबों को आजीविका मुहैया कराता है इसलिए यह बेहतर है? इसका अर्थ यह होगा कि हम अधिक से अधिक वस्तुओं का इस्तेमाल करें और उन्हें रद्द करते चलें। क्या यही भविष्य की राह है? मैं यह सवाल केवल टिकरी के संदर्भ में नहीं कर रही बल्कि यह हमारे आसपास की पूरी दुनिया से जुड़ा सवाल है। चीन द्वारा अपने दरवाजे विदेशी कचरे के लिए बंद किए जाने के बाद पुनर्चक्रण करने वालों ने अपना कचरा बेचने के लिए विभिन्न देशों की तलाश शुरू कर दी। क्या यह हमारी कचरा समस्या का हल है? यकीनन नहीं। इस विषय पर हम आगे चर्चा करेंगे।
Keyword: environment, world, india, health, population,,
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