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एनबीएफसी संकट को बेकार नहीं जाने दें

देवाशिष बसु /  June 17, 2019

एनबीएफसी में व्याप्त संकट में हमारे लिए सबसे बड़ा सबक है म्युचुअल फंड और क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों की भूमिका। इन एजेंसियों ने अत्यंत खराब स्थिति वाली कंपनियों को उच्चतम रेटिंग प्रदान की। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं देवाशिष बसु

 
बीते नौ महीनों में चुनिंदा गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) मसलन दीवान हाउसिंग ऐंड फाइनैंस (डीएचएफएल), इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज (आईएलऐंडएफएस) तथा अनिल अंबानी समूह की कुछ कंपनियों की हालत खस्ता रही है। इसकी वजह से वित्तीय क्षेत्र में तमाम उथलपुथल मची। शेयर बाजार का एक हिस्सा भी इससे प्रभावित हुआ। बैंकों और म्युचुअल फंड को इसलिए तकलीफ का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि उन्होंने इन संकटग्रस्त वित्तीय कंपनियों को ऋण दिया। यह संकट कितना गहरा है और इससे क्या सबक निकलते हैं? पहली बात जो हमें पता है वह यह कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक वित्तीय कंपनियों को ऋण देने के मामले में आगे हैं। इनमें भारतीय स्टेट बैंक भी शामिल है। यह एक समय सरकारी बैंकों में सबसे बेहतर माना जाता था लेकिन अब यह फंसे हुए कर्ज का पोस्टर बॉय बन चुका है। 
 
दूसरी बात जो हमें पता है, वह यह है कि यह संकट सन 1980 और सन 1990 की तरह समूचे एनबीएफसी क्षेत्र को नष्टï नहीं कर रहा है। उस दौर में दर्जनों लीजिंग और फाइनैंस कंपनियां, जिनमें से कई छोटी कंपनियां शामिल थीं, उनका रातोरात दिवाला निकल गया था। बीते वर्षो के दौरान वित्तीय कंपनियों के नियमन में काफी सुधार हुआ है और उनमें से अधिकांश का नेतृत्व बेहतर कॉर्पोरेट प्रबंधकों के हाथ में है। यही कारण है कि केवल तीन एनबीएफसी ही मौजूदा संकट की शिकार हुई हैं। इन तीनों मामलों में संकट इसलिए उत्पन्न हुआ क्योंकि प्रबंधन अतिमहत्त्वाकांक्षी था और उसने येनकेन प्रकारेण पूंजी, ऋण पुस्तिका और मुनाफा बढ़ाने का प्रयास किया। ध्यान दीजिए तो आपको बजाज फाइनैंस, चोलामंडलम फाइनैंस, श्रीराम फाइनैंस, एचडीबी फाइनैंशियल सर्विसेज (एचडीएफसी बैंक की खुदरा फाइनैंस कंपनी), पीएनबी हाउसिंग, कैनफिन होम्स और एलआईसी हाउसिंग आदि इसके असर से पूरी तरह सुरक्षित हैं। गत वर्ष उनके मुनाफे और ऋण की गुणवत्ता दोनों में सुधार हुआ। केवल चंद वित्तीय कंपनियां नुकसान में हैं जिन्होंने बिना जांच परख के अचल संपत्ति क्षेत्र की कंपनियों को ऋण दिया और इन कंपनियों ने पैसे की हेरफेर की। ये कंपनियां और आईएलऐंडएफएस, जो स्वयं में एक श्रेणी है, इनका व्यवस्थित ढंग से नकदीकरण करने की आवश्यकता है। ऐसे में भारतीय रिजर्व बैंक का कहना सही है कि यह शैडो बैंकिंग का संकट नहीं बल्कि एक ऐसी समस्या है जो चुनिंदा फर्म तक सीमित है।
 
मैं बहुत अधिक जोर नहीं दे सकता क्योंकि समझदार लोगों की ओर से बिना सोचे समझे प्रतिक्रियाएं तथा नीतिगत उपाय सुझाए जा रहे हैं। एक टेलीविजन चैनल से बात करते हुए फाइनैंस कंपनी पीरामल एंटरप्राइजेज के मालिक और श्रीराम समूह की दो कंपनियों के हिस्सेदार अजय पीरामल ने कहा कि आरबीआई विशेष फंड की व्यवस्था कर सकता है जो एनबीएफसी को ऋण दे सके। या जो नुकसान का पहला झटका सहे। उदाहरण के लिए वह 10 फीसदी ऋण का बोझ सहन कर बैंकों से एनबीएफसी को और अधिक ऋण देने को कह सकता है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि आरबीआई एनबीएफसी को अल्पावधि के प्रपत्र पर ऋण देने के लिए स्पेशल परपज व्हीकल भी तैयार कर सकता है। इसके अलावा बाह्यï वाणिज्यिक उधारी का सहारा भी है। आज सस्ती आवास वित्त कंपनियां भी इनसे पैसे जुटा सकती हैं। क्या आरबीआई समूचे अचल संपत्ति क्षेत्र में ऐसा कर सकता है?
 
अगर पीरामल कुछ ऐसा जानते हैं जो बाकी लोगों को पता नहीं है, तब तो ठीक है, वरना आरबीआई द्वारा शुरुआती 10 फीसदी का बोझ वहन करने की सलाह अतिवादी प्रतीत होती है। अब तक आरबीआई ने दूरी बनाए रखी है और कहा है कि किसी विशेष सहयोग की आवश्यकता नहीं है। पीरामल को दरअसल करना यह चाहिए कि बिना किसी चर्चा के खराब कारकों को तंत्र से बाहर करना चाहिए और इस दौरान उनकी बेहतर परिसंपत्तियों का चयन करके अपने वित्तीय परिचालन को मजबूत करना चाहिए। ऐसा करके ही तंत्र की सफाई की जा सकती है और उसे मजबूत बनाया जा सकता है। बैंकों को खराब कंपनियों को अधिक ऋण देने को कहकर इसमें सुधार नहीं हो सकता। 
 
कौन से बैंक अधिक ऋण देंगे? बेहतर निजी बैंक पहले ही अच्छी परिसंपत्तियों का चयन करने में लगे हुए हैं। जब हम कहते हैं कि बैंकों को अधिक ऋण देना चाहिए तो यह सरकारी बैंकों का जिक्र होता है। बीते 40 वर्ष में ये बैंक भ्रष्टï और अक्षम ऋण वितरण के कारण करोड़ों रुपये गंवा चुके हैं। तमाम लाभ चुनिंदा गड़बड़ी करने वाले प्रवर्तकों के हाथ लगने के बाद नुकसान को समाजवादी अंदाज में साझा करना पूंजीवादी तंत्र के काम करने के तौर तरीकों से एकदम उलट है। अगर हमें प्रोत्साहन भी चाहिए तो भी पहला कम होगा मौजूदा प्रवर्तकों से निजात पाना और उनकी जगह पेशेवरों की मदद लेकर कंपनी का बेहतर से बेहतर मूल्य हासिल करना। ठीक वैसे ही जैसा सरकार ने आईएलऐंडएफएस के साथ किया। परंतु देश के सरकारी बैंक नरेश गोयल तक को समय पर निकालने में नाकाम रहे और जेट एयरवेज डूब गई। ऐसे में एनबीएफसी के लिए समझदारी भरी प्रोत्साहन योजना दिवास्वप्न ही है। 
 
वास्तविक सबक
 
इस संकट का मुख्य सबक है म्युचुअल फंड और क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों की भूमिका। इन्होंने खराब प्रपत्र पर अधिकतम रेटिंग प्रदान की। दोनों का नियमन भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड करता है। उसे इन दोनों से सख्ती बरतनी चाहिए। सन 2017 में तेजडि़ए और फंड उद्योग म्युचुअल फंड के प्रचार के बाद लोगों से आने वाली आवक को संभाल नहीं सके। इससे निवेश की गुणवत्ता गिरी। बहरहाल, जिस प्रकार समुद्र कचरे को बाहर फेंक देता है वैसे ही बाजार ने तेजी के दिनों में म्युचुअल फंड द्वारा लाचार ग्राहकों को बेची गई खराब परिसंपत्तियों को खारिज कर दिया। अगर सेबी समुचित कदम नहीं उठाता है और नियमन में बदलाव नहीं करता है तो यह बार-बार होगा। इस संकट को आधे-अधूरे उपायों से जाया नहीं किया जाना चाहिए और समुचित हल निकाला जाना चाहिए। 
Keyword: NBFC, bank, micro finance, RBI,
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