बिजनेस स्टैंडर्ड - गुजरात मॉडल की वापसी
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गुजरात मॉडल की वापसी

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  June 16, 2019

मोदी-शाह के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी का सत्ता प्रतिष्ठान उनकी कार्यशैली के लिए गुजरात मॉडल जैसे जुमले का इस्तेमाल करने वालों को पसंद करता है। उनके विरोधियों ने इसे सन 2002 के बाद की ध्रुवीकरण की राजनीति से जोड़ दिया है और वे इसका यही अर्थ निकालते हैं। परंतु गुजरात मॉडल की एक कम विवादित अभिव्यक्ति भी है और वह है केंद्रीकृत शासन। प्रधानमंत्री कार्यालय में हुए नए बदलाव इसकी बानगी हैं। प्रधानमंत्री के तीन प्रमुख सहायकों को कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया है जो स्वयं में एक नई नजीर है।  मोदी जिस प्रकार गुजरात में शासन करते थे, यह उसका स्वाभाविक विस्तार है। सहजता के लिए हम इसे प्रशासन का मोदी मॉडल कहकर पुकारेंगे। इसकी शुरुआत गुजरात में 2001-02 में हुई। 2002 से 2012 के बीच उनके दो पूर्ण कार्यकाल और 2001-02 और 2012-14 के दो अधूरे कार्यकाल के दौरान यह विकसित हुआ और उनके साथ दिल्ली तक आया। प्रधानमंत्री के रूप में उनके दूसरे कार्यकाल ने इसे और बल दिया है। अगर आप जोखिम से बचते हैं तो आप म्युचुअल फंड की उस चेतावनी का इस्तेमाल कर सकते हैं कि अतीत का प्रदर्शन भविष्य के बेहतर प्रदर्शन की गारंटी नहीं है। परंतु हम जैसे राजनीतिक विश्लेषकों को ऐसा बचाव उपलब्ध नहीं होता है क्योंकि हमारे प्रकाशित शब्द तुरंत जनता की नजर मे आ जाते हैं। जहां तक मोदी की बात है, उनके भविष्य के कदमों को अतीत से जोड़कर देखना अब तक कामयाब साबित हुआ है। विस्तृत ब्योरों में बदलाव हो सकता है लेकिन बुनियादी बातें समान हैं।

 
मोदी मॉडल के पांच अहम तत्त्व इस प्रकार हैं: 
 
1. सुप्रीमो यानी प्रमुख अपने वफादार सहायकों की मदद से पार्टी पर पूरा नियंत्रण रखेंगे।
 
2. चुनिंदा अफसरशाहों की सहायता से शासन होगा और सेवानिवृत्ति आड़े नहीं आएगी।
 
3. मिशन की तरह शासन करना जहां कुछ ऐसे विचार हों जो एक कार्यकाल में नजर आ सकें, जिन्हें कतिपय चुने हुए लोग अंजाम दे सकें।
 
4. बड़ा वैचारिक परिदृश्य कभी नजरों से ओझल न हो।
 
5. हर प्रकार के भीतरी और बाहरी विपक्ष को साम-दाम-दंड और भेद के जरिये निष्क्रिय करना।
 
गुजरात मझोले आकार का और कम विविधता वाला प्रांत था और वहां यह एकदम सफल रहा। पूरे देश में इसकी सफलता को लेकर संदेह थे। कई बार यह संदेह उभरकर सामने भी आया। उदाहरण के लिए नोटबंदी, विदेश नीति के मोर्चे पर कुछ झटकों, खासतौर पर शुरुआती जोश के बाद अपने पड़ोसी देशों को लेकर, वृद्धि में गिरावट, रोजगार की क्षति और 2017 के गुजरात के एकदम करीबी नतीजों वाले चुनाव के समय ऐसा हुआ। परंतु अंतत: नतीजे ही मायने रखते हैं और आम चुनाव में भाजपा को 303 सीट हासिल हुईं। तमाम अन्य राजधानियों की तरह दिल्ली की प्राथमिक भावना भी अफसरशाही की है। मोदी के पास अपने तीन सहायकों की पदोन्नति के अलावा कोई चारा नहीं था। विदेश सेवा के पूर्व अधिकारी एस जयशंकर को विदेश मंत्री बनाने के बाद उन पर दबाव था कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और पूर्व आईपीएस अधिकारी अजीत डोभाल का दर्जा बढ़ाएं ताकि किसी असहज स्थिति से बचा जा सके।
 
डोभाल को प्रोन्नत करने के बाद नृपेंद्र मिश्रा और पी के मिश्रा की पदोन्नति अनिवार्य थी। यह केवल प्रोटोकॉल की जरूरत के चलते किया गया। अतीत में भी गैर मंत्रियों को कैबिनेट दर्जा दिया गया है। योजना आयोग और नीति आयोग के अध्यक्ष और संप्रग-2 में यूआईडीएआई के प्रमुख के रूप में नंदन नीलेकणी को यह दर्जा दिया गया। यह विश्लेषण तीन कारणों से निरर्थक लगता है। पहला, मोदी के राज में ऐसी बातें अतार्किक हैं। दूसरा, इनसे लगता है मोदी को यह सब दबाव में करना पड़ा। ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जिससे लगे कि मोदी कभी दबाव में काम करते हैं। अफसरशाही के मामले में तो कतई नहीं। इतने प्रचंड बहुमत के बाद वह ऐसा क्यों करेंगे? तीसरी बात, जयशंकर के चयन में उन पर कोई दबाव नहीं था। वह एक बड़ी योजना के तहत किया गया और बाकी कदम उस योजना का हिस्सा हैं। यह पीएमओ अमेरिकी राष्ट्रपति के कार्यकारी कार्यालय की तरह है जहां प्रमुख कैबिनेट मंत्रियों की शक्तियों का प्रयोग यहीं से होता है। मोदी के पहले कार्यकाल में विदेश से लेकर स्वच्छता तक अहम मंत्रालयों पर यहां से सीधे नियंत्रण किया गया। अब इसके नेतृत्वकर्ताओं कैबिनेट मंत्रियों के दर्जे के साथ मोदी के लिए काम संभालेंगे। ब्रिटिश शैली की कैबिनेट व्यवस्था जहां प्रधानमंत्री समान लोगों में प्रथम होता है, उसे पीछे छोड़ दिया गया है। ऐसे अमेरिकी राष्ट्रपति के बारे में सोचिए जो अपने विश्वासपात्र राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की मदद से विदेश और रक्षा विभाग संभाल रहा हो। जबकि यह सलाहकार समान शक्तिशाली व्हाइट हाउस के चीफ ऑफ स्टाफ को भी संभाल रहा हो। मोदी के मामले में दो चीफ ऑफ स्टाफ हैं।
 
इंदिरा गांधी ने सन 1971 में प्रमुख सचिव पद की शुरुआत की और पीएन हक्सर को नियुक्ति दी। उनके बाद मोरारजी देसाई ने वी शंकर को इस पद पर नियुक्त किया। चरण सिंह की जनता सरकार ने इस पद को समाप्त किया लेकिन सन 1980 में इंदिरा गांधी के साथ इसकी भी वापसी हो गई। इस बार उन्होंने पीसी एलेक्जेंडर को प्रमुख सचिव बनाया। सन 1977 के पहले तक इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में जगजीवन राम समेत कुछ शक्तिशाली मंत्री थे लेकिन अब प्रणव मुखर्जी के अलावा ऐसा कोई नहीं था।
 
मोदी का दूसरा कार्यकाल काफी हद तक ऐसा ही है। पहली बात, वह पार्टी पर अमित शाह के जरिये नियंत्रण रखते हैं। दूसरा, इंदिरा गांधी का वैचारिक लक्ष्य निरंतरता का था, वहीं मोदी इससे अलग हैं। खासकर गांधी परिवार द्वारा परिभाषित भारतीय धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा को लेकर। चुनाव परिणाम के दिन पार्टी को संबोधित अपने पहले भाषण में उन्होंने यह बात जाहिर की। तीसरा, उनका कोई परिवार नहीं है। उस लिहाज से भी उनकी तुलना अमेरिकी राष्ट्रपति से हो सकती है। उनका कार्यकाल असीमित भी नहीं है और अमेरिकी राष्ट्रपति की तरह दो कार्यकाल तक सीमित भी नहीं है। उनकी जगह पार्टी का कोई अन्य नेता लेगा, कोई मोदी नहीं।
 
मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में प्रतिभाओं की कमी की आलोचना होती रही। मैंने भी इसे आजाद भारत की प्रतिभा से सर्वाधिक विमुख सरकार बताया था। उस वक्त उनके करीबियों की दलील थी कि प्रतिभा और अनुभव नहीं है तो क्या, हम सीख लेंगे लेकिन सत्ता हासिल कर उसे दूसरों को तोहफे में नहीं देंगे। यह टीम बनाने की वाजपेयी की शैली का अंत है। उन्होंने हर जगह से प्रतिभा जुटाई थी। जसवंत सिंह आरएसएस से नहीं थे, यशवंत सिन्हा और रंगराजन कुमारमंगलम तत्काल ही भाजपा में आए थे, जॉर्ज फर्नांडिस भाजपा-कांग्रेस गठबंधन वाली सरकार की सुरक्षा संबंधी कैबिनेट समिति के पहले और आखिरी गैर भाजपाई-गैर कांग्रेसी मंत्री थे। अरुण शौरी परिवर्तन के शक्तिशाली माध्यम थे जो बाहर से अपनी ईमानदारी और बौद्धिक क्षमता लेकर आए। 
 
मोदी और शाह ने पहले कार्यकाल में इसका उलट किया। वह बाहरियों को राजनीतिक अवसर देने के खिलाफ थे। पेशेवरों, विशेषज्ञों और तकनीकविदों पर भी उन्हें भरोसा नहीं था। बेहतरीन अकादमिक करियर वाले दो आरबीआई गवर्नरों की हालत इसका उदाहरण है। हम जैसे आलोचकों को पुरातन विचार का कहकर या यह कहकर खारिज कर दिया गया कि हम ऐसी सरकार को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं जो दिल्ली के बुर्जुआ चेहरों के बिना बनी है। हालांकि चौथे वर्ष तक अर्थव्यवस्था की स्थिति खराब हो गई और कुछ विधानसभा चुनावों और उपचुनावों के बाद बदलाव के चिह्न दिखने लगे। पूर्व अफसरशाहों आर के सिंह और हरदीप पुरी को सरकार में शामिल किया गया। इन दोनों ने अपना कद बढ़ाया।
 
ऐसे में जयशंकर की नियुक्ति को एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा सकता है। पीएमओ में उपर्युक्त त्रिमूर्ति की तरक्की भी इसकी बानगी है। स्वच्छता और जल एवं आयुष्मान भारत कार्यक्रम प्रधानमंत्री मोदी के दिल और राजनीति दोनों के करीब हैं। इनका दायित्व दो पूर्व अफसरशाहों परमेश्वरन अय्यर और इंदु भूषण के पास है। दोनों को विश्व बैंक और एडीबी से वापस लाया गया है। आज का मोदी मॉडल वही है जो पहले गुजरात में था। परंतु ऐसा करते हुए भी यह माना जा रहा है कि देश का शासन गुजरात के शासन से कठिन है। इसके लिए जरूरी प्रतिभा केवल भाजपा में मौजूद नहीं है और मोदी बाहर से भी उसे लाएंगे लेकिन केवल ऐसे लोगों को जिन पर उन्हें भरोसा रहा है। इसलिए सुपर अफसरशाहों के माध्यम से चलाए जाने वाले इस कार्यकाल पर नजर रखिए।
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