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राजनाथ के समक्ष अनियमितताएं दुरुस्त करने की चुनौतियां

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  June 14, 2019

जब राजनाथ सिंह को मंत्रिमंडलीय समितियों-राजनीतिक मामलों और संसदीय मामलों पर मंत्रिमंडलीय समितियों- से बाहर रखा गया तो उनके चेहरे पर शिकन तक नहीं आई। दूसरी तरफ टेलीविजन चैनलों पर मंत्रिमंडल में कथित तौर पर उनका कद कम किए जाने की चर्चाएं जोर-शोर से चल रही थीं। हां, सरकार में कायदे से दूसरे नंबर पर होने के बावजूद इन दोनों समितियों में जगह नहीं मिलने पर थोड़ा आहत होने का हल्का सा इशारा उन्होंने तब दिया जब उन्होंने अपने एक सहयोगी से पूछा, 'क्या अब तुम्हें मैं छह फुट के बजाय पांच फुट का दिखता हूं।' शाम तक सरकार ने अपना निर्णय बदला और अधिसूचना दोबारा जारी की। राजनाथ कभी इस्तीफा का संकेत देते या पेशकश करते या ऐसा करने की धमकी देते नजर नहीं आए। 

 
अनुशासन उनकी एक खास पहचान रही है। उत्तर प्रदेश विधान परिषद का सदस्य बनने से लेकर रक्षा मामलों पर मंत्रिमंडलीय समिति में दूसरी बार शामिल किए जाने तक राजनाथ ने उम्दा एवं उपलब्धियों से भरपूर सफर तय किया है। वह उत्तर प्रदेश में शिक्षा मंत्री, साथ ही प्रदेश एवं राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अध्यक्ष रह चुके हैं। राजग सरकार में वह कई बार केंद्रीय मंत्रिमंडल का हिस्सा रह चुके हैं। राजनाथ आपातकाल के दौरान जनसंघ की छात्र इकाई से जुड़े रहे और मात्र 26 वर्ष की उम्र में 1977 में मिर्जापुर से विधायक चुने गए थे। 1980 के दशक के आखिरी दौर और 1990 के दशक के शुरुआती वर्षों में उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह का जोर था और उन्होंने 1991 में राजनाथ को शिक्षा मंत्री बनाया था। शिक्षा मंत्री के तौर पर उन्होंने सबसे पहले एक अध्यादेश के जरिये ऐंटी-कॉपिंग (नकल रोधी) कानून लेकर आए, जिससे सामग्री चोरी करना गैर-जमानती अपराध हो गया। इसका मतलब यह था कि स्वयं को निर्दोष साबित करने की जिम्मेदारी आरोपी पर थी। यह कानून आने के बाद 14 से 15 वर्ष के बच्चे नकल करने के जुर्म में जेल भेजे जा रहे थे। 1991 में उत्तर प्रदेश उच्च विद्यालय बोर्ड परीक्षा में दसवीं कक्षा उत्तीर्ण होने वाले बच्चों का प्रतिशत 58.03 था। नकल रोधी कानून आने के बाद 1992 में यह आंकड़ा कम होकर 14.7 प्रतिशत रह गया। राजनाथ को इसका खमियाजा भुगतान पड़ा। उन्होंने लखनऊ के निकट छात्रों की बहुलता वाली मोहाना सीट से 1993 में विधायक का चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें बड़ी हार का सामना करना पड़ा। 1994 में उन्हें राज्यसभा भेजा गया। बाद में वह वाजपेयी और मोदी सरकार में मंत्री बने।  
 
अनुशासन का पालन करने की खूबी हमेशा उनकी खास पहचान रही है और अब वह देश के रक्षा मंत्री बनाए गए हैं। वह एक ऐसी पार्टी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, जो सैनिकों को उनका हक और सम्मान दिलाने, नागरिक अफसरशाही की दखलंदाजी रोकने और रक्षा नीतियों में सेना को पर्याप्त भागीदारी देने के वादों के साथ सत्तारूढ़ हुई है। राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा ताने-बाने के अपभंग और नागरिक समाज और सेना के बीच संबधों में अविश्वास के बीज स्वतंत्रता के समय बोए गए थे जब ब्रिटिश काल की सेना की औपनिवेशिक एकीकृत कमान एक राष्ट्रीय सेना में तब्दील हो रही थी। संबंधों में अविश्वास की जड़ कमांडर -इन-चीफ किचनर और वायसराय कर्जन के बीच बार-बार पैदा होने वाले विवाद से जुड़ी है। कर्जन वित्तीय नियंत्रण अपने हाथों में रखने के लिए अपने कार्यकारी परिषद में एक अतिरिक्त सदस्य रखना चाहते थे, लेकिन किचनर इसके खिलाफ थे। अब करीब 150 वर्ष बाद भी उस विवाद की विरासत पीछा नहीं छोड़ रही है। 
 
सुभाष चंद्र बोस और महात्मा गांधी को छोड़कर भारत के किसी भी नेता के पास सैन्य अनुभव नहीं था। स्वतंत्रता के बाद एक बात जिसका सबसे डर सता रहा था वह था तख्तापलट का। मौजूदा सेना विभाग सबसे पहले रक्षा विभाग और बाद में रक्षा मंत्रालय में तब्दील किया गया। उस समय रक्षा सचिव एच एम पटेल और उनके दो अन्य उत्तराधिकारियों ने सेना मुख्यालयों को रक्षा मंत्रालय के साथ जोडऩे की पेशकश की। जनरल राजिंदरसिंहजी और जनरल के एस थिमैया ने इसके लिए हामी नहीं भरी, क्योंकि उन्हें डर सता रहा था कि मंत्रालय के साथ जुडऩे से उनके हाथ से परिचालन नियंत्रण फिसल जाएगा। 
 
जल्द ही सेना जम्मू कश्मीर, जूनागढ़, हैदराबाद और गोवा कार्रवाई में लग गई। हालांकि इसकी प्रतिष्ठा जरूर बढ़ी, लेकिन प्रभाव कम होता गया। बात यहां तक पहुंच गई कि महत्त्वपूर्ण कार्रवाई से जुड़े विषयों में सेना की राय भी नहीं ली गई। नागरिक अफसरशाही और राजनीतिक नेतृत्व ने सेना के तीनों अंगों को छोटा कर दिया। उस समय सेना के जनरल अपना कद छोटा होने की कवायद से बेफिक्र और अनजान थे, जबकि दूसरी तरफ अफसरशाही अपना नियंत्रण मजबूत करती चली गई और 'फूट डालों और राज करो' की नीति पर काम करने लगी। उन्होंने सेना के तीनों अंगों में आपसी समन्वय एवं सहमति पनपने नहीं दी और मंत्रालय के साथ इनके एकीकरण के प्रस्ताव को आगे बढऩे नहीं दिया। 
 
इस तरह, सेना में स्थिति बन गई कि वरीयता क्रम में गिरावट से लेकर वित्तीय एवं परिचालन स्वायत्तता में कमी आई। पदोन्नति, पदस्थापना और यहां तक कि कैंटीन के मुनाफे का वितरण भी बदतर होते हालात की चपेट में आ गए। एक समय रक्षा मंत्रालय ने पदोन्नति परीक्षा की भी जांच करने को कहा, लेकिन मंत्रालय को बताया गया कि यह एक पेशे से जुड़ा मामला है।  राजनाथ को रक्षा मंत्री के रूप में इन अनियमितताओं को दुरुस्त करना है, लेकिन सवाल है कि क्या अनुशासन आड़े आएगा?
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