बिजनेस स्टैंडर्ड - 5 जी की आकांक्षा और हकीकत
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5 जी की आकांक्षा और हकीकत

श्याम पोनप्पा /  June 14, 2019

सरकार 5 जी सेवाओं और डिजिटल इंडिया के लिए क्या कुछ कर सकती है, इस विषय पर विस्तार से प्रकाश डाल रहे हैं श्याम पोनप्पा 

 
देश में 5जी सेवाओं की शुरुआत का विचार हममें से कई को उत्साहित कर सकता है। 5जी तकनीक आखिर है क्या? यह दरअसल दूरसंचार प्रौद्योगिकी का मिश्रण है जहां कहीं अधिक तेज गति वाले डेटा को व्यापक गहन और बेहतर संचार के साथ उपलब्ध कराया जाता है। जबकि इस दौरान ऊर्जा की खपत होती है और बैटरी की अवधि में इजाफा होता है। जाहिर तौर पर यह विकिरण भी कम करता है। लब्बोलुआब यह कि इसकी सहायता से लोग सहज ढंग से और किफायत से अपने काम कर सकेंगे। इसकी सहायता से स्मार्ट फोन से लेकर कंप्यूटर तक, अध्ययन, कार्यालयीन कार्य, शोध, मनोरंजन से लेकर घर-दफ्तर में विभिन्न उपकरणों और मशीनों का इस्तेमाल सहज और सुविधाजनक हो सकता है। आगे बात करें तो यह रेफ्रिजरेटरों, खाना पकाने के उपकरण, औद्योगिक उपकरण, परिवहन आदि के क्षेत्र में भी जीवन को कहीं अधिक आसान बना सकता है। 5जी एक लंबी प्रक्रिया के शुरुआती चरण में है। शायद देश में इसका व्यापक परीक्षण होने में अभी कुछ वर्ष का समय लग जाए। व्यापक उपलब्धता में इससे भी अधिक वक्त लग सकता है। एक अनुमान के मुताबिक इसमें करीब 100 अरब डॉलर का निवेश करना होगा। 
 
इसके अलावा तमाम ऐसी वजह हैं जिनके चलते देश की क्षमताओं में इजाफा जरूरी है। अब यह आवश्यक हो चला है कि हम आयात पर निर्भर रहने के बजाय अपनी जरूरतें खुद पूरी करें। अगर हम चाहते हैं कि पेट्रोलियम आयात हमारे भुगतान संतुलन पर नकारात्मक असर नहीं डाले तो उसके लिए घरेलू क्षमताओं का विकास करना एक तरह की पूर्व शर्त है। बिना घरेलू क्षमताओं के ऊर्जा आयात इलेक्ट्रॉनिक आयात को भी सीमित करेगा। इससे पता चलता है कि हमें सौर ऊर्जा विकास की किस कदर आवश्यकता है।
 
बहरहाल, देश के संचार उद्योग की वित्तीय स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है। क्षमताओं के विकास के लिए राजस्व अर्जित करना और इक्विटी और डेट के संदर्भ में पूंजी तक पहुंच सुनिश्चित करना, दोनों आवश्यक हैं। यह भी अनुकूल दर पर होना चाहिए। दूरसंचार क्षेत्र में कीमतों की जंग के बाद रिलायंस जियो भी अपने कर्मचारियों की तादाद कम कर रही है। इस बीच एयरटेल ने 4जी के बुनियादी ढांचे में काफी निवेश किया है लेकिन वह तब तक 5जी स्पेक्ट्रम के लिए बोली लगाने का अनिच्छुक नजर आता है जब तक कि कीमतों में कमी नहीं आती है।
 
सरकार ने सितंबर 2015 में 5जी के लिए एक समिति गठित की थी। इसकी अध्यक्षता स्टैनफर्ड विश्वविद्यालय के मानद प्रोफेसर आरोग्यस्वामी पलराज को दी गई थी जो बेतार संचार विषय में प्रवीण हैं। इस समिति ने अपनी अनुशंसा में कहा कि नेटवर्क तात्कालिक प्राथमिकता है। उसके अनुसार ऐसा करके ही 5जी नेटवर्क को शीघ्र और किफायती अंदाज में शुरू किया जा सकेगा। बाद के चरणों के लिए प्रौद्योगिकी डिजाइन और निर्माण क्षमता की अनुशंसा की गई। नेटवर्क तैयार करने के लिए नीतिगत समर्थन आवश्यक होता है। खासतौर पर कर्ज के बोझ तले दबे क्षेत्र के लिए जिसका प्रति उपभोक्ता राजस्व लगातार कम हो रहा हो, स्पेक्ट्रम तक जिसकी पहुंच नहीं हो। हालांकि इस बीच अन्य देशों ने अपनी स्थिति मजबूत कर ली है। यह विडंबना ही है क्योंकि भारत इस क्षेत्र में एक बड़ी शक्ति और बड़ा बाजार है। इसके बावजूद सरकार की नीतियां बहुत अधिक सफल साबित नहीं हुई हैं।
 
सरकार ने 5जी के क्षेत्र में बढ़त बनाने की बात कही थी। इसके बावजूद भारत इस क्षेत्र में पिछड़ा हुआ है।   स्पेक्ट्रम आवंटन और बड़े परीक्षण 2019 के अंत तक होने थे जबकि नीलामी 2020 तक होनी थी। बहरहाल, सरकार ने कहा है कि सितंबर तक 5जी परीक्षण और 2019 के अंत तक नीलामी की जाएगी। चूंकि अभी स्पेक्ट्रम बैंड के विकल्प और परीक्षण के लिए आवंटन अभी होना है इसलिए ऐसे तमाम मसलों को हल किए बिना इस दिशा में आगे बढऩा दिक्कतदेह हो सकता है। इसके अलावा हमारे देश में स्पेक्ट्रम का आरक्षित मूल्य कोरिया की तुलना में सात गुना है। क्षेत्रवार नकद प्रवाह कमजोर है और ग्राहक ऐसे हैं जो बहुत सस्ती सेवाएं चाहते हैं। एकाधिकार वाली व्यवस्था सार्वजनिक हित में नहीं होगी। ऐसे में वायरलेस रिसोर्स वर्चुअलाइजेशन और नेटवर्क फंक्शन वर्चुअलाइजेशन नेटवर्क स्थापना और बाजार विकास का बेहतर विकल्प हो सकता है।
 
पता नहीं क्यों सरकार और आम जनता अभी भी संचार को सरकारी दुधारू गाय की तरह समझते हैं जबकि हकीकत में यह एक अहम बुनियादी ढांचा है। इस बीच कम निवेश और खराब सेवाओं का रोना भी रोया जाता है। सरकार की ओर से भारी भरकम शुल्क भी निवेश को कम करते हैं। राजस्व के करीब 29 से 32 फीसदी के अलावा वह कॉर्पोरेट कर भी लेती है। सरकार इसमें बदलाव ला सकती है या फिर वह 5जी और संचार सेवाओं की स्थापना से जुड़ी बढ़त को गंवा सकती है। 
 
कैसे हो शुरुआत
 
  1. सरकार निम्नलिखित कदम उठाकर इस काम को गति प्रदान कर सकती है:
  2. संचार क्षेत्र के बुनियादी क्षेत्र होने के नाते ऋण की लागत और कर दर कम करना। राष्ट्रीय दूरसंचार नीति 2012 के इस लक्ष्य की अनदेखी की गई है। 
  3. वैश्विक आवंटन के अनुरूप पर्याप्त स्पेक्ट्रम आवंटित करना। चूंकि देश में फाइबर का विस्तार सीमित है और डिजिटल प्रौद्योगिकी की आवश्यकता है इसलिए तमाम स्पेक्ट्रम और बुनियादी ढांचे तक साझा पहुंच हो और उपयोग शुल्क राजस्व साझेदारी पर आधारित हो। 
 
प्रशासनिक गतिरोध को समन्वय और उचित प्रक्रिया के आधार पर बिना किसी देरी के समाप्त किया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए 12 महीने के परीक्षण के लिए तत्काल स्पेक्ट्रम आवंटन किया जाना चाहिए। कई देशों ने 5जी स्पेक्ट्रम सेवा शुरू करने का काम आरंभ भी कर दिया है। इनमें कोरिया, स्विट्जरलैंड, फिनलैंड, ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, रूस, इटली और जापान शामिल हैं। इन देशों में करीब 500 5जी केंद्र हैं। 
 
5 जी आकांक्षाएं और हकीकत
 
भारत में इस संदर्भ में हुआवे की भूमिका विवादास्पद है। एक मसला गैरभेदकारी कारोबारी शर्त या प्रतिस्पर्धा में स्पष्टता का है। अगर हुआवे जैसी संस्था सरकार की मदद से वैश्विक दबदबा कायम करती है तो वह उन शर्तों पर संचालन कर सकती है जिनका मुकाबला कोई और नहीं कर पाएगा। ऐसे संस्थान बहुत आसानी से किसी भी मुल्क में दबदबा कायम कर सकते हैं। हुआवे भले ही नोकिया या एरिक्सन से अलग कुछ नहीं कर रही है लेकिन उसे हमारे ऐसे पड़ोसी देश का समर्थन हासिल है जिसका व्यवहार दबदबे वाला है। ऐसे में उस पर निर्भरता ठीक नहीं। 
 
डिजिटल इंडिया और 5जी में सफलता पाने के लिए सरकार संचार क्षेत्र को बुनियादी क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत करके शुरुआत कर सकती है। उसे स्पेक्ट्रम और नेटवर्क साझेदारी का इस्तेमाल करते हुए संसाधनों का भरपूर प्रयोग करना चाहिए तथा स्थानीय तकनीक का भरपूर सहयोग लेना चाहिए। 
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