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सरकार के समक्ष राजस्व के मोर्चे पर क्या हैं चुनौतियां

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  June 13, 2019

वर्ष 2018-19 के दौरान व्यय को अगले वर्ष पर टाल कर कितना व्यय संकुचन हासिल किया गया? या फिर इसका कितना हिस्सा बजट से इतर सरकारी कंपनियों द्वारा लिए गए व्यय का परिणाम था? केंद्र सरकार ने वर्ष 2018-19 के अपने संशोधित व्यय अनुमान में करीब 1.45 लाख करोड़ रुपये की कटौती की। इस राशि में से करीब 13,000 करोड़ रुपये की राशि पूंजीगत व्यय में कम की गई जबकि शेष 1.32 लाख करोड़ रुपये की राशि राजस्व व्यय के अधीन।  जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है, व्यय को सीमित करने का अधिकांश काम बजट से इतर उधारी के माध्यम से किया गया। ऐसे ऋण का बोझ सरकारी क्षेत्र की कई कंपनियों पर पड़ा। भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई), हाउसिंग ऐंड अर्बन डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन, राष्ट्रीय आवास बैंक और रूरल इलेक्ट्रिफिकेशन कॉर्पोरेशन इसका उदाहरण हैं। 

 
हालांकि ऐसी उधारी की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है परंतु महा लेखा नियंत्रक (सीजीए) द्वारा प्रस्तुत आंकड़े सच बयान करते हैं। उदाहरण के लिए सीजीए के वर्ष 2018-19 के आंकड़े बताते हैं कि कैसे खाद्य सब्सिडी बिल संशोधित अनुमान में 40 फीसदी घटकर 1.71 लाख करोड़ रुपये हो गया।  खाद्य सब्सिडी में आई कमी कुल राजस्व व्यय संकुचन के तकरीबन आधे के बराबर है। यानी पूरा बोझ एफसीआई पर डाल दिया गया। इसे इस बात से समझा जा सकता है कि अप्रैल 2019 के आंकड़ों में इस स्थगित व्यय का कोई प्रभाव नजर नहीं आता। 
 
अप्रैल 2019 में सरकार ने खाद्य सब्सिडी के लिए 46,862 करोड़ रुपये की राशि व्यय की जो इससे पिछले वर्ष की समान अवधि की 48,430 करोड़ रुपये से कम थी। दो वर्ष के बजट अनुमान के आधार पर भी सरकार का खाद्य व्यय बिल 2019 में 25 फीसदी के कम स्तर पर था। 2018 में यह 29 फीसदी रहा था। स्पष्ट है कि यहां लंबित व्यय का कोई असर नहीं हुआ। इसके बजाय ये आंकड़े बहुत सीमित संकुचन दर्शाते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो सरकार चालू वित्त वर्ष में स्वयं को खाद्य सब्सिडी के किसी भी तरह के व्यय से पूरी तरह मुक्त है। अब ऋण का बोझ एफसीआई पर है। यह अलग विषय है कि इसका एफसीआई की वित्तीय सेहत पर क्या असर होगा? हालांकि देश के सार्वजनिक वित्त क्षेत्र के लिए यह बहुत बड़ी चिंता का विषय है। इसके विपरीत उर्वरक और पेट्रोलियम उत्पादों को लेकर सरकार का सब्सिडी व्यय अप्रैल 2019 में जमकर बढ़ा। अप्रैल 2018 में जहां पेट्रोलियम पर 2,582 करोड़ रुपये और उर्वरक पर 7,124 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी गई थी, वहीं इस वर्ष अप्रैल में यह बढ़कर क्रमश: 5,281 करोड़ और 16,943 करोड़ रुपये हो गई। यह अपने आप में पहेली है। 2018-19 में पेट्रोलियम और उर्वरक के लिए सीजीए के अंतिम आंकड़े में संशोधित आंकड़ों की तुलना में कोई बड़ी कमी नहीं की गई। इसके बावजूद अप्रैल 2019 का व्यय अहम उछाल दर्शाता है। 
 
बहरहाल, यह स्पष्ट है कि खाद्य, पेट्रोलियम और उर्वरक जैसे प्रमुख सब्सिडी बिल 2019-20 में चिंता का विषय नहीं होंगे। बिना स्थगित व्यय के 2.96 लाख करोड़ रुपये के प्रमुख सब्सिडी बिल में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। बशर्ते कि कच्चे तेल की कीमत 65-70 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में बनी रहे।  अप्रैल 2019 के सीजीए के आंकड़े वित्त मंत्रालय के समक्ष मौजूदा राजस्व चुनौतियों को भी रेखांकित करते हैं। मंत्रालय की टीम फिलहाल 2019-20 का बजट तैयार करने में लगी हुई है। उसने यह ध्यान दिया होगा कि अप्रैल 2019 का कुल कर राजस्व 71,637 करोड़ रुपये अनुमानित था। यह 2018 के समान महीने के 57,533 करोड़ रुपये से 24.5 फीसदी अधिक है। राजस्व वृद्घि का स्तर सामान्य परिस्थितियों में उत्साहवर्धक है लेकिन वास्तविक राजस्व संग्रह में कमी के कारण यह हमें बताता है कि आगे कितनी अहम चुनौतियां व्याप्त हैं। चालू वित्त वर्ष के लिए विशुद्घ कर राजस्व वृद्घि का लक्ष्य 29.5 फीसदी है। क्या अगले वर्ष इसे और बढ़ाया जा सकता है? या फिर बजट निर्माता चुनौतियों की पहचान करेंगे और लक्ष्यों को हकीकत के और अधिक करीब रखने का प्रयास करेंगे?
 
राजस्व मोर्चे पर गैर ऋण पूंजी प्राप्ति इकलौता ऐसा तरीका है जो कुछ राहत दिलाता है। सरकार ने अप्रैल 2019 में 2,350 करोड़ रुपये का राजस्व विनिवेश से हासिल किया। इसमें से 476 करोड़ रुपये की राशि रेल विकास निगम लिमिटेड में 12 फीसदी हिस्सेदारी बेचकर कर आईपीओ से जुटाई गई थी। जबकि 1,874 करोड़ रुपये की राशि शत्रु संपत्ति की बिक्री से आई थी। यह राशि अप्रैल 2018 में दर्ज 435 करोड़ रुपये की राशि से काफी अधिक थी। हालांकि सरकार अप्रैल 2019 में चुनाव की तैयारी में लगी रही होगी लेकिन ऐसा लगता है कि कर राजस्व और विनिवेश के मोर्चे पर प्रदर्शन बेहतर रहा। इससे वर्ष 2018-19 के समान माह की तुलना में बजट अनुमान के प्रतिशत के रूप में राजकोषीय घाटे के स्तर में कमी आई। अब जबकि नई सरकार आगामी 5 जुलाई को अपना पहला बजट प्रस्तुत करने जा रही है तो शायद इन दो क्षेत्रों पर थोड़ा ध्यान देने की आवश्यकता होगी। 
Keyword: nirmala sitaraman, economy, budget,,
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