बिजनेस स्टैंडर्ड - भारत के लिए चीन सबसे बड़ा खतरा
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भारत के लिए चीन सबसे बड़ा खतरा

प्रेमवीर दास /  June 13, 2019

किसी भी देश की सुरक्षा के बहुत से आयाम होते हैं। इनमें से सेना केवल एक आयाम है, लेकिन यह सबसे अहम है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं प्रेमवीर दास 

 
चुनावी शोर-शराबा थम चुका है और नई सरकार आ गई है। ऐसे में चुनाव के अहम मुद्दों- राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रवाद पर विचार-विमर्श किया जाना चाहिए। हालांकि राष्ट्रवाद की अलग-अलग व्याख्या हो सकती है और इसका विश्लेषण करना मुश्किल है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा एक निश्चित शब्दावली है। दो साल पहले सर्जिकल स्ट्राइक हुई। उसके बाद इस साल फरवरी में पुलवामा आतंकी हमला हुआ, जिसके तत्काल बाद बालाकोट पर जवाबी हमला किया गया। इस मुद्दे पर चुनाव प्रचार में तगड़ी बयानबाजी देखने को मिली। पाकिस्तान को दुश्मन देश मानते हुए उसे कड़ा सबक सिखाने की बात कही गई। 
 
रोचक बात यह है कि इन बयानों में चीन का कोई जिक्र नहीं हुआ। भारत और पाकिस्तान के बीच विवादित नियंत्रण रेखा करीब 700 किलोमीटर है, लेकिन चीन के साथ करीब 4,000 किलोमीटर की सीमा को लेकर विवाद है। इतना ही नहीं, चीन अक्साई चीन में हमारी जमीन दबाए बैठा है और अरुणाचल प्रदेश पर भी दावा करता है, इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर थोड़ा अधिक यथार्थवादी नजरिया अपनाना जरूरी है। किसी भी देश की सुरक्षा के बहुत से आयाम होते हैं। इनमें सैन्य दृष्टिकोण केवल एक आयाम है, लेकिन यह सबसे अहम है। इस नजरिये को ध्यान में रखते हुए हम यहां प्रासंगिक समीकरणों की पड़ताल करते हैं। जमीन पर हमने उत्तरी सीमाओं पर सेनाएं तैनात कर रखी हैं। लेकिन यह मुश्किल से ही कभी देखने को मिला हो कि पाकिस्तान के किसी सैन्य मुख्यालय ने भारत के साथ टकराव का समर्थन किया हो। दोनों देशों की वायु सेनाओं के बीच संतुलन को लेकर भी ऐसा कहा जा सकता है। यह सही है कि पाकिस्तान की वायु सेना ने बालाकोट हमले के अगले ही दिन पलटवार किया था और हमारे एक मिग-21 को गिरा दिया था, लेकिन उसके विमान हमारी सीमा के अंदर नहीं आए थे। नौसेना के लिहाज से हमें बढ़त हासिल है। ऐसे में पाकिस्तानी सेना के हमारी क्षेत्रीय अखंडता को नुकसान पहुंचाने की आशंका दूर-दर तक नजर नहीं आती है। 
 
हां, पाकिस्तान की तरफ से भारत में और विशेष रूप से कश्मीर घाटी में आतंकी गतिविधियों को अप्रत्यक्ष मदद आगे भी जारी रहने के आसार हैं। हालांकि इस पर पाकिस्तान के खस्ता आर्थिक हालात, अंतरराष्ट्रीय दबाव और भारत की कड़ी कार्रवाई से अंकुश लगेगा। समुद्री रास्ते से आतंकी वारदात का खतरा बरकरार है। इस रास्ते का इस्तेमाल वर्ष 2008 में मुंबई हमले या 1993 के बम धमाकों में किया गया। 1993 के बम धमाकों में समुद्री रास्ते से विस्फोटक लाए गए थे और इन्हें रत्नागिरि तट पर उतारा गया था। असली चिंता घाटी को लेकर है। सीधे कहें तो आतंकवाद से राजनीतिक या अन्य किसी अन्य तरीके से निपटना होगा, लेकिन हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा को सैन्य चुनौती देने की पाकिस्तान में क्षमता नहीं है। 
 
चीन की स्थिति बहुत अलग है। सीमा पर किसी टकराव में चीन को निर्णायक बढ़त हासिल है। वायु क्षेत्र में दोनों की स्थिति लगभग समान है क्योंकि चीनी विमानों को ऊंचाई से उड़ान भरनी पड़ेगी, जिससे उनकी क्षमता में कुछ कमी आएगी। लेकिन फिर भी यह कहना आशावादी होगा कि हम उसके बराबर हैं। इस समय हमें हिंद महासागर क्षेत्र में निश्चित रूप से स्पष्ट बढ़त हासिल है। लेकिन यह बढ़त तेजी से कम हो रही है क्योंकि विश्व के इस हिस्से में चीन की नौसेना की मौजूदगी बढ़ रही है। चीन की ग्वादर और जिबूती के नौसैन्य अड्डों तक पहुंच है। चीन के क्षेत्रीय दावों से टकराव पैदा होने के आसार हैं। यह डोकलाम में भी देखने को मिला है और बीते वर्षों में अन्य क्षेत्रों में भी देखने को मिला है। भारत की आर्थिक ताकत बढ़ रही है और वह एशियाई और वैश्विक भूराजनीति में बड़ा कद हासिल करने के लिए प्रयास कर रहा है। ऐसे में यह तय है कि उसे चीन के प्रत्यक्ष और परोक्ष टकराव का सामना करना पड़ेगा, जिसमें चीन के पाकिस्तान के साथ गहरे संबंध महज एक पहलू हैं। 
 
व्यापार आगे भी एकतरफा बना रहेगा और दक्षिण चीन सागर में हमारे ऊपर दबाव बढ़ सकता है। दक्षिणी चीन सागर के जरिये हमारा आधे से अधिक व्यापार होता है। इस वजह से भारत के लिए चीन पाकिस्तान से भी बड़ा दुश्मन है। चीन हमारे हितों को नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखता है। हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंताओं में इसे प्रमुखता दी जानी चाहिए। यह तर्क दिया जा सकता है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारत-चीन संबंधों में कुछ सुधार आया है। डोकलाम पर कुछ समय तनाव रहा, लेकिन अब यह मुद्दा खत्म हो गया है। दोनों देशों के प्रमुखों की वुहान में मुलाकात उम्मीद से अधिक सौहार्दपूर्ण रही। हाल में चीन ने जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करने का भी समर्थन किया है, जिसे सकारात्मक माना जा सकता है। चीन को व्यापार के मोर्चे पर अमेरिका के भारी दबाव का सामना करना पड़ रहा है, जिससे वह हमारे साथ संबंधों को बेहतर बनाने की दिशा में कदम बढ़ा सकता है। 
 
इसके बावजूद चीन ताकत में अमेरिका से मुकाबला करने में हमेशा भारत को दूसरी तरफ पाता है, लेकिन वह इसमें कुछ नहीं कर पाता है। इसलिए दोनों देशों के बीच मतभेद बने रहेंगे, जो समय की भूराजनीतिक जरूरतों के आधार पर 'संभाले या बढ़ाए' जा सकते हैं। हमें उनके लिए तैयार रहना चाहिए। यह तय है कि चीन और पाकिस्तान के बीच घनिष्ठ मित्रता आगे भी बनी रहेगी। कुल मिलाकर हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंताएं पाकिस्तान की तुलना में चीन पर ज्यादा केंद्रित होनी चाहिए। पाकिस्तान से मिलने वाली संभावित चुनौतियां चीन की तुलना में बहुत कम हैं, इसलिए हमारी सैन्य तैयारी इसी के मुताबिक की जानी चाहिए। नौसेना हमारी ताकत है और इसे और मजबूत किया जाना चाहिए। वहीं अन्य क्षेत्रों में कमजोरियों को दूर किया जाना चाहिए। सीमाओं पर अपर्याप्त सड़क संपर्क का अभाव दूर किया जाना चाहिए, जो थल सेना की जल्द तैनाती में बाधा बनता है। इन मुद्दों और सेना के ढांचे को समग्र रूप में देखा जाना चाहिए। 
 
अच्छी बात यह है कि हमें नए विदेश मंत्री के रूप में ऐसे व्यक्ति मिले हैं, जो विदेशी मामलों की पेचीदगियों को बहुत बेहतर समझते हैं। राष्ट्रीय सुुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का पद पर बने रहना अच्छा है, लेकिन उन्हें नए कदमों से बचना चाहिए। चुनाव हो चुके हैं, इसलिए नई सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा पर फिर से विचार करना चाहिए।
 
(लेखक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के सदस्य रहे हैं।) 
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