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कठिन है डगर

संपादकीय /  June 13, 2019

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) परिषद की आगामी बैठक नई अध्यक्ष निर्मला सीतारमण की अध्यक्षता में आगामी गुरुवार को होगी। यह परिषद की कुल मिलाकर 35वीं और नई सरकार आने के बाद पहली बैठक होगी। यह बैठक अहम है क्योंकि इसका आयोजन जीएसटी लागू होने के दो वर्ष पूरे होने के महज 10 दिन पहले हो रहा है। इस अवधि में नई अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था अपेक्षाकृत स्थिर कर व्यवस्था में तब्दील हो गई है। हालांकि इसके डिजाइन में कई खामियां हैं और प्रक्रियात्मक दिक्कतें समस्या बनी हुई हैं। कुल मिलाकर राजस्व संग्रह अभी भी अनुमान से कम है। जीएसटी परिषद और उसकी नई अध्यक्ष के समक्ष क्या प्रमुख चुनौतियां हैं? 

 
पहली और सबसे अहम बात यह है कि पिछली बैठकों की तरह जीएसटी परिषद की तरह सलाह मशविरे की प्रक्रिया जारी रहनी चाहिए। चूंकि परिषद की पहली बैठक सितंबर 2016 में हुई थी इसलिए पिछले 33 महीनों में इस संस्थान के तमाम निर्णय आपसी सहमति से लिए गए। इस दौरान मतदान का सहारा नहीं लेना पड़ा जबकि कानूनन उसकी व्यवस्था की गई है। आम सहमति के तरीके ने परिषद के संघीय चरित्र को मजबूत किया है और कई छोटे तथा विपक्ष द्वारा शासित राज्यों की उन आशंकाओं को दूर किया है जिनको लग रहा था कि जीएसटी परिषद उनकी चिंताओं की अनदेखी करेगी। सहमति का रास्ता भी बाधाओं से रहित नहीं था। सलाह मशविरे के बल पर उनसे निजात पाना अक्सर समय खपाऊ साबित हुआ है। परंतु इसने संघीय संस्था की मजबूत बुनियाद भी तैयार की है जो वस्तु एवं सेवा कर लगाने के लिए जवाबदेह है। ऐसे में यह महत्त्वपूर्ण है कि नई अध्यक्ष के अधीन जीएसटी परिषद उस भरोसे को कायम रखे।
 
इसके अलावा यह बात भी महत्त्वपूर्ण है कि परिषद आने वाली अहम चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करे। जैसा कि इसी समाचार पत्र में कहा गया था परिषद की अगली बैठक में इलेक्ट्रॉनिक इनवॉइसिंग सिस्टम का प्रस्ताव पेश करने पर विचार होगा। यह मौजूदा व्यवस्था से बेहतर होगा और इससे राजस्व की लीकेज दूर करने में भी मदद मिलेगी। नई व्यवस्था बिना किसी दिक्कत के लागू हो जाए इसके लिए सावधानी बरतनी होगी। निर्यात की जीरो रेटिंग के लिए सहज व्यवस्था लागू करना भी उतना ही अहम है। फिलहाल निर्यातकों द्वारा चुकता कर को रिफंड करने की प्रक्रिया जटिल और देरी से भरपूर है। इससे भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता में कमी आती है। 
 
विभिन्न जिंसों और सेवाओं की दरों को तार्किक बनाने का लक्ष्य भी परिषद के लिए कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। मौजूदा विविध दरों के स्थान पर तीन व्यापक दायरे तय करने होंगे। फिलहाल कुल मिलाकर पांच दर हैं। इसके अलावा कुछ वस्तुओं और सेवाओं का इनपुट टैक्स क्रेडिट अलग करने से कुछ विसंगतियां उत्पन्न होती हैं जिनको दूर करना होगा। पेट्रोल, डीजल और विमान ईंधन को जीएसटी व्यवस्था के अधीन लाने का दूरगामी लक्ष्य भी लेकर चलना होगा। केंद्र और राज्य सरकारें जिस हद तक तेल क्षेत्र के राजस्व पर निर्भर हैं उसे देखते हुए यह आवश्यक है कि इन पेट्रोलियम उत्पादों पर जीएसटी दर से ऊपर कुछ विशेष शुल्क लगाया जाए। अगर सरकार ऐसा करती है तो उसके पास राजस्व की आवक बनी रहेगी और साथ ही साथ उद्योग जगत को भी ऐसे पेट्रोलियम उत्पाद पर चुकता कर का कुछ लाभ मिल सकेगा। जीएसटी परिषद की बात करें तो आगे की राह आसान नहीं है लेकिन और अधिक सुधार लागू करने और दरों को तार्किक बनाने के काम में किसी तरह की देरी कतई नहीं होनी चाहिए।
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