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मंदी के भंवर से निकलने के लिए जरूरी भूमि और श्रम सुधार

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  June 12, 2019

नरेंद्र मोदी सरकार के 100 दिन के एजेंडे को लेकर आशावादी अनुमानों के बावजूद ऐसा लगता नहीं कि सुधार को लेकर कोई नया और व्यापक एजेंडा प्रस्तुत किया जाएगा। इसकी तीन वजह हैं। पहली, इस प्रक्रिया में शामिल लोग इन अनुमानों को पूरा करने के लिए प्रेरित नहीं करते। उदाहरण के लिए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण सक्षम होने के बावजूद वाणिज्य मंत्रालय में अपने पिछले कार्यकाल में कोई सुधारवादी कदम नहीं उठा सकी थीं। दूसरा, सुधारवादी एजेंडे को लेकर उलटबयानी होती रही है। पूरे चुनाव प्रचार अभियान के दौरान कहा जाता रहा कि सरकार ने दूरगामी सुधार लागू किए हैं और अर्थव्यवस्था में उनका लाभ भी नजर आ रहा है। अब अगर देश को बताया जाए कि देश को बड़े आर्थिक सुधार की जरूरत है तो यह अपने आप में विरोधाभासी होगा। अंत में, ऐसा लगता नहीं कि निर्णय लेने वाले लोगों को सुधार की जरूरत महसूस होती है। क्योंकि सरकार को पिछले कार्यकाल की तुलना में बड़ा बहुमत हासिल हुआ है।

 
कई देशों में चुनाव नीतिगत कार्यक्रमों को आधार बनाकर ही लड़े जाते हैं। कुछ दल अथवा प्रत्याशी स्वास्थ्य सुविधाओं या कर वंचना से संबंधित नीतियों पर चुनाव लड़ते हैं तो उनके प्रतिद्वंद्वी इन नीतियों को लेकर अलग विचार प्रस्तुत करते हैं। दोनों अपनी प्राथमिकताएं जाहिर करते हैं। खेद की बात है कि भारत में हाल में जो चुनाव हुए हैं, वे इन मसलों पर बहस से परे थे। यही कारण है कि 2014 में हमें कोई अंदाजा नहीं था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क्या करेंगे, न ही हमें अब पता है कि वह क्या करने वाले हैं। यह देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया की कमजोरी है। हमारे यहां किसी राजनेता को सत्ता सौंपने के पहले नीतिगत एजेंडे की समुचित जांच परख भी नहीं की जाती है और अक्सर सत्ता में आने के बाद ऐसा एजेंडा तैयार किया जाता है। इस प्रक्रिया में कीमती समय नष्ट होता है।
 
ध्यान देने वाली बात यह है कि केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने अंतत: यह स्वीकार कर लिया है कि अर्थव्यवस्था में वृद्घि में धीमापन आ रहा है। सकल घरेलू उत्पाद के ताजा आंकड़ों के मुताबिक लगातार तीसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था में धीमापन दर्ज किया गया है। मोदी सरकार की अंतिम मंदी राजनीतिक रूप से संवेदनशील वक्त में आई थी जब सरकार मामला संभालने का प्रयास कर रही थी। इसलिए ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया। इस बार इसे हल करने की बेहतर संभावना है। भले ही सुधार की कोई वास्तविक इच्छा या प्रोत्साहन नहीं हो लेकिन मंदी की आशंका के चलते सरकार कुछ ऐसे कदम उठा सकती है जो दीर्घावधि में अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद हों। 
 
वित्त मंत्रालय मंदी के लिए जीडीपी के तीन घटकों को उत्तरदायी ठहराती है: निजी खपत, तयशुदा निवेश और निर्यात। यह बात उस आम धारणा को प्रतिबिंबित करती है कि निर्यात और निजी निवेश पिछले कुछ वर्ष से भले ही संकट में हैं लेकिन खपत और सरकारी निवेश के चलते अर्थव्यवस्था की स्थिति बेहतर बनी रही। यह अस्थायित्व भरा मॉडल है। इससे सरकार के पास नकदी की कमी होगी और राजकोषीय अंतराल उत्पन्न होगा। अगर अन्य बुनियादी कारक मजबूत नहीं हुए तो खपत में तेजी नहीं आ सकती। इस चरण में अगर अन्य दो घटकों के बजाय खपत को बढ़ाने पर जोर दिया गया तो यह सही नहीं होगा। निवेश को नुकसान लंबी अवधि के ढांचागत कारणों से हुआ है जिसे हल किए जाने की जरूरत है। 
 
निजी निवेश की बात करें तो कई सरकारें इसी बात पर यकीन करती आई हैं कि समस्या वित्तीय क्षेत्र में है। खासतौर पर बैंकों में। तमाम अन्य पिछली सरकारों की तरह यह सरकार भी मानती है कि कम ब्याज दरें ही रामबाण हैं। उसका मानना है कि अगर केवल ब्याज दरें कम कर दी जाएं तो तमाम दिक्कतें समाप्त हो जाएंगी। वे दिक्कतें भी जो कारोबारी जगत को लेकर सरकार के कदमों से उत्पन्न हुई हैं। बहुत खेद की बात है कि बैंक ब्याज दरें कम करने के मामले में पर्याप्त ध्यान नहीं दे रहे हैं। जबकि भारतीय रिजर्व बैंक दरों में निरंतर कटौती कर रहा है। दिक्कत यह है कि बैंकिंग तंत्र की सफाई करने के क्रम में बैंक ऐसे तरीके नहीं अपनाते कि कम ब्याज दर का सीधा लाभ ग्राहकों को पहुंचे। दूसरी ओर, कम दरें और स्वस्थ बैंक लंबी अवधि के निवेश के लिए बेहतर साबित होंगे। बैकों की बैलेंसशीट बेहतर करने के लिए फंसे हुए कर्ज पर सख्ती बरकरार रखनी होगी। इस पर किसी का ध्यान नहीं है। आरबीआई ने फंसे हुए कर्ज की रिपोर्टिंग के मानक शिथिल कर दिए हैं। इस सिलसिले में लंबी और अल्पावधि के उपाय अत्यावश्यक हैं। 
 
ढांचागत समस्याओं को गलत समझने से निर्यात पर भी बुरा असर पड़ सकता है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल की यह घोषणा एकदम उचित है कि निर्यात की असल समस्या उसका गैर प्रतिस्पर्धी होना है। सवाल यह है कि क्यों? गोयल कहते हैं कि ब्याज की लागत निर्यातकों के लिए समस्या बनी हुई थी? इसमें दो राय नहीं कि पूंजी की लागत कई के लिए बहुत अधिक है। खासतौर पर उस समय जबकि इसकी तुलना चीन जैसे गैर बाजार वित्तीय ढांचों से की जाए। अन्य बुनियादी बातों की भी कीमत चुकानी पड़ती है: मिसाल के तौर पर भूमि और कौशल वाले श्रमिक। सरकार ने बिजली की आपूर्ति सुधारने में काफी मेहनत की है और बुनियादी ढांचे में भी काफी सुधार हुआ है। परंतु यह निवेश में नई जान फूंकने में कामयाब नहीं रहा। 
 
राजग सरकार के कार्यकाल में ज्यादातर वक्त निर्यात स्थिर बना रहा। निर्यात में सुधार होने से निवेश को भी प्रोत्साहन मिलेगा और देश मौजूदा मंदी के भंवर से बाहर भी निकल सकता है। परंतु उसके लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ाने वाले सुधार करने होंगे ताकि तमाम कारोबारी क्षेत्रों को लाभ मिल सके। निर्यातकों के लिए सब्सिडी, ब्याज या कर दरों में मामूली रद्दोबदल से काम नहीं चल पाएगा। भारत ने भूमि और श्रम सुधार के लिए लंबा इंतजार किया है। अब वह आगे और प्रतीक्षा नहीं कर सकता। 
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