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जल सुधारों की शुरुआत होनी चाहिए कृषि से

मिहिर शाह /  June 12, 2019

ज्यादा टिकाऊ, विविधीकृत और कम पानी की खपत वाली कृषि प्रणाली विकसित करने से बहुत से फायदे होंगे। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं मिहिर शाह

 
देश का जल संकट बहुत विकराल हो गया है। जब पंजाब में हमारे कुछ बच्चे यूरेनियम मिला हुआ पानी पीने को मजबूर हैं और बिहार में भूमिगत जल में आर्सेनिक की मात्रा बढ़ रही है तो हमें इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। शहरीकरण की दर बढ़ रही है, जिससे शहरी जलापूर्ति और अपशिष्ट शोधन की बदहाल स्थिति भी बहुत चिंताजनक है। बार-बार सूखे और बाढ़ से हर साल करोड़ों लोग प्रभावित हो रहे हैं। इससे हमारे जल संसाधनों के प्र्रबंधन के तरीके को लेकर निश्चित रूप से सवाल उठाए जाने चाहिए। 
 
ऐसे में पानी को लेकर हर जगह विवादों पर अचंभा नहीं होना चाहिए। ये विवाद न केवल राज्यों के बीच बल्कि शहरों और देशों, कृषि एवं उद्योगों और एक ही गांव या शहरी कॉलोनी के बीच भी हो रहे हैं। मैंने वर्ष 2017 में प्रधानमंत्री कार्यालय को अपनी प्रस्तुति में पानी के मौजूदा हालात को 1991 आर्थिक संकट के समान बताया था। मैंने इस प्रस्तुति में उस समिति की सिफारिशों के मुख्य बिंदु पेश किए थे, जिसका मुझे अध्यक्ष बनाया गया था। यह समिति केंद्रीय जल आयोग और केंद्रीय भूजल बोर्ड के पुनर्गठन पर बनाई गई थी। 
 
ये ऐसे सुधार हैं, जिन्हें दशकों पहले लागू किया जाना चाहिए था। निस्संदेह जल सुधारों में 1991 का खाका नहीं अपनाया जा सकता है क्योंकि उनमें जल के विविध पहलुओं को आवश्यक रूप से और सावधानीपूर्वक शामिल करना होगा। लेकिन इनमें बड़े बदलावों की तत्काल जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता है। मैंने पहली बार यह प्रस्ताव वर्ष 2012 में 12वीं योजना के दस्तावेज में पानी के अध्याय में प्रस्तुत किया था। तब से अब तक सात साल बीत चुके हैं, लेकिन देश में इस दिशा में हालात विकट ही हुए हैं। 
 
भारत पानी की कमी वाला देश मुख्य रूप से इसलिए है क्योंकि हमने अपने भरपूर पानी के प्रबंधन का कोई नया तरीका नहीं अपनाया। देश में इस चीज को कभी नहीं पहचाना गया कि जल भारत का सबसे महत्त्वपूर्ण लेकिन बिना सुधारों वाला बुनियादी ढांचा क्षेत्र है। हम दूरगामी सुधारों के बिना अर्थव्यवस्था की वृद्धि को बनाए रखने की उम्मीद नहीं कर सकते। सुधारों की शुरुआत कृषि से होनी चाहिए। खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के ताजा एक्वास्टेट के आंकड़ों के मुताबिक भारत में 90 फीसदी जल का इस्तेमाल कृषि में होता है। हम इसमें बड़ी कमी लाए बिना कभी भी ग्रामीण एवं शहरी घरेलू जरूरतों और उद्योगों के लिए पर्याप्त पानी नहीं मुहैया करा पाएंगे। इससे भी अहम बात यह है कि हम जल सुधार के बिना कृषि संकट को भी हल नहीं कर सकते।  पिछले तीन दशकों में तीन लाख किसानों ने आत्महत्या की है। ऐसा भारतीय इतिहास में पहले कभी नहीं देखने को मिला।
 
देश में जल की अधिकतर खपत गेहूं, चावल और गन्ने जैसी कुछ पानी की अधिक जरूरत वाली फसलों में होती है। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे सूखे की आशंका वाले राज्यों में भी यही स्थिति है। महाराष्ट्र में कुल फसली रकबे में गन्ने का हिस्सा महज 4 फीसदी है, लेकिन इस फसल में 65 फीसदी सिंचाई जल की खपत होती है। कर्नाटक में कुल फसली रकबे में चावल एवं गन्ने का हिस्सा 20 फीसदी है, लेकिन इन दो फसलों में 70 फीसदी सिंचाई जल खप जाता है। क्षेत्र के हिसाब से इन फसलों के रकबे में मामूली कमी से भारत की जल की समस्या का समाधान हो सकता है। हालांकि रकबे में इस कटौती से खाद्य सुरक्षा पर कोई जोखिम नहीं पैदा होना चाहिए। 
 
पानी की किल्लत वाले क्षेत्रों में भी किसान पानी की अधिक जरूरत वाली फसलें उगा रहे हैं। इसकी मुख्य वजह यह है कि इनका सरकारी खरीद या निजी खरीद के रूप में एक भरोसेमंद बाजार है। 20वीं सदी के आखिरी दशकों की हरित क्रांति का एक मुख्य पहलू गेहूं और चावल की सरकारी खरीद करना था। इससे हमें खाद्य में आत्मनिर्भर बनने के नजदीक पहुंचने में मदद मिली है। लेकिन शताब्दी बदलने के साथ ही हरित क्रांति नाकाम होने लगी है। अत्यधिक पानी और रसायनों की जरूरत वाली खेती में लागत और जोखिम अधिक हैं। यह भारत के ज्यादातर किसानों के लिए अलाभकारी बनने लगी है। किसानों की शुद्ध आमदनी ऋणात्मक होने लगी है क्योंकि लाभ घट रहा है और लागत बढ़ रही है। स्टॉक बाजार का निवेशक यह जानता है कि बाजार के उतार-चढ़ाव से पार पाने के लिए शेयरों के पोर्टफोलियो को विविधीकृत बनाना जरूरी है। किसानों को मौसम की अनिश्चितता के रूप में एक अतिरिक्त जोखिम का भी सामना करना पड़ता है। ऐसे जोखिम वाले उद्यम में एक ही प्रकार की फसल उगाना आत्महत्या के समान है। लेकिन सरकारी नीति में किसानों को फसल विविधीकरण के लिए सीधे प्रोत्साहन नहीं दिया गया। हम फसल विविधीकरण को प्रोत्साहन देने में नाकाम रहे हैं। 
 
इसके लिए जरूरी है कि सरकारी खरीद में परंपरागत मोटे अनाज और दलहन जैसी क्षेत्र विशेष और कम पानी की खपत वाली फसलों को शामिल किया जाए। इन फसलों में बाजरा, ज्वार, नवाने और छत्तीसगढ़ की कोडोन-कुटकी जैसी फसलें शामिल हैं, जिन्हें अब सरकार भी 'पोषक खाद्य' कह रही है। गौरतलब है कि कोडोन-कुटकी मधुमेह का कारगर इलाज है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के मुताबिक कांगणी (फाक्सटेल मिलिट) में चावल से 81 फीसदी अधिक प्रोटीन होता है। मोटे अनाज जलवायु के अनुसार ढलने वाली फसलें हैं, इसलिए ये भारत में सूखे क्षेत्रों के लिए उपयुक्त हैं। अगर हम इन्हें समन्वित बाल विकास सेवाएं और मध्याह्न भोजन कार्यक्रम में भोजन के रूप में शुरू करें तो हम इन फसलों की बड़ी और अनवरत मांग सृजित कर सकते हैं। इसके अलावा भी कई फायदे मिलेंगे जैसे ज्यादा जल सुरक्षा, मिट्टी की बेहतर सेहत, किसानों को ज्यादा और स्थिर शुद्ध आमदनी और उपभोक्ता की बेहतर सेहत आदि। गौरतलब है कि मध्याह्न भोजन कार्यक्रम बच्चों के लिए विश्व का अब तक का सबसे बड़ा पोषण कार्यक्रम है। 
 
कृषि संकट से स्वास्थ्य को लेकर भी समस्या पैदा हो रही है। प्रत्येक भारतीय राज्य में 1990 से 2016 के बीच मधुमेह की बीमारी बढ़ी है। इससे गरीब भी नहीं बच पाए हैं। वर्ष 1990 में इस बीमारी से पीडि़त लोगों की तादाद 2.6 करोड़ थी, जो 2016 में बढ़कर 6.5 करोड़ पर पहुंच गई है। यह आंकड़ा वर्ष 2030 तक दोगुना होने का अनुमान है। इसकी मुख्य वजह यह है कि हमारे खाने से साबुत खाद्य पदार्थ बाहर हो गए हैं और इनकी जगह अधिक ऊर्जा लेकिन कम पोषक और अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों ने ले ली है। इसके साथ ही खाद्य एवं पानी के जरिये उर्वरक एव कीटनाशक हमारे शरीर में पहुंच रहे हैं। हाल के अनुंसधान दिखाते हैं कि वे इससे ल्यूकीमिया एवं लिंफोमा, ब्रेन ट्यूमर, विल्म्स ट्यूमर, इविंग सरकोमा और जर्म सेल ट्यूमर जैसे कैंसर हो रहे हैं। भारत में कैंसर दूसरी सबसे आम बीमारी है, जिससे हर साल करीब 30 लाख मौत होती हैं। 
 
ऐसे में ज्यादा विविधीकृत फसल प्रणाली अपनाने की दिशा में प्रयासों के साथ ही कृषि रसायन के विकल्पों के लिए गहन अनुसंधान होना चाहिए। अनुसंधान में विशेष रूप से पानी की अधिक खपत वाली फसलों के लिए जल बचत तकनीकों पर जोर दिया जाना चाहिए। ऐसा आंध्र प्रदेश में पहले ही हो रहा है। इस राज्य ने अपने कुल कृषि रकबे 80 लाख हेक्टेयर को 2027 तक प्राकृतिक कृषि में तब्दील करने की योजना बनाई है। इस कदम की नीति आयोग ने भी प्रशंसा की है। भारत को अपने जल क्षेत्र में पहला और सबसे अहम सुधार यह करना चाहिए कि एक अधिक टिकाऊ, विविधीकृत और कम पानी की खपत वाली कृषि प्रणाली विकसित करनी चाहिए। यह सबसे जल्द लागू किया जा सकने वाला भी बदलाव है, जिसके बहुत से फायदे मिलेंगे। 
 
(लेखक शिव नाडर यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर और योजना आयोग के पूर्व सदस्य हैं।) 
Keyword: agri, farmer, crop, water, irrigation,,
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