बिजनेस स्टैंडर्ड - सहमति नहीं, जालान समिति की रिपोर्ट टली
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सहमति नहीं, जालान समिति की रिपोर्ट टली

सोमेश झा / नई दिल्ली 06 12, 2019

एक बार और होगी समिति की बैठक

आरबीआई के अधिशेष हस्तांतरित करने पर समिति के सदस्यों के बीच नहीं बन पाई सहमति
सरकार के प्रतिनिधि एकबारगी अधिशेष हस्तांतरण के पक्ष में
अन्य सदस्य चरणबद्ध तरीके से ऐसा करने पर दे रहे हैं जोर

बिजनेस स्टैंडर्ड सहमति नहीं, जालान समिति की रिपोर्ट टलीकेंद्रीय बैंक के आर्थिक पूंजी प्रारूप की समीक्षा के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा नियुक्त समिति की आज बैठक हुई जिसमें आम सहमति नहीं बन पाई। एक शीर्ष अधिकारी ने कहा कि इससे रिपोर्ट के आने में देरी हो सकती है। आरबीआई के पूर्व गवर्नर बिमल जालान की अध्यक्षता वाली छह सदस्यीय समिति ने एक बार फिर बैठक करने का निर्णय किया है ताकि इस माह के अंत तक रिपोर्ट सौंपी जा सके। घटनाक्रम के जानकार एक अधिकारी ने नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर कहा, 'समिति के सदस्यों की राय अलग हो सकती है लेकिन उस पर चर्चा की जा रही है।'

इस समिति का गठन दिसंबर 2018 में किया गया था और इसे 8 अप्रैल, 2019 तक अपनी रिपोर्ट सौंपनी थी। हालांकि समिति को तीन महीने का विस्तार दिया गया था। समिति को मुख्य रूप से यह तय करने को कहा गया था कि आरबीआई को कितना अधिशेष रखना चाहिए।  सूत्रों के मुताबिक समिति में शामिल सरकार के प्रतिनिधियों - आर्थिक मामलों के सचिव एससी गर्ग और अन्य सदस्यों के बीच आरबीआई की अधिशेष आरक्षित पूंजी को हस्तांतरित करने को लेकर एकमत नहीं है।

सूत्रों ने कहा कि समिति के अधिकांश सदस्य आरबीआई की आरक्षित पूंजी को चरणबद्घ तरीके से सरकार को हस्तांतरित करने के पक्ष में थे लेकिन सरकार की ओर से समिति में शामिल सदस्य गर्ग एकबारगी हस्तांतरण के पक्ष में हैं। तत्कालीन वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने दिसंबर 2018 में कहा था कि सरकार का मानना है कि आरबीआई के पास आरक्षित पूंजी दुनिया में किसी भी केंद्रीय बैंक की तुलना में सबसे अधिक है और इसका बेहतर इस्तेमाल नहीं हो रहा है।

गोयल का यह भी कहना था कि आरबीआई की अतिरिक्त पूंजी का इस्तेमाल बैंकों की मदद करने में किया जा सकता है, जैसा कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के दौरान वित्तीय संकट के समय किया गया था। आमतौर पर आरबीआई जुलाई-जून कैलेंडर का पालन करता है और अगस्त में अपने खाते को बंद करने के बाद सरकार को लाभांश हस्तांतरित करता है। लाभांश हस्तांतरित करते समय केंद्रीय बैंक आर्थिक पूंजी प्रारूप के मुताबिक विभिन्न जोखिमों और आरक्षित भंडार के तौर पर हर साल अधिशेष का एक हिस्सा अपने पास रख लेता है।

आरबीआई का मानना है कि संभावित संकट और बाह्य जोखिमों से निपटने के लिए उसके पास मजबूत बैंलेस शीट होनी चहिए। हालांकि आरबीआई से सरकार को अधिशेष हस्तांतरित करने इसलिए भी महत्त्वपूर्ण समझा जा रहा है क्योंकि कर संग्रह में कमी आई है और सरकार राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के 3.4 फीसदी पर सीमित रखना चाहती है।
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