बिजनेस स्टैंडर्ड - आईबीसी में सुधार और प्रतिस्पर्धा कानून की समीक्षा जरूरी
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आईबीसी में सुधार और प्रतिस्पर्धा कानून की समीक्षा जरूरी

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  June 11, 2019

नई मंत्री ने वित्त मंत्रालय का प्रभार संभाल लिया है और वह केंद्रीय बजट बनाने में व्यस्त हैं। उनके पास वित्त और कंपनी मामलों के मंत्रालयों का प्रभार है, इसलिए उन्हें बजट के बाद इन मंत्रालयों से जुड़े बहुत से अहम काम करने होंगे। इन मंत्रालयों में बदलावों का प्रबंधन करना उतना ही बड़ा काम है, जितना कांग्रेस पार्टी के लिए उसके अध्यक्ष के हार स्वीकार करते हुुए इस्तीफा देने के बाद के बदलावों को संभालना। निस्संदेह केंद्रीय बजट भाषण में भी इन कार्यों में से कुछ का जिक्र किया जा सकता है। आम तौर पर बजट भाषण सत्तारूढ़ सरकार का न केवल कर नीति बल्कि आर्थिक नीति का दस्तावेज होता है। केंद्रीय बजट में बड़े सुधारों को कम शब्दों में लिखा जाता रहा है।

 
कई बार इन भाषणों की घोषणाओं में कुछ ठोस नहीं होता है। उदाहरण के लिए कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार बनाने पर ध्यान देना। लेकिन कई बार ये घोषणाएं बड़े सुधारों का रास्ता साफ करती हैं, भले ही उनका बजट में थोड़े शब्दों में जिक्र किया जाए। ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी), 2016 पिछली सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि है। इसका केंद्रीय बजट भाषण के एक छोटे से पैराग्राफ में जिक्र किया गया था। इस पैराग्राफ में कहा गया था कि लघु उद्योगों की मदद के लिए एक ऋण शोधन प्रणाली की जरूरत है। अगर बजट भाषण को अलग रख दें तो दो ऐसे क्षेत्र हैं, जिन पर गंभीरता से ध्यान दिए जाने की जरूरत है।  
 
पहला, बड़ी बदलावकारी बताई जा रही आईबीसी में गंभीरता से सुधार किए जाने की जरूरत है। उच्चतम न्यायालय ने इसकी अपरिपक्वता और असमानता को स्वीकार करने योग्य माना है और इसकी संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा है। हालांकि इन तथ्यों में छिपी बात यह है कि दोनों मंत्रालयों के बीच फंसे इस कानून और इसके प्रशासन में सुधार की सख्त जरूरत है। वित्तीय क्षेत्र में बढ़ते फंसे ऋण वित्त मंत्रालय की सिरदर्दी है। वहीं आईबीसी का प्रशासन कंपनी मामलों के मंत्रालय के जिम्मे है। 
 
इस कानून में संशोधन से भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को यह ताकत मिल जाएगी कि वह बैंकों को यह निर्देश दे सकेगा कि आईबीसी का कैसे इस्तेमाल किया जाए और आईबीसी के तहत सभी कर्जदारों के साथ एकसमान व्यवहार करने में दिक्कत है। एक नियामक ने रेफरी की भूमिका छोड़ खुद खेल में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। विनियमित बैंकों को कर्जदारों के खिलाफ कार्रवाई के जो विकल्प चुनने थे, अब उनका निर्देश नियामक की तरफ से दिया जा सकता है। यह अपने आप में एक गलत नीति का चयन है। 
 
इस शक्ति का इस्तेमाल कर आरबीआई ने कर्जदारों की संपत्ति पर बैंकों के दावे के प्रवर्तन में एकसमान नीति अपनाई। इसने उन उद्योगों को प्रभावित करने वाले कारणों में विभेद नहीं किया, जिनसे विभिन्न ऋणी जुड़े थे। प्रत्येक उद्योग की परिस्थितियों पर गौर किए बिना एकसमान नीति अपनाने के आरबीआई के कदम को मनमाना और संवैधानिक रूप से अमान्य करार दिया गया। अगर बैंक खुद व्यावसायिक आधार पर ऐसा कदम उठाते तो यह पूरी तरह वैध होता। इसे सरकार के फैसले- तर्कंसगत या गैर-मनमानेपन के मापदंड पर नहीं कसा जाता। माना जाता है कि बैंक सभी कर्जदारों के खिलाफ आंख मूंदकर एक जैसी कार्रवाई करने के पक्ष में नहीं थे। मगर उनका फैसला आरबीआई ने लिया, लेकिन  अदालत की दहलीज नहीं पार कर पाया। यह अपरिपक्व असमानता का अच्छा उदाहरण है। लेकिन यह उस स्थिति में नहीं होता, जब बैंक की तरफ से ऋणी के खिलाफ कदम उठाया गया होता। प्रवर्तन फैसलों को नीतिगत विकल्प पर प्रमुखता देना विवेकसम्मत नहीं था और इसे दुरुस्त किया जाना चाहिए। 
 
दूसरा, प्रतिस्पर्धा कानून की बहुत से कार्यसमूह और सुधार समितियां समीक्षा कर रही हैं। इस दिशा में गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं और इसे सफल बनाया जाना चाहिए। प्रतिस्पर्धा कानून शुरू करना भी अपने आप में बिना अधिक शोरगुल के किया गया सुधार था। इसे ऐसे समय लागू किया गया, जब उद्यमों के कारोबार करने के तरीके को नियंत्रित करने का विरोध हो रहा था। इसमें बदलावों के लिए बहुत सी सिफारिशें आएंगी। लेकिन किन्हें चुनें और किन्हें छोड़ें, यह अपने आप में एक अजीब समस्या पैदा कर देगा। यहां कुछ अहम नीतिगत विकल्प चुनने होंगे। 
 
प्रतिस्पर्धी कानून में सहायक नियमों में निहित बहुत सी प्रक्रियाओं की गंभीरता से समीक्षा और सुधार की जरूरत होगी। यह याद रखा जाना चाहिए कि अगर एक कारोबार कड़े प्रतिस्पर्धी कानूनों से प्रभावित होता है तो बहुत से कारोबार ऐसे भी हैं, जो कड़े प्रतिस्पर्धी कानून न होने से प्रभावित होते हैं। प्रत्येक कारोबारी प्रतिस्पर्धी को कानून का संरक्षण मिलता है और जब कोई गैर-प्रतिस्पर्धी व्यवहार में लिप्त होता है तो इससे न केवल बाजार में ग्राहक बल्कि प्रतिस्पर्धी भी प्रभावित होते हैं।  नियामकों के बीच कड़ी जंग से भी प्रतिस्पर्धी कानून कमजोर हो रहा है। जो किसी एक क्षेत्र में विनियमित होते हैं, वे उस क्षेत्र के नियामक के साथ स्वाभाविक रूप से सहज हो जाते हैं। जब प्रतिस्पर्धा नियामक सवाल पूछता है तो क्षेत्रीय नियामक प्रतिस्पर्धा नियामक के खिलाफ काम करते हैं। नियामकों की भूमिका में कोई तालमेल न होने से अदालत में उम्मीद के विपरीत नतीजे आ सकते हैं। इसके नतीजतन किसी नियमित कारोबारी क्षेत्र में कोई व्यक्ति प्रतिस्पर्धी नियामक के खिलाफ कुछ राहत मिलने की उम्मीद कर सकता है। 
 
(लेखक वकील और स्वतंत्र सलाहकार हैं।)
Keyword: IBC, code, IBBI, NCLT, RBI,,
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