बिजनेस स्टैंडर्ड - राजकोषीय नहीं मौद्रिक प्रोत्साहन की जरूरत
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राजकोषीय नहीं मौद्रिक प्रोत्साहन की जरूरत

नीलकंठ मिश्रा /  June 11, 2019

मुद्रास्फीति के शेष बचे कुछे निशान के साथ हमारी लड़ाई के चलते उन महत्त्वपूर्ण नीतिगत लाभ को गंवाने का खतरा उत्पन्न हो गया है जो हमने हाल के वर्षों में हासिल किए हैं। जानकारी दे रहे हैं नीलकंठ मिश्रा   

 
लाखों-करोड़ों मनुष्यों के बीच सहमति कायम करना आसान नहीं है। जब ऐसा होता है (हमने हालिया आम चुनाव में ऐसा देखा) तो बड़े आर्थिक सुधारों की आकांक्षा होना भी स्वाभाविक है। अब जबकि इन उम्मीदों के आधार पर अनुमान प्रकट किए जाने लगे हैं तो सरकार के ऊपर भी मौजूदा आर्थिक मंदी से निपटने के लिए 'कुछ कर दिखाने' की भावना हावी हो रही है। लोगों को अपनी आकांक्षाओं के प्रति सजग रहना चाहिए। ऐसे स्पष्टï उपाय हैं जो सरकार उठा सकती है लेकिन फिलवक्त महत्त्वपूर्ण राजकोषीय प्रोत्साहन को सही नहीं माना जा सकता। मौजूदा समस्या का हल मौद्रिक है। 
 
बीते कई दशकों के दौरान देश की कमजोर विनिर्माण प्रतिस्पर्धा का विश्लेषण करने वाली रिपोर्टों में नियामकीय गतिरोध, कमजोर बुनियादी ढांचे और श्रमिकों की अकुशलता की शिकायत के अलावा उच्च ब्याज दरों की भी आलोचना की गई। अगर देश के विनिर्र्माता 12 फीसदी की दर पर उधार लेते हैं और चीन के विनिर्माता 6 फीसदी की दर पर उधार लेते हैं तथा भारत में फैक्टरियां स्थापित करने में अधिक वक्त लगता है (इससे ब्याज बढ़ता जाता है) तो देश की फैक्टरियां प्रतिस्पर्धी कैसे हो सकती हैं? ऐसे में दलील यही कहती है कि उच्च मुद्रास्फीति (सन 1960 के दशक से ही खुदरा महंगाई औसत 7.5 फीसदी रही है) और उच्च राजकोषीय घाटे के कारण भारतीय रिजर्व बैंक को उनका मुद्रीकरण करना पड़ा और ब्याज दरें नीचे नहीं आ सकीं। 
 
ऐसे में दरों में गिरावट के लिए यह आवश्यक है कि मुद्रास्फीति और राजकोषीय घाटे में कमी आए। ये दोनों आपस में भी संबंधित हैं। उच्च राजकोषीय घाटे का संबंध अक्सर उच्च मुद्रास्फीति से भी होता है। ऐसे में पहले राजकोषीय स्थिति में सुधार की आवश्यकता थी लेकिन इसके साथ ही खाद्य उत्पादन अधिशेष की भी आवश्यकता थी। बीते तीन वर्ष में मुद्रास्फीति की दर औसतन 3.5 फीसदी रही है। बीते चार वर्ष का औसत भी 4 फीसदी से कम रहा है। राजकोषीय घाटे का अनुपात देश के इतिहास का तीसरा सबसे कम है, हालांकि अन्य देशों की तुलना में यह अभी भी अधिक है। एक बार वेतन आयोग चक्र के लिए समायोजन के पश्चात तो शायद यह देश के इतिहास में भी न्यूनतम है। उच्च ब्याज दर की हिमायत के कारण ही राज्यों और केंद्र सरकारों का बजट से इतर व्यय होता है। निस्संदेह यह मामला अपारदर्शिता का है। परंतु यह व्यय असामान्य रूप से अधिक नहीं है। यह उत्पादक व्यय है और हमारी नजर में यह अर्थव्यवस्था में कर्जदारों के लिए उच्च ब्याज दर को उचित ठहराता है। 
 
इन उल्लेखनीय उपलब्धियों के बावजूद और असमायोजित वृद्घि के धीमा पडऩे के बावजूद मौजूदा ब्याज दर माहौल कर्जदारों के लिए काफी सख्त बना हुआ है। धीमी मुद्रास्फीति के माहौल में कंपनियों की राजस्व वृद्घि में भले ही धीमापन आया हो लेकिन उनकी ब्याज लागत में कमी नहीं आई। इसका असर मुनाफे और निवेश करने योग्य पूंजी पर भी पड़ रहा है। मुद्रास्फीति के अलावा ब्याज दर के अन्य घटक: वास्तविक रीपो दर, 10 वर्ष के सरकारी बॉन्ड के प्रतिफल और रीपो दर के बीच का अंतर यानी टर्म प्रीमियम और ऋण का विस्तार आदि बढ़े स्तर पर हैं। 
 
कम खाद्य महंगाई का भी हमें नकारात्मक असर देखने को मिला है। कृषि क्षेत्र की आय कमजोर हुई है क्योंकि अमीरों से गरीबों की ओर स्थानांतरण नहीं हो रहा है। इस बीच उधारी की दर में कमी नहीं आने से कोई लाभ नहीं हो रहा। इस तरह वेतन आयोग के माध्यम से खपत प्रोत्साहन भी सातवें वेतन आयोग में काफी कमजोर रहा। छठे वेतन आयोग में जहां कई वर्ष तक व्यवस्था में भारी प्रोत्साहन चलता रहा था, वहीं सातवें वेतन आयोग से वृद्धि को मिला इजाफा अब समाप्त होने लगा है। इसके बावजूद कोई समांतर लाभ नहीं हैं और टर्म प्रीमियम में कोई बदलाव नहीं है।
 
गत सितंबर में गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के नाटकीय पतन से भी पहले वृद्धि कमजोर पडऩे लगी थी। यह आठ फीसदी से नीचे रही लेकिन अभी समस्या अधिक है। इसमें दो राय नहीं कि मुद्रास्फीति के दोबारा जोखिम पकडऩे का संकट है। दूध की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी और कुछ हद तक मुद्रास्फीति की महंगाई पर ध्यान देने की आवश्यकता है। हालांकि इस बीच राजनीतिक अर्थव्यवस्था के निहितार्थ और उनके जोखिम को भी ध्यान में रखना होगा। अगर लंबे समय तक वृद्धि धीमी रही और ब्याज दरों में अहम कटौती नहीं हुई तो राजनीतिक दबाव सरकार को उच्च राजकोषीय घाटे की स्थिति में धकेल सकता है। इससे बीते कई वर्ष के दौरान मिले नीतिगत लाभ गंवा दिए जाएंगे। स्वतंत्र भारत के इतिहास में अधिकांश वक्त मुद्रास्फीति ऊंची और अस्थिर रही है। ऐसा शायद इसलिए हुआ क्योंकि यह राजनीतिक आवश्यकता थी। सन 1960 के बाद से कृषि क्षेत्र की वास्तविक उत्पादन वृद्धि दर औसतन 2.5 फीसदी वार्षिक रही। इसके बावजूद कृषि श्रमिकों की तादाद सालाना केवल 1.6 फीसदी की दर से बढ़ी। उच्च खाद्य कीमतों ने आय को अमीरों से गरीबों तक पहुंचाया वरना काफी सामाजिक तनाव उत्पन्न हो सकता था।
 
ब्याज दर सुधार की प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है। सरकारी बॉन्ड प्रतिफल में बीते कुछ सप्ताह में तकरीबन 40 आधार अंक की गिरावट आ चुकी है। गत 6 जून को रीपो दर में कटौती की जा चुकी है। बॉन्ड निवेशकों में इस बात को लेकर भी राहत है कि चुनाव से केंद्र में सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ। राजनीतिक बदलाव से सरकारी व्यय में भी इजाफा होता। अभी लंबी दूरी तय करनी है। जैसा कि हमने पहले भी कहा है अगर रीपो दर, टर्म प्रीमियम और ऋण का दायरा सभी घटकर सामान्य स्तर पर हो जाते हैं तो उधारी दर 2 फीसदी तक अधिक हो सकती है। भले ही भारतीय अर्थव्यवस्था कुछ अन्य अर्थव्यवस्थाओं की तरह दरों के लिहाज से संवेदनशील नहीं हो लेकिन दरों में गिरावट प्रोत्साहन दे सकती है। दलील के लिए अगर मॉर्गेज दर में दो फीसदी अंकों की गिरावट आ जाती तो यह अचल संपत्ति क्षेत्र के लिए बेहतर होता। दरों में इस हद तक गिरावट आने के लिए यह आवश्यक है कि वास्तविक रीपो दर पूरी तरह सामान्य हो बल्कि वित्तीय तंत्र की क्षमता में सुधार का संकेत भी जाए। इन कदमों को नीतिगत एजेंडे पर रखना होगा। इस बीच सरकार द्वारा खपत आधारित व्यय बढ़ाने का दबाव भी नहीं होना चाहिए।
Keyword: fiscal deficit, revenue, economy,,
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