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हॉलमार्किंग के आंकड़े कसौटी पर नहीं खरे!

राजेश भयानी / मुंबई June 10, 2019

मिलावट की वजह से भारत के स्वर्णाभूषण को हमेशा संदेह की दृष्टिï से देखने की धारणा अब अतीत की बात होती दिख रही है। अगर आंकड़ों पर विश्वास करें तो ऐसा ही है। देश में कुल निर्मित किए गए आभूषणों की तुलना में हॉलमार्क वाले आभूषणों के आंकड़ों की बात करें तो वर्ष 18-19 में हॉलमार्क वाले आभूषण बढ़कर 80 प्रतिशत हो गए हैं जबकि वर्ष 2013-14 में यह आंकड़ा 50 फीसदी था। हालांकि आभूषण उद्योग ने यह कहते हुए संदेह जताया है कि बिना लाइसेंस वाले जौहरियों की संख्या कई गुना अधिक है और क्या वे बिना हॉलमार्क वाले केवल 20 प्रतिशत गहने ही बेचते हैं?
 
फिलहाल देश में आभूषणों की हॉलमार्किंग अनिवार्य नहीं है लेकिन सरकार के पास इसकी शुरुआत करने के लिए योजना तैयार है। हॉलमार्किंग का निरीक्षण करने वाला भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) हॉलमार्क किए गए आभूषणों की संख्या के आंकड़े भी मुहैया कराता है। जीएफएमएस द्वारा विश्लेषण किए गए आंकड़ों के अनुमसार हॉलमार्क किए जाने वाले आभूषणों का औसत वजन 10-12 ग्राम होता है। इसका औसत 11 ग्राम लें तो 2013-14 में हॉलमार्क वाले आभूषणों की संख्या 2.6 करोड़ या 286 टन रही जबकि भारत में 609 टन सोने के गहनों का निर्माण हुआ और वर्ष 18-19 में यह आंकड़ा बढ़कर 80 प्रतिशत हो गया क्योंकि कुल 621 टन निर्मित गहनों में से हॉलमार्क वाले गहने 494 टन रहे। हॉलमार्क वाले आभूषणों में इस इजाफे के रुख के पीछे कई कारण बताए जाते हैं। तेजी से बढ़ते बीआईएस द्वारा अनुमोदित हॉलमार्किंग केंद्र, संगठित खुदरा बिक्री का बढ़ता दबदबा और ग्राहकों की जागरूकता इसमें इजाफा करने वाले प्रमुख कारण हैं। जीएफएमएस (भारत और यूएई) के वरिष्ठï विश्लेषक (कीमती धातुओं की मांग) देवजीत साहा कहते हैं कि संगठित जौहरी उपभोक्ताओं को केवल हॉलमार्क वाले आभूषण खरीदने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। इससे छोटे जौहरियों पर भी हॉलमार्किंग के रास्ते पर चलने का दबाव बना है। उपभोक्ता जागरूकता में भी जबरदस्त इजाफा हुआ है। इसके परिणामस्वरूप उपभोक्ता पुरानी कहावत 'घर का सुनार' का पालन करने के बजाय शुद्धता के मानकों की ओर बढ़ रहे हैं।
 
बीआईएस ने फिलहाल केवल 14 कैरट, 18 कैरट और 22 कैरट के आभूषणों की ही हॉलमार्किंग करने की अनुमति दी है। अन्य शुद्धता वाले आभूषणों की कुछ क्षेत्र-विशिष्टï मांग भी होती है जिसके लिए हॉलमार्किंग की जा सकती है। इंडियन एसोसिएशन ऑफ हॉलमार्किंग सेंटर्स के अध्यक्ष हर्षद अजमेरा ने कहा, 'हॉलमार्क वाले आभूषणों में वृद्धि के अलावा हॉलमार्किंग के मानकों में भी सुधार हुआ है।' बीआईएस शुद्धता मानकों में बहुत अधिक अंतर की अनुमति नहीं देता है। अजमेरा बीआईएस के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहते हैं कि पांच साल पहले अस्वीकृति का अनुपात 30 प्रतिशत था। इसका मतलब है कि हॉलमार्क वाले 30 प्रतिशत आभूषण पूरी तरह से स्वीकृत मानक के अनुरूप नहीं थे। पिछले दो वर्षों में अस्वीकृति का यह अनुपात सुधरकर 10 प्रतिशत हो गया है।
 
बीआईएस के अधिकारी जौहरियों से हॉलमार्क वाले आभूषणों के नमूने एकत्र करते हैं और आकस्मिक रूप से एकत्र किए गए इन नमूनों की शुद्धता का परीक्षण करते हैं। वर्ष 2016-17 में एकत्र किए गए 2,965 नमूनों में से 892 नमूने अस्वीकृत कर दिए गए जो लगभग 30 प्रतिशत बैठते हैं। वर्ष 2018-19 में 5,013 नमूनों में से 534 नमूने ही अस्वीकृत किए गए थे। अजमेरा ने मांग की है कि लिए जाने वाले यह नमूने काफी कम हैं और हर साल कम से कम एक बार सभी अधिकृत जौहरियों से नमूने लिए जाने चाहिए।
 
भारत में जौहरियों के शीर्ष संगठन इंडियन बुलियन ऐंड ज्वैलर्स एसोसिएशन (आईबीजेए) को इस बात पर संदेह है कि 80 प्रतिशत आभूषणों को हॉलमार्क दिया जा रहा है। संगठन को लगता है कि हॉलमार्क वाले आभूषणों की बिक्री की असली हिस्सेदारी कम हो सकती है। आईबीजेए के राष्ट्रीय सचिव सुरेंद्र मेहता ने कहा कि कुल जौहरियों में से केवल मु_ïीभर जौहरी ही हॉलमार्क वाले गहनों की बिक्री के लिए बीआईएस के साथ पंजीकृत हैं। भारत में अनुमानित रूप में 3-4 लाख जौहरी हैं। अगर यह मान लिया जाए कि केवल स्वर्णाभूषणों का कारोबार करने वालों की संख्या एक लाख से डेढ़ लाख के बीच हैं तो क्या इसका मतलब यह है कि लगभग एक लाख जौहरी ही बिना हॉलमार्क वाले 20 प्रतिशत आभूषणों की बिक्री कर रहे हैं। आभूषण उद्योग के एक अनुभवी अधिकारी का कहना है कि पुराने सोने से निर्मित अधिकांश आभूषणों को हॉलमार्क नहीं मिल रहा है, खास तौर पर छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में और न ही इन्हें आभूषण निर्माण के औपचारिक आंकड़ों में शामिल किया जाता है। इसलिए हॉलमार्क वाले आभूषणों का वास्तविक अनुपात जितना बताया जा रहा है, उससे कम हो सकता है। हालांकि अजमेरा चाहते हैं कि बीआईएस को अपने उन अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई करनी चाहिए जो हॉलमार्किंग को मंजूरी देते हैं या उनका ऑडिट करते हैं।
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