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भारतीय कंपनियों का भी 'खान मार्केट गैंग'!

इंसानी पहलू
श्यामल मजूमदार /  June 10, 2019

पिछले कुछ दिनों से 'खान मार्केट गैंग' चर्चा में है। यह समाचार-पत्रों के शीर्षकों, सोशल मीडिया और लगभग हर भारतीय की सामान्य बातचीत में मौजूद है। निस्संदेह तथाकथित उदारवादी खुद के सुर्खियों में आने से खुश नहीं हैं। नरेंद्र मोदी सरकार की प्रचंड जीत से इन स्व-घोषित बुद्धिजीवियों के लगभग बेरोजगार होने का खतरा है। ऐसे में उन्हें ऐसे शांत कोने की जरूरत है, जहां वे बैठकर अपने दुखों को भुला सकें। सत्तारूढ़ सरकार इस गैंग को ताकतवर वंशवादी अमीर अल्पसंख्यकों के रूप में देखती है, जो सत्ता के सभी केंद्रों और अभिव्यक्ति के सभी माध्यमों पर अपना नियंत्रण चाहते हैं। वे अपने समूह में किसी बाहरी को प्रवेश नहीं करने देना चाहते हैं। 

 
इस गैंग के जैसा ही एक गैंग भारत के पारिवारिक नियंत्रण वाले कारोबारों में भी मौजूद है। इस समूह के कुछ सदस्य पिछले कुछ समय से बचने के लिए भाग रहे हैं। लेकिन फिर भी ऐसे बहुत से प्रवर्तक हैं, जिनका मानना है कि उन्हें अपनी कंपनियों पर नियंत्रण का अधिकार मिला हुआ है, जबकि उनका ज्यादा कुछ दांव पर नहीं लगा हुआ है। उनका मानना है कि वे अपनी कंपनियों में दीर्घावधि मूल्य सृजन के सबसे बेहतर संरक्षक हैं। कुछ ने बाहरी पेशेवरों को मुख्य कार्याधिकारी बनाया है, लेकिन वे मरने तक इन पेशवरों को नियंत्रित करते हैं। 
 
जेट एयरवेज के संस्थापक और पूर्व चेयरमैन नरेश गोयल का ही उदाहरण लें। कंपनी का सीईओ नियुक्त करने के बावजूद गोयल और उनकी पत्नी ने जेट को अपनी एक दुकान के रूप में चलाया, जहां उन दोनों की मंजूरी के बिना कुछ नहीं हुआ। गोयल हमेशा अहम फैसलों में शामिल होते थे और आम तौर पर सीईओ के पास सीमित कार्यकारी शक्तियां होती थीं और वे लंबे समय तक नहीं टिक पाते थे। इससे सीईओ को नियुक्त करने की प्रक्रिया महज एक मजाक बन गई थी। जेट में 11 वर्षों के दौरान आठ सीईओ बने हैं। 
 
उदाहरण के लिए गोयल ने पेरिस एयर शो में मीडिया के सामने घोषणा की थी कि जेट 20 नए लंबे-चौड़े विमानों के ऑर्डर देगी। उन्होंने कहा कि इन विमानों को विमानन कंपनी के बेड़े में अगले 18 महीनों के दौरान शामिल किया जाएगा ताकि वैश्विक उड़ानें शुरू करने की आकांक्षाएं पूरी की जा सकें। समस्या यह थी कि जेट के बोर्ड और उसके सीईओ को इस योजना के बारे में अगली सुबह के समाचार-पत्रों से पता चला। भारत में परिवारों द्वारा चलाई जा रही कंपनियों में गोयल जैसे कई हैं, जो अपनी कंपनियों को अपनी जागीर के रूप में चलाते हैं। वे कंपनी के बोर्ड को अपने सगे-संबंधियों से भर देते हैं और अपने तरीके से चीजों को नियंत्रित करते हैं। साफ तौर पर ज्यादातर अवसरों को गंवा देते हैं क्योंकि वे दूसरों को सुनते नहीं हैं। पश्चिमी देशों में संस्थापक एक सीईओ को हटाते हैं और दूसरे को नियुक्त करते हैं। भारतीय प्रवर्तक एक सीईओ को हटा देते हैं और खुद सीईओ की भूमिका में आ जाते हैं। इन प्रवर्तकों में से ज्यादातर खुद अपनी धारणाओं के शिकार हैं और आम तौर पर उनके जाल में फंस जाते हैं। वह उन लोगों पर भरोसा नहीं कर पाते हैं, जिन्हें उन्होंने तैयार किया है। 
 
कुछ ऐसे भी मामले हैं, जहां बाहरी सीईओ के लिए कंपनी में लंबे समय से मौजूद कर्मचारियों की मंडली मुश्किल बन जाती है। यह मंडली ऐसे किसी प्रस्ताव को नाकाम कर देती है, जो समूह के मौजूदा ढांचे में अहम बदलाव ला सकता है। शोध में भी यह पाया गया है कि बहुत से प्रवर्तक यह सोचते हैं और दूसरों को भी यह सोचने को मजबूर करते हैं कि उनका कोई विकल्प नहीं है। उनका कोई विकल्प न होने का विचार उन्हें इस विचार से भी ज्यादा आनंद देता है कि उनके जाने के बाद संगठन खत्म हो जाएगा। हालांकि आपकी प्रतिभा का इससे कोई बेहतर सबूत नहीं हो सकता कि आप कंपनी से जाने के बाद उससे दूर हो जाते हैं। कुछ प्रवर्तक कंपनी के लिए खुद को इतना जरूरी समझ लेते हैं कि वे कंपनी को छोडऩे से ही इनकार कर देते हैं। भले ही इसके लिए पूरे बोर्ड की सेवानिवृत्ति की उम्र में बार-बार बढ़ोतरी ही क्यों न करनी पड़े। 
 
इस बात में कोई संदेह नहीं है कि 1990 के दशक के प्रारंभ से पारिवारिक स्वामित्व वाले बहुत से कारोबार गुमनामी में चले गए हैं। मैकिंजी के हाल के एक अध्ययन में कहा गया है कि भारत में पारिवारिक स्वामित्व वाले कारोबारों में से केवल 7 फीसदी ही तीसरी पीढ़ी से आगे बढ़ पाए हैं। वैश्विक कार्याधिकारी खोज कंपनी एगोन जेंडर के एक श्वेत पत्र के मुताबिक सबसे महत्त्वपूर्ण सवाल समय है। उद्यमी के लिए पहला कदम यह समझना है कि भविष्य की यात्रा के लिए एक अलग अगुआ की जरूरत है। आम तौर पर ऐसा दौर होता है, जब संगठन की प्रगति औपचारिक संगठन, प्रणाली और प्रक्रियाओं के अभाव में धीमी हो जाती है। 
 
भारतीय कंपनियों की समस्या यह है कि प्रवर्तक पेशेवरों को उनकी भूमिका स्पष्ट किए बिना नियुक्त करते हैं। उदाहरण के लिए इस बारे में करार करना जरूरी है कि किन मामलों का फैसला परिवार लेगा और वे कौनसे मामले होंगे, जिनमें वे पेशेवर के फैसलों का समर्थन करेंगे। कंपनियों में ऐसा औपचारिक ढांचा और प्रक्रिया होनी जरूरी है जैसी आनंद महिंद्रा और हर्ष मारीवाला ने अपने यहां लागू की है। ज्यादातर प्रवर्तक प्रणाली में काफी अस्पष्टताएं छोड़ देते हैं ताकि प्रवर्तक किसी भी समय अंदर आ सकें। यह उचित समय है कि कॉरपोरेट इंडिया का खान मार्केट गैंग भी अपनी गलती को महसूस कर उसमें सुधार करे। अगर सम्मान करना आपकी कंपनी की संस्कृति है तो असली प्रतिभाएं आपके अनुमान से पहले निकासी का बटन दबाएंगी। 
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