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बाजार और ज्यादा की नहीं कर सकते थे उम्मीद

तमाल बंद्योपाध्याय /  June 10, 2019

दर में कटौती, मौद्रिक नीति के रुख में बदलाव व अर्थव्यवस्था में 'पर्याप्त' नकदी सुनिश्चित करने की आरबीआई की प्रतिबद्धता से बैंकों को ऋण दरें घटाने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा। बता रहे हैं तमाल बंद्योपाध्याय

 
एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के केंद्रीय बैंक ने नीतिगत दरों में 25 आधार अंक की कटौती की घोषणा कर दी है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने  लगातार तीसरी बार कटौती की है। केंद्रीय बैंक ने मौद्रिक नीति का रुख भी तटस्थ से नरम कर दिया है।  दर में कटौती से भी अहम पहलू नीतिगत रुख में बदलाव है। केंद्रीय बैंक ने फरवरी में अपना रुख 'सख्त' से 'तटस्थ' किया था और वर्तमान चक्र में पहली बार दर घटाई थी। सैद्धांतिक रूप से तटस्थ रुख का मतलब है कि नीति की दिशा कोई भी हो सकती है। आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने मौद्रिक नीति की घोषणा के बाद मीडिया से जो कुछ कहा, उससे यह संकेत मिलता है कि अभी दरों में बढ़ोतरी की कोई संभावना नहीं है। और दरों में और कटौती हो सकती है। यह कटौती चालू वित्त वर्ष में अनुमानित राजकोषीय घाटे और मॉनसून पर निर्भर करेगी। हमें अनुमानित राजकोषीय घाटे का पता 5 जुलाई को केंद्रीय बजट पेश किए जाने पर चलेगा। मॉनसून की चाल को देखना इसलिए अहम होगा क्योंकि इसका महंगाई पर असर पड़ता है। 
 
एक अन्य पहलू गवर्नर का यह बयान है कि आरबीआई सभी उत्पादक कार्यों के लिए आर्थिक तंत्र में पर्याप्त नकदी सुनिश्चित करेगा। हाल के वर्षों में ऐसा पहली बार हो रहा है कि केंद्रीय बैंक ने आर्थिक तंत्र में 'पर्याप्त नकदी' सुनिश्चित करने का वादा किया है। आरबीआई पहले की नीतियों में आर्थिक तंत्र में नकदी डालने के उपायों का जिक्र करता था। ये उपाय तथाकथित खुले बाजार की खरीद प्रक्रियाओं (ओएमओ) के तहत बाजार से सरकारी बॉन्डों की खरीद, लंबी अवधि की परिवर्तनशील-दर रीपो नीलामी, विदेशी मुद्रा खरीद/बिक्री लेनदेन और तथाकथित नकदी कवरेज अनुपात नियम आदि हैं। लेकिन ये उपाय इतनी स्पष्टता के साथ आगे की दिशा नहीं बताते थे। 
 
पर्याप्त नकदी सुनिश्चित करने की घोषणा से बहुत लोगों की चिंताएं दूर होंगी और मौद्रिक नीति के लाभ को ग्राहकों तक पहुंचाने में मदद मिलेगी। जून के प्रारंभ में आर्थिक तंत्र में नकदी का दैनिक औसत स्तर अधिशेष हो गया, जो अप्रैल और मई में सरकार के सीमित खर्च के कारण कम था। आरबीआई की नीतिगत दर घटकर 5.75 फीसदी पर आ गई है। इससे पहले यह इस स्तर पर जुलाई, 2010 में थी। उस समय केंद्रीय बैंक नीतिगत दर में कटौती कर रहा था और आर्थिक तंत्र में नकदी झोंक रहा था ताकि मंदी के असर से बचा जा सके। अमेरिका के जाने-माने निवेश बैंक लीमन ब्रदर्स होल्डिंग आईएनसी के दिवालिया होने के बाद मंदी ने विश्व के एक बड़े हिस्से को अपने आगोश में ले लिया था। हमने दरों में अब जैसी लगातार कटौती हाल के वर्षों में जनवरी-जुलाई, 2015 और जनवरी-जून, 2013 में देखी है। जनवरी-जुलाई, 2015 में गवर्नर रघुराम राजन ने दर 8 फीसदी से घटाकर 7.25 फीसदी की थी। वहीं जनवरी-जून, 2013 में डी सुब्बाराव ने भी दर 8 फीसदी से घटाकर 7.25 फीसदी की थी। 
 
सुब्बाराव ने यह कदम आर्थिक वृद्धि को बढ़ाने के लिए उठाया था, जो मार्च 2013 में समाप्त वित्त वर्ष में घटकर अनुमानित 5 फीसदी के स्तर पर आ गई थी। यह एक दशक में सबसे कम वृद्धि दर थी। हालांकि उस समय जब आरबीआई ने मौद्रिक नीति का रुख नरम किया तो सुब्बाराव ने दरों में कटौती की और उम्मीदों को नियंत्रित करने का प्रयास किया। उन्होंने चेताया कि महंगाई में बढ़ोतरी के जोखिम से 'आगे और मौद्रिक नरमी की मामूली गुंजाइश' बची है। वर्ष 2015 में दरों में कटौती का फैसला नीतिगत फैसलों से बाहर लिया गया था। निस्संदेह इस समय ब्याज दर का फैसला मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ले रही है, लेकिन बीते वर्षों में दोनों मौकों पर गवर्नर ने ब्याज दर में कटौती के फैसले लिए थे। 
 
सबसे अहम बात यह है कि फरवरी और अप्रैल में दर कटौती के दौरान एमपीसी के सभी सदस्यों की आम सहमति नहीं थी। लेकिन जून की कटौती के फैसले में सभी की सहमति रही है। एमपीसी का कोई भी सदस्य दर कटौती के खिलाफ नहीं था। इसके अलावा सभी छह सदस्य नीतिगत रुख में बदलाव के भी पक्ष में रहे हैं। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि अगर राजकोषीय घाटा और महंगाई नियंत्रण में रहते हैं तो इस साल दरों में और कटौती की जा सकती हैं ताकि देश की वृद्धि को रफ्तार दी जा सके। आरबीआई ने वित्त वर्ष 2020 के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का अपना अनुमान 20 आधार  अंक घटाकर 7 फीसदी कर दिया है। केंद्रीय बैंक ने अपना महंगाई का अनुमान भी घटाया है। खुदरा महंगाई अप्रैल में मामूली बढ़ोतरी के साथ 2.9 फीसदी रही है, लेकिन कथाकथित कोर या गैर-खाद्य, गैर-तेल विनिर्माण महंगाई तेजी से घटी है। यह मानते हुए कि मॉनसून सामान्य रहेगा, खुदरा महंगाई 2020 की दूसरी छमाही में 3.4 से 3.7 फीसदी अनुमानित है। यह पहले के अनुमान 3.5 से 3.8 फीसदी से मामूली कम है। 
 
भारत ने मार्च तिमाही में विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का तमगा गंवा दिया। अब चीन ने यह तमगा हासिल कर लिया है। मार्च में समाप्त वित्त वर्ष 2019 की अंतिम तिमाही में आर्थिक वृद्धि घटकर 5.8 फीसदी रही, जो पिछली 20 तिमाहियों में सबसे कम है। इससे भारत की जीडीपी की सालाना वृद्धि भी घटकर 6.8 फीसदी पर आ गई। यह मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में सबसे कम है। फरवरी से अब तक नीतिगत दरों में 50 आधार अंकों की कटौती की गई है, लेकिन बैंकों ने अपने ग्राहकों को इसका केवल 21 फीसदी ही लाभ दिया है। बैंकों के ग्राहकों को पूरा लाभ पहुंचाने में कुछ समय लग सकता है, लेकिन आर्थिक तंत्र में पर्याप्त नकदी सुनिश्चित करने और रुख में बदलाव की इस नीति से मौद्रिक लाभ ग्राहकों तक पहुंचाने के मुद्दे को हल करने की दिशा में प्रयास किया गया है। 
 
जब हम आरबीआई की नकदी प्रबंधन रणनीति पर कोई ठोस खाका बना लेंगे तो दरों में कटौती का लाभ ग्राहकों तक जल्द पहुंचा पाना संभव होगा। आरबीआई ने नकदी प्रबंधन ढांचे की समीक्षा के लिए एक आंतरिक समिति बनाई है। इससे पहले ऐसी समीक्षा 2014 में हुई थी। यह समिति अपनी रिपोर्ट जुलाई के मध्य में सौंपेगी। इसे वर्तमान नकदी प्रबंधन ढांचे को आसान बनाने, लक्ष्यों में स्पष्टता लाने और केंद्रीय बैंक द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले उपायों और नकदी टूलों के बारे में उपाय सुझाने हैं। आरबीआई की गुरुवार की घोषणा उम्मीदों के मुताबिक है। बाजार इससे अधिक उम्मीद नहीं कर सकते थे। 
 
(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक, लेखक और जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड में वरिष्ठ सलाहकार हैं।)
Keyword: india, economy, GDP, market, bank, repo rate, RBI,,
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