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ग्रोफर्स फिर जुटाएगी बड़ी रकम

टीई नरसिम्हन / चेन्नई June 10, 2019

सॉफ्टबैंक सहित विभिन्न निवेशकों से करीब 22 करोड़ डॉलर जुटाने के बाद ऑनलाइन किराना स्टार्टअप ग्रोफर्स अब एक-दो महीने के भीतर 6 से 7 करोड़ डॉलर जुटाने की तैयारी कर रही है। इसमें से अधिकांश रकम का इस्तेमाल कंपनी के साझेदारों के विनिर्माण संयंत्रों में गोदाम एवं क्षमता तैयार करने में किया जाएगा। ग्रोफर्स तीन साल के बाद अपना आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) भी ला सकती है। पिछले महीने ग्रोफर्स ने सॉफ्टबैंक सहित विभिन्न निवेशकों से 22 करोड़ डॉलर जुटाने की घोषणा की थी। जुटाई गई रकम में सॉफ्टबैंक विजन फंड की हिस्सेदारी करीब 60 फीसदी थी जबकि शेष हिस्सेदारी दक्षिण कोरिया की निवेश फर्म केटीबी वेंचर्स और टाइगर ग्लोबल एवं सिकोया कैपिटल जैसे मौजूदा निवेशकों की थी। भारत के ऑनलाइन किराना डिलिवरी उद्योग में निवेशकों जुटाई गई यह सबसे बड़ी रकम थी।

 
आज ग्रोफर का मूल्यांकन करीब 80 करोड़ डॉलर है और हाल में जुटाई गई रकम से उसे अगले दो साल के दौरान मदद मिलेगी। ग्रोफर्स के सह-संस्थापक एवं सीईओ अलबिंदर ढींढसा ने अगले एक-दो महीने में 6 से 7 करोड़ डॉलर के संभावित निवेश पर टिप्पणी करने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि जुटाई गई रकम का इस्तेमाल साझेदार इकाइयों में गोदाम सुविधा तैयार करने और विनिर्माण क्षमता बढ़ाने में किया जाएगा। ढींढसा ने आईआईटी दिल्ली से इंजीनियरिंग में स्नातक किया है और आईआईटी बंबई के पूर्व छात्र सौरभ कुमार के साथ मिलकर 2014 में उन्होंने कंपनी की स्थापना की थी। शुरू में ग्रोफर्स का कारोबारी मॉडल एक्सप्रेस डिलिवरी यानी दो घंटे से कम समय में ग्राहकों को किराने की आपूर्ति करने का था। इस स्टार्टअप को सिकोया, टाइगर ग्लोबल और सॉफ्टबैंक जैसे दिग्गज वैश्विक निवेशकों का समर्थन मिला जिन्होंने 2015 में 16.5 करोड़ डॉलर का निवेश किया।
 
अधिक लागत एवं ग्राहकों की बढ़ती शिकायत के कारण ग्रोफर्स का यह मॉडल अधिक टिकाऊ नहीं लग रहा था। इसलिए कंपनी ने इनवेंटरी मॉडल पर काम करना शुरू किया। इसके अलावा कंपनी ने निजी लेबल पर भी काफी जोर दिया। आज ग्रोफर्स की औसत मासिक बिक्री करीब 260 करोड़ रुपये की है जिसमें उसके निजी लेबल की हिस्सेदारी करीब 40 फीसदी है। कंपनी ने अपनी औसत मासिक बिक्री को बढ़ाकर करीब 350 करोड़ रुपये करने का लक्ष्य रखा है। कंपनी ने उम्मीद जताई है कि इसमें उसके निजी लेबल का योगदान करीब 60 फीसदी होगा।
 
ग्रोफर्स कम कीमत वाले एफएमसीजी (रोजमर्रा के इस्तेमाल की वस्तुएं) उत्पादों के निजी लेबल पर ध्यान केंद्रित कर रही है ताकि मौजूदा वृद्धि दर को रफ्तार दी जा सके। हालांकि उद्योग के मुकाबले ग्रोफर्स की वृद्धि दर करीब दोगुनी है। आज ग्रोफर्स की सबसे बड़ी चुनौती क्षमता किल्लत की है जिसमें साझेदारों के यहां गोदाम के लिए जगह की कमी एवं विनिर्माण क्षमता का अभाव भी शामिल है। कंपनी जुटाई जाने वाली इस रकम के जरिये इन चुनौतियों से निपटने की योजना बना रही है।
Keyword: Grofers, online, retailer, softbank,,
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