बिजनेस स्टैंडर्ड - परिधान निर्यात में हालात सुधरने के संकेत
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परिधान निर्यात में हालात सुधरने के संकेत

टी ई नरसिम्हन / चेन्नई June 09, 2019

भारत से परिधान निर्यात लगातार दूसरे वित्त वर्ष में गिर गया है। वर्ष 2018-19 में सिले-सिलाये वस्त्रों का निर्यात 2 फीसदी की गिरावट के साथ 16.37 अरब डॉलर पर रहा। यह गिरावट इस लिहाज से अहम है कि वर्ष 2009-10 से लेकर 2017-18 तक यह सालाना 9.8 फीसदी की प्रभावी दर से बढ़ा था। बांग्लादेश, वियतनाम और श्रीलंका से मिलने वाली कड़ी प्रतिस्पद्र्धा को इस गिरावट के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार माना जा रहा है। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के बाद मिलने वाली रियायत और वस्त्र निर्माण के लिए सूती कपड़े पर अतिशय निर्भरता भी इसके कुछ कारण रहे हैं। इन प्रतिकूल परिस्थितियों ने गत दो वर्षों में भारत के निर्यात में वृद्धि की रफ्तार को धता बता दिया लेकिन इससे दूसरे देशों को अपना बाजार बढ़ाने का मौका भी मिल गया। इस दौरान जहां भारत का परिधान निर्यात गिरा, वहीं बांग्लादेश और वियतनाम के निर्यात 10-13 फीसदी बढ़ गए। इन देशों में उत्पादन की कम लागत होने से उन्हें अपना निर्यात बढ़ाने में मदद मिली। जीएसटी लागू होने पर सात फीसदी का आयात शुल्क वापस लौटाने का प्रावधान खत्म होने से घरेलू विनिर्माताओं को तगड़ा झटका लगा। बांग्लादेश को जब प्रमुख बाजारों में वरीय शुल्क पहुंच का लाभ मिलने लगा था, उस समय भारतीय निर्यातकों की लाभप्रदता और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में प्रतिस्पद्र्धात्मकता प्रभावित होने लगी। आशंका है कि भारत यूरोपीय संघ को परिधान निर्यात का अपना हिस्सा बांग्लादेश और वियतनाम के हाथों गंवा सकता है। 

 
भारतीय वस्त्र उत्पादों पर औसत शुल्क यूरोपीय संघ में करीब 5.9 फीसदी और अमेरिका में 6.2 फीसदी लगता है जबकि अमेरिका में कोई शुल्क नहीं लगता है। वहीं बांग्लादेश के लिए यूरोप में आयात शुल्क 3.9 फीसदी ही है। परिधान उत्पादन में लगी इकाइयों की मजदूरी लागत भी बढ़ गई है। केयर रेटिंग्स के मुताबिक वर्ष 2009-10 में कुल लागत में मजदूरी का जो हिस्सा 9 फीसदी था वह 2017-18 में बढ़कर 13 फीसदी हो गया। अर्थव्यवस्था में वस्त्र क्षेत्र की महत्त्वपूर्ण हिस्सेदारी होने से निर्यात क्षेत्र में जल्द जान फूंकना अहम है। मूल्य के संदर्भ में, वस्त्र क्षेत्र का औद्योगिक उत्पादन में अंशदान करीब 7 फीसदी, जीडीपी का करीब 2 फीसदी और देश की निर्यात आय में 15 फीसदी है। केयर रेटिंग्स के मुताबिक यह 4.5 करोड़ से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार देता है और कृषि के बाद दूसरा सबसे बड़ा रोजगार प्रदाता है। इसमें से भी सिले-सिलाये कपड़ों का हिस्सा उद्योग राजस्व का 50 फीसदी है।
 
भले ही इस आंशिक सुधार को परिधान निर्यात की तस्वीर में बदलाव के तौर पर पेश करना जल्दबाजी हो लेकिन गत वर्ष के अंतिम महीनों में उठाए गए कुछ सरकारी कदमों ने नतीजे देने शुरू कर दिए हैं। पहले छह महीनों की गिरावट के बाद अक्टूबर 2018 में वस्त्र निर्यात एक साल पहले की तुलना में 36.36 फीसदी बढ़ गया। अक्टूबर के बाद के छह महीनों में भी तेजी का यह सिलसिला जारी है। तिरुपुर निर्यातक संघ के अध्यक्ष राजा एम षणमुगम कहते हैं कि इसमें कुछ योगदान तो राज्य एवं केंद्रीय कर एवं शुल्क में रियायत बढ़ाने के फैसले का भी है। इस कर रियायत को 3.2 फीसदी से बढ़ाकर 4.5 फीसदी कर दिया गया था। मुंबई स्थित भारतीय कपड़ा विनिर्माता संघ के अध्यक्ष राहुल मेहता कहते हैं, 'मुझे लगता है कि लंबे समय तक स्थिरता या सुस्ती रहने के बाद अब हालात बदल रहे हैं। सरकारी समर्थन बढ़ा है। बांग्लादेशी उत्पादों के दाम बढ़े हैं और वियतनाम भी अपनी क्षमता के चरम पर पहुंचता नजर आ रहा है।' इसके बावजूद सुधार की यह दर धीमी ही रहने की संभावना है और 2009-10 और 2017-18 के बीच उच्च वृद्धि दर हासिल करने की उम्मीद कम ही है। 
 
केयर रेटिंग की रिपोर्ट कहती है, 'अमेरिकी डॉलर के साथ रुपये में अवस्फीति आने के बावजूद परिधान निर्यात रुपये के संदर्भ में मामूली रूप से बढ़ेगा जबकि डॉलर के संदर्भ में 4-5 फीसदी घटेगा। हालांकि वित्त वर्ष 2019-20 में यह आंशिक रूप से बढ़ेगा।' फिलहाल भारत के कुल परिधान निर्यात में कीमत के लिहाज से अमेरिका और यूरोपीय संघ का अंशदान मिलकर 60 फीसदी है। अमेरिका सबसे बड़ा आयातक देश है जबकि यूरोपीय संघ सबसे बड़ा क्षेत्रीय आयातक समूह है। अमेरिकी सरकार का सामान्यीकृत वरीयता प्रणाली से 3,000 उत्पादों को शुल्क-मुक्त पहुंच देना बंद करने के फैसले का भारतीय परिधान निर्यातकों पर अधिक असर पडऩे के आसार नहीं हैं। इसकी वजह यह है कि उत्पादों की मौजूदा सूची में सिले-सिलाये कपड़े शामिल नहीं हैं। हालांकि अगर इस सूची में सिले-सिलाये कपड़ों को भी शामिल कर दिया जाता है तो अमेरिका को होने वाले भारतीय परिधान निर्यात में 30-35 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है। उद्योग प्रतिनिधियों का कहना है कि इस कदम का असर भले ही आंशिक होगा लेकिन मौजूदा समय में निर्यात के पहले से ही कम होने से ऐसा होना ठीक नहीं होगा। उनका यह भी कहना है कि केंद्र सरकार को सब्सिडी या प्रोत्साहन के जरिये मूल्य वृद्धि की क्षतिपूर्ति करनी चाहिए और संरक्षणवाद के बारे में उसे अमेरिका से सीख लेनी चाहिए।
 
परिधान निर्यात संवद्र्धन परिषद के मुताबिक अमेरिका ने 58.65 करोड़ डॉलर मूल्य के सिले-सिलाये कपड़ों का आयात किया है लेकिन उसमें भारत की हिस्सेदारी केवल 1.79 करोड़ डॉलर की ही है। लेकिन परिधान विनिर्माता अब अपने बाजारों में विविधता लाने पर जोर दे रहे हैं जिससे जापान, इजरायल, दक्षिण अफ्रीका और हॉन्गकॉन्ग जैसे देशों को परिधान निर्यात काफी तेजी से बढ़ रहा है। कई लोगों ने सूती कपड़ों से आगे भी विचार करना शुरू कर दिया है। मेहता का कहना है कि हम मुख्य रूप से सूती कमीजों और टी-शर्टों तथा सूती ब्लाउजों वगैरह पर निर्भर हैं। यह गर्मियों और अनौपचारिक वस्त्र उत्पादों की बास्केट है। यह एक अन्य वजह है कि हम इन क्षेत्रों में विकास का फायदा नहीं उठा पा रहे हैं।
 
भारत निर्यात बाजार का बढ़ा हिस्सा गंवा रहा है क्योंकि यह मानव निर्मित फाइबर (एमएमएफ) या पॉलिएस्टर पर आधारित परिधानों में प्रतिस्पद्र्धी नहीं हैं और इसके पास ठंड में या खेलों के दौरान पहने जाने वाले परिधानों की क्षमता नहीं है। वैश्विक व्यापार में औपचारिक परिधानों का बड़ा हिस्सा शामिल रहता है, भले ही ये पॉलिएस्टर की कमीजें, सूट, जैकेट या ऊनी वस्त्र, चमड़े से बने कपड़े, कड़ाके की ठंड में पहने जाने वाले कपड़े या विशेष प्रयोजनों वाले कपड़े हों। ये सब भारतीय निर्यात का हिस्सा नहीं हैं। बाजार हिस्सेदारी के लिहाज से वित्त वर्ष 2018 के दौरान कुल वस्त्र निर्यात में सूती परिधानों का योगदान करीब 51 प्रतिशत रहा जबकि भारत से कुल वस्त्र निर्यात में 28 प्रतिशत योगदान के साथ मानव निर्मित फाइबर दूसरे स्थान पर रहा।
 
मानव निर्मित फाइबर सूती परिधानों का हिस्सा हड़पता जा रहा है, खास तौर पर दामों में अंतर और देश के कई भागों में कपास की अनुपलब्धता की वजह से। हालांकि केयर रेटिंग्स का कहना है कि वित्त वर्ष 19 के पहले 11 महीनों में सूती कपड़ों ने अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर 54 प्रतिशत कर दी है जबकि मानव निर्मित फाइबर की हिस्सेदारी सिकुड़कर 24 प्रतिशत रह गई। प्रतिस्पद्र्धा और वृद्धि जारी रखने के लिए भारत को अपने मानव निर्मित फाइबर से बने उत्पादों में इजाफा करने की जरूरत है। इसके अलावा इन चुनौतियों की दिशा में उठाए गए कदम इस पूरे क्षेत्र में व्यापक सुधार करने और उन्हें बनाए रखने के लिए महत्त्वपूर्ण होंगे। लेकिन यह सब काम तभी अच्छे हैं कि जब भारत नए वस्त्रों की डिजाइनिंग से लेकर उनकी डिलिवरी तक की विनिर्माण प्रक्रिया में भी और तेजी लाए। मेहता का कहना है कि अगर निर्यातक इन सब बातों पर ध्यान देते हैं तो भारत के सिले-सिलाये कपड़ों के निर्यात में दोबारा 8-10 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है।
Keyword: textiles, cotton, cloths, export,,
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