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कर्ज के एकमुश्त समाधान पर बैंकों का जोर

नम्रता आचार्य और ईशिता आयान दत्त / कोलकाता June 09, 2019

बैंकों को छोटे और मझोले आकार की कंपनियों के कर्ज के मामले में एकमुश्त समाधान का विकल्प अपनाना पड़ रहा है। इसकी वजह है कि राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) में मामले स्वीकार किए जाने में देरी हो रही है।  उदाहरण के लिए यूनाइटेड बैंक आफ इंडिया (यूबीआई) ने एनसीएलटी केपास 33 मामले भेजे थे, जिनमें से अब तक 2 ही स्वीकार हुए हैं। इन मामलों में यूबीआई ने ही पूरी तरह से कर्ज दिया है और इन पर एनसीएलटी के साथ चर्चा भी की है। यूनाइटेड बैंक के मुख्य कार्यकारी और प्रबंध निदेशक अशोक प्रधान ने कहा, 'मामले स्वीकार किए जाने की प्रतीक्षा सूची में बड़ी संख्या में मामले हैं, जिसे लेकर हमने एनसीएलटी से चिंता जाहिर की है। स्वीकार करने में ज्यादा देरी होना बैंकरों के लिए गंभीर चिंता का मसला है।' 
 
मामलों को स्वीकार करने में 4 से 5 महीने वक्त लग रहा है, जबकि ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवाला संहिता (आईबीसी) में मामले स्वीकार करने का वक्त 14 दिन और दिवाला मामलों के समाधान के लिए 180 दिन तय किए गए हैं, जिसका 90 दिन विस्तार किया जा सकता है।  यूको बैंक के कार्यकारी निदेशक चरण सिंह ने कहा, 'एनसीएलटी में मामलों को स्वीकार करने की रफ्तार धीमी हुई है। छोटे और मझोले आकार के खातों के मामले में हम प्रमोटरों के साथ समझौता करने को प्राथमिकता दे रहे हैं।'
 
ऐसा आंकड़ों से भी पता चलता है। भारतीय ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवाला बोर्ड (आईबीबीआई) के आंकड़ों से पता चलता है कि जनवरी 2017 से मार्च 2019 के बीच कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) के लिए 1,858 मामले दाखिल किए गए। इनमें से 152 मामलों को समीक्षा/अपील/समाधान के माध्यम से बंद किया गया, जबकि 91 मामले धारा 12 ए के तहत वापस ले लिए गए। इसके विपरीत 94 समाधान हुए।  आईबीसी की धारा 12 एक में कॉर्पोरेट कर्ज लेने वाले को कर्ज देने वाले 90 प्रतिशत कर्जदाताओं की सहमति के बाद एनसीएलटी से मामला वापस लेने की अनुमति है। 
 
समाधान पेशेवरों का कहना है कि कुछ मामलों में स्वीकार करने में देरी 11 महीने तक है। समाधान पेशेवर ममता बिनानी ने कहा, 'कुछ मामलों में स्वीकार करने में 11 महीने तक देरी हुई है। अन्य वजह है कि सुनवाई के दौरान आवेदनों का हस्तक्षेप होता है। दो सुनवाई के बीच सामान्यतया एक से डेढ़ महीने का अंतर होता है।'  समाधान पेशेवर मोहित चावला का कहना है कि मामले स्वीकार करने में देरी 9 महीने तक हो जाती है। इस तरह से अगर बैंक एनसीएलटी के पास मामले भेजते भी हैं तो वे प्रमोटकों के साथ बातचीत भी चला रहे होते हैं। 
 
इंडसलॉ के पार्टनर सौरभ कुमार ने कहा कि कंपनी अधिनियम की धारा 230 के तहत पुनर्गठन में भारी बढ़ोतरी हुई है। उन्होंने कहा, 'इंसॉल्वेंसी की जगह बैंक धारा 230 को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसकी प्रमुख वजह देरी और बेहतर मूल्य की संभावना है।'  धारा 230 में कर्ज लेने वालों को यह अनुमति मिली है कि वे कंपनी के सदस्यों के साथ कर्ज का पुनर्गठन कर सकें। इक्रा के उपाध्यक्ष अभिषेक डाफरिया ने कहा कि देरी के बावजूद आईबीसी बना रहेगा, लेकिन जब तक ज्यादा शाखाएं नहीं स्थापित की जाती हैं, इसमें भीड़ बनी रहेगी। उन्होंने कहा, 'इससे न सिर्फ स्वीकार करने में देरी हो रही है, बल्कि मामले का क्लोजर भी प्रभावित हो रहा है।' 
 
रिजर्व बैंक ने 12 बड़े खातों का समाधान अनिवार्य किया था, जिनका बकाया 3.45 लाख करोड़ रुपये था और इसकी पहल जुलाई अगस्त 2017 में की गई थी, इसमें आधा काम ही हो पाया है। जुलाई और अगस्त में स्वीकार मामलों में एस्सार स्टील और भूषण स्टील प्रमुख थे, जिसमें बहुत देरी हुई। 
Keyword: bank, loan, debt, RBI, NPA,,
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