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राजकोषीय मोर्चे पर हुए जादू की कुछ और है हकीकत

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  June 09, 2019

लेखा महानियंत्रक (सीजीए) द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक 2019-20 में केंद्र सरकार का पूरे वर्ष का शुद्ध कर राजस्व 13.17 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। यह चार माह पहले सरकार के अंतरिम बजट में प्रस्तुत अनुमान से 1.67 लाख करोड़ रुपये कम है। यह कमी मामूली नहीं है बल्कि जीडीपी के 0.9 फीसदी के बराबर है। इसके बावजूद सरकार वर्ष 2018-19 में राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3.4 फीसदी रखने में कामयाब रही। यह चमत्कार कैसे हुआ? सीजीए के आंकड़े कुछ बातें स्पष्ट करते हैं। सरकार इसलिए बचाव में कामयाब रही क्योंकि ऋण अदायगी हुई और विनिवेश प्राप्तियां बजट से अधिक रहीं। इस प्रकार 2018-19 में कुल गैर ऋण पूंजी प्राप्ति करीब 1.03 लाख करोड़ रुपये रही जबकि संशोधित अनुमान में इसके 0.93 लाख करोड़ रुपये रहने की बात कही गई थी। इससे कर राजस्व कमी 10,000 करोड़ रुपये तक घटी। गैर कर राजस्व में 1,000 करोड़ रुपये की मामूली बढ़ोतरी ने राजस्व में कुल कमी को 1.56 लाख करोड़ रुपये तक घटाया।

 
इसके बावजूद लक्ष्य काफी बड़ा था। ऐेसे में सरकार ने व्यय में कटौती शुरू की। सबसे पहले उसने पूंजीगत व्यय कम करना शुरू किया। इसमें करीब 13,000 करोड़ रुपये की कमी की गई। अब कमी घटकर 1.43 लाख करोड़ रुपये रह गई थी। इसके बाद सरकार ने बजट से इतर उधारी या अपने ही व्यय को सरकारी संस्थाओं को स्थानांतरित करने और उन्हें राष्ट्रीय अल्प बचत फंड आदि से उधारी लेने की प्रक्रिया अपनाई। सरकार ने ऐसी बजट से इतर उधारी के लिए भारतीय खाद्य निगम, आवास एवं शहरी विकास निगम, राष्ट्रीय आवास बैंक और ग्रामीण विद्युतीकरण निगम जैसे संस्थानों का रुख किया। ऐसा करके उसने खाद्य सब्सिडी, सस्ते आवास की योजना, सिंचाई, ग्रामीण आवास और विद्युतीकरण के व्यय की पूर्ति की। ऐसी उधारी की यह राशि 1.32 लाख करोड़ रुपये थी। सीजीए के आंकड़ों में यह उधारी शामिल नहीं है लेकिन इस चतुराईपूर्ण व्यय प्रबंधन को लेकर संकेत अवश्य है। उदाहरण के लिए 2018-19 में सरकार का खाद्य सब्सिडी बिल 1.02 लाख करोड़ रुपये है जो 1.71 लाख करोड़ रुपये के संशोधित अनुमान से 69,000 करोड़ रुपये कम है। सरकार ने खाद्य सब्सिडी बिल में 40 फीसदी कटौती कैसे की? उसने एफसीआई से कहा कि वह उधारी लेकर व्यय की पूर्ति करे। इसी तरह आवास, सिंचाई और ग्रामीण विद्युतीकरण योजनाओं के लिए नाबार्ड, हुडको, एनएचबी और आरईसी से धन की व्यवस्था कर व्यय में 63,000 करोड़ रुपये की कमी की गई।
 
अब यह कमी घटकर 11,000 करोड़ रुपये रह गई थी। ऐसे में सरकार की उधारी आवश्यकता या राजकोषीय घाटा 6.34 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 6.45 लाख करोड़ रुपये हो गया। यह कोई खास समस्या नहीं थी। वर्ष 2018-19 में जीडीपी का नॉमिनल आकार संशोधित कर 188.41 लाख करोड़ रुपये से 190.1 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया। इससे भी राजकोषीय घाटे को 3.4 फीसदी रखने में सहायता मिली। वर्ष 2018-19 के संशोधित अनुमान में राजकोषीय घाटे का लक्ष्य तो हासिल हो गया लेकिन इसे हासिल करने के तरीके से कई सवाल खड़े होते हैं। पहला, वित्त मंत्रालय ने कर राजस्व के अनुमान में इतने गुंजाइश क्यों रखी? कर राजस्व अनुमान में 11 फीसदी की चूक शर्मनाक है। बजट की प्रस्तुति को चार सप्ताह पहले करने से योजनाओं के लिए व्यय की उपलब्धता तेज हुई लेकिन सरकार की वर्ष भर के कर राजस्व अनुमान की क्षमता बुरी तरह प्रभावित हुई। यह अगले वर्ष के अनुमान की विश्वसनीयता को भी भारी नुकसान पहुंचाएगा। 
 
उदाहरण के लिए अनुमानित और वास्तविक शुद्ध कर राजस्व में 11 फीसदी का अंतर आने के कारण 2019-20 के लक्ष्य की प्राप्ति और दुष्कर हो जाएगी। 15 फीसदी की वृद्धि दर के बजाय अब वांछित वृद्धि दर 29 फीसदी होगी। आने वाले वर्ष में राजकोषीय समावेशन वैसे भी कठिन चुनौती है। एक सवाल यह भी है कि सरकारी कंपनियों की उधारी कैसे चुकता होगी और आने वाले वर्ष के लेखा में इससे कैसे निपटा जाएगा। सरकारी क्षेत्रों की इस उधारी को सरकार के खाते में दर्शाया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए अगर सरकार ऐसा नहीं करती तो राजकोषीय घाटा जीडीपी के 4.1 फीसदी तक पहुंच चुका होता।
 
सरकारी क्षेत्र को ऋण के बोझ तले दबाना स्वयं सरकार की सार्वजनिक क्षेत्र की स्वायत्तता और सुधार की प्रतिबद्धताओं के प्रतिकूल है। बजट से इतर उधारी के ऐसे संसाधन यह भी दर्शाते हैं कि शासकीय क्षेत्र के सरकारी ऋण पर नजर रखने की जरूरत  है।  बजट से इतर उधारी सरकार को अतिरिक्त राहत प्रदान करती है और अर्थव्यवस्था की वृद्धि के आंकड़े बेहतर प्रतीत होते हैं। अगर सरकार ने वाकई 2018-19 की अंतिम तिमाही में अपने व्यय में 1.45 लाख करोड़ रुपये की कटौती की होती तो यह चौथी तिमाही के जीडीपी अनुमान में सरकारी व्यय के आंकड़ों में नजर आता। 
 
यह सही है कि 13,000 करोड़ रुपये का पूंजीगत व्यय कम किया गया लेकिन शेष 1.32 लाख करोड़ रुपये वाली बात हकीकत नहीं है। इस व्यय को सरकारी संस्थानों पर डाल दिया गया।चौथी तिमाही में सरकारी व्यय 13 फीसदी से अधिक बढ़ा। अगर सरकार ने वास्तव में व्यय में कटौती की होती तो सरकार की व्यय वृद्धि इतनी अधिक नहीं होती और जनवरी-मार्च 2019 तिमाही में जीडीपी वृद्धि के आंकड़े 5.8 फीसदी से कम रहते। इसमें दो राय नहीं कि 2018-19 में राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को हासिल करने का जो जादू हुआ है, उसके कई कारक परेशान करने वाले हैं।
Keyword: CAG, revenue, narendra modi, GDP,,
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