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यह केवल क्रिकेट नहीं है 'कैप्टन कूल'

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  June 09, 2019

हम इस पुरानी समझ पर सवाल नहीं उठा सकते कि राजनीति बांटती है और खेल जोड़ता है। विश्वकप के इस मौसम में तो यह उक्ति और सही प्रतीत होती है। भारत दो बार क्रिकेट विश्वकप जीत भी चुका है। परंतु इसके साथ एक शर्त भी जुड़ी हुई है: खेल लोगों को जोड़ता है लेकिन केवल उन्हें जो किसी एक पक्ष के समर्थक होते हैं। हम भारतीय अपनी टीम के पीछे खड़े होते हैं तो अन्य लोग अपनी टीम के। यहीं पर बात आती है महेंद्र सिंह धोनी के विकेट कीपिंग दस्तानों को लेकर छिड़े विवाद की, जिस पर भारतीय सैन्य बलों में से एक का प्रतीक चिह्न 'बलिदान' अंकित था।

 
खेल की निगरानी करने वाली अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट कौंसिल (आईसीसी) ने इस पर आपत्ति जताई। आईसीसी के नियमों के तहत किसी खिलाड़ी द्वारा अपने शरीर या अपनी वस्तुओं पर किसी धार्मिक, राष्ट्रीय या वाणिज्यिक चिह्न या लोगो धारण करने की एक सीमा है। उदाहरण के लिए प्रायोजकों के लोगो इस्तेमाल किए जा सकते हैं जिन्हें आईसीसी मंजूरी देता है। इसके अलावा संबंधित देश के महासंघ का लोगो लगाया जा सकता है। अनुमति के मुताबिक राष्ट्रीय चिह्न धारण किए जा सकते हैं।  इसके अलावा किसी चीज को मंजूरी नहीं है। सैन्य प्रतीक तो कतई नहीं प्रयोग किए जा सकते। यह खेल का मैदान है, जंग का नहीं।
 
भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) का कहना है कि उसने आईसीसी से अपील की है वह धोनी को रियायत दे दे। जनमत धोनी के समर्थन में है। इस बारे में विचार कीजिए: भारतीय टीम विश्वकप में है, धोनी उसका हिस्सा हैं, दूसरी ओर हमारे साहसी सशस्त्र बल हैं जिनकी वीरता को हाल ही में विकी कौशल की फिल्म ने परदे पर अमर किया। भला कौन भारतीय होगा राष्ट्रवाद के इस तिहरे चुंबकीय आकर्षण से बचेगा। परंतु किसी न किसी को कहना होगा कि आईसीसी सही कह रही है। धोनी को यह चिह्न हटाना चाहिए। खेल के प्रतिस्पर्धी मैदान में मरने-मारने के प्रतीक नहीं होने चाहिए। यही कारण है कि हममें से कुछ लोगों को साहस करके धारा के विपरीत तैरना होगा। खासकर उन लोगों को जो इस खेल को पसंद करते हैं और चाहते हैं कि भारत जीते। अगर हमारे खेल संबंधी राष्ट्रवाद पर सवाल उठता है तो उठने दें। ईसा मसीह की पंक्ति यहां सटीक है: पिता, उन्हें माफ कर दो, वे (जो हमें देशद्रोही ठहरा रहे)नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं।
 
पहले देखते हैं कि राष्ट्रवादी और उनके समर्थक क्या कह रहे हैं। कमांडोनुमा चैनल पहले ही ऐसे हैशटैग चलाने लगे हैं जिनमें धोनी का समर्थन किया जा रहा है। पहली बात, हमें सशस्त्र बलों का सम्मान करना चाहिए। दूसरी बात, भारत को पाकिस्तान के हाथों नुकसान उठाना पड़ रहा है इसलिए पाकिस्तानी जहां भी हों उन्हें संदेश दिया जाना चाहिए। और तीसरा, आप किसी को उसकी पसंद जाहिर करने से नहीं रोक सकते। धोनी विशेष बल के मानद लेफ्टिनेंट कर्नल हैं और उन्होंने पैराशूट जंपिंग उत्तीर्ण करके यह प्रतीक हासिल किया है। उनसे उनकी रेजिमेंट का प्रतीक नहीं छीना जा सकता है। 
 
तीसरे का उत्तर आसान है: उनकी रेजिमेंट देश के लिए क्रिकेट नहीं खेल रही है। जब रेजिमेंट देश के लिए लड़ती है तो उसके जवान बीसीसीआई या हॉकी महासंघ या भारतीय ओलिंपिक महासंघ के प्रतीक नहीं धारण करते। हमें सशस्त्र बलों और उनके बलिदान का सम्मान करना चाहिए लेकिन यह कहना अनुचित होगा कि कश्मीर में पाकिस्तानी जो कर रहे हैं उसका विरोध हमारे खिलाड़ी लॉड्र्स, ओल्ड ट्रैफर्ड या ओवल में करें। विरोध राजनेता और राजनयिक तैयार करते हैं, युद्घ जवान लड़ते हैं, खिलाड़ी जीत के लिए खेलकर देश के लिए गौरव लाते हैं, खिलाड़ी की पोशाक में अपनी सेना का ब्रांड ऐंबेसडर बनकर नहीं। 
 
यह खेल दोनों खेल सकते हैं। अगर एक भारतीय सेना की वर्दी में आ सकता है तो पाकिस्तानी भी। क्रिकेट का खेल दोनों में से कोई एक ही जीत सकता है। अगर इसमें सैन्य भावना जोड़ दी जाती है तो उसे जनता तक पहुंचने में देर नहीं लगेगी। इससे खेल दुश्मनी में बदल जाएगा। हम ईरान और इराक के बीच युद्घ की कटुता को याद कर सकते हैं।  जॉर्ज ऑरवेल ने सन 1945 के अपने निबंध द स्पोर्टिंग स्पिरिट (खेल भावना) में लिखा था कि अंतरराष्ट्रीय स्तर का खेल युद्घ के समान ही है। उनके मुताबिक इसमें महत्त्वपूर्ण बात खिलाडिय़ों का व्यवहार नहीं बल्कि दर्शकों का रुख है। इन दर्शकों के पीछे पूरे राष्ट्र को देखा जा सकता है। हमारे महिला और पुरुष खिलाडिय़ों ने पाकिस्तान के साथ मुकाबले खेले हैं, हालिया दिनों में उन्होंने जूझने का माद्दा दिखाया और उन्हें कहीं अधिक सफलता भी मिली है लेकिन ऐसा केवल खेल में हुआ है। मैदान के बाहर दोनों टीमें मित्रवत रही हैं। यहां तक कि एक दूसरे के परिवार और बच्चों के साथ आनंद लेते हुए भी नजर आए। अच्छी बात है कि अभी कोई युद्घ नहीं चल रहा है। बालाकोट में एक झड़प हुई थी जिसमें किसी की जान नहीं गई और उस बात को चार महीने बीत भी गए। सन 1971 में जब जंग लड़ी जा रही थी तब सुनील गावसकर और जहीर अब्बास ने ऑस्टे्रलिया में विश्व एकादश के लिए एक साथ बल्लेबाजी की थी। यह वह समय था जब वायुसेना अकसर कराची पर बमबारी के लिए उड़ान भरती। 
 
सन 1999 में जब दोनों टीमें इंगलैंड में विश्वकप खेल रही थीं तब करगिल की लड़ाई चल रही थी। तब भी दोनों टीमें सहज थीं। दोस्ताना रिश्ते थे, यहां तक कि गिरने पर एक दूसरे को उठाने और विरोधी टीम के बल्लेबाज के जूते के फीते तक बांधे गए। वहां कोई टाइगर हिल को लाना नहीं चाहता था।  सैन्य प्रतीक, वर्दियां, बिल्ले, पट्टे, तमगे, बैंड और परेड आदि अच्छे लगते हैं और जोश बढ़ाते हैं। उनके साथ एक बोझ यह भी होता है कि सफलता या नाकामी युद्ध में जीत हार के समान लग सकती है। 16 जून को मैनचेस्टर में होने वाले भारत-पाकिस्तान मुकाबले समेत किसी भी खेल में एक ही पक्ष जीतेगा और दूसरा हारेगा। क्या वह जंग में सेना की हार के समान होगा? अगर दोनों टीमें ओल्ड ट्रैफल्ड में सैन्य प्रतीक के साथ मैदान में उतरीं तो? उस स्थिति में उमडऩे वाली भीड़ को नियंत्रित करने के लिए ब्रिटेन की पुलिस कम पड़ जाएगी।
 
हम ऑरवेल की ओर लौटते हैं जिन्होंने कहा था, 'जब मैं सुनता हूं कि लोग कहते हैं कि खेल देशों के बीच सद्भावना बढ़ाते हैं और यह भी कि अगर लोग फुटबॉल, क्रिकेट या अन्य खेलों के मैदान पर मिलें तो आपस में जंग नहीं होंगी, तो मुझे हमेशा आश्चर्य होता।' उन्होंने 1936 के बर्लिन ओलिंपिक का उदाहरण दिया। वह सही भी थे और गलत भी। मानव सभ्यता विश्व युद्ध और शीत युद्ध से बहुत आगे निकल आई है। खेल के मैदान पर निरंतर मुलाकात ने पुरानी दुश्मनी कम करने में मदद की है। इससे खिलाड़ी, उनके प्रशंसक, परिवार और मित्रों आदि को एक दूसरे के बारे में अधिक जानने को मिलता है। लोगों में आपसी रिश्ते बनते हैं। कई बार वे अपनी हताशा भी निकाल लेते हैं।
 
अच्छी बात है कि आज उस नजरिये को न तो लोकप्रियता हासिल है, न उसे सही माना जाता है। परंतु ओलिंपिक से लेकर पिंगपांग और बास्केटबाल से क्रिकेट और फुटबॉल से लेकर हॉकी तक अत्यंत प्रतिस्पर्धी खेलों ने सैन्य शत्रुताओं की धार कुंद करने और दिमाग के घाव भरने का ही काम किया है। यकीनन हम किसी व्यक्ति के सेना के प्रति समर्पण की कद्र करते हैं, खासतौर पर तब जबकि वह मानद रूप से वहां सेवारत रहा हो। उदाहरण के लिए धोनी पद्म पुरस्कार ग्रहण करने विशेष बल की पूरी वर्दी में और मरून रंग की टोपी पहनकर गए थे। यह बहुत अच्छा कदम था। राष्ट्रपति भी सशस्त्र बलों के सर्वोच्च कमांडर हैं। उन्हें अपनी रेजिमेंट को क्रिकेट के मैदान पर ले जाने की आवश्यकता नहीं है। विकेट के पीछे उनका जुझारूपन कभी कम नहीं होगा। वह हर बार किसी बल्लेबाज को स्टंप या कैच करते वक्त उस प्रेरणा को महसूस कर सकते हैं जो उन्होंने अपनी हथेलियों पर सजाई। भले ही प्रतीक चिह्न हो या नहीं लेकिन विकेट के पीछे धोनी के दस्ताने सबसे खतरनाक बने रहेंगे।
Keyword: cricket, ICC, world cup, MS dhoni,,
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